विश्व सिनेमा में कई किरदार ऐसे हैं जो वक्त के साथ आगे बढ़ कर अपने समय के प्रतिनिधि बन जाते हैं। ये हर काल में अपने सवालों के साथ कदमताल करते हैं। चार्ली चैपलिन की फिल्म ‘द किड’ का नन्हा जैकी ऐसा ही किरदार है। सिनेमा के पर्दे पर जैकी सौ साल से पहले पैदा हुआ था, लेकिन आज भी उसका बचपन करुणा का अपना कथ्य लिख रहा है। बचपन किसी भी समय का हो, वह कभी पुराना नहीं होता है।
1921 में जब दुनिया प्रथम विश्वयुद्ध की तबाही से उबरने की कोशिश कर रही थी, तब चार्ली चैपलिन ने एक ऐसी कहानी कही, जिसमें अहंकारी शासकों और जंग से परे एक आम दुनिया थी। वहां एक गरीब आदमी था और उसकी गोद में एक अनाथ बच्चा। चैपलिन ने दुनिया को बताया कि सभ्यता की असली परीक्षा युद्ध जीतने में नहीं, बल्कि एक बच्चे को सुरक्षित बचपन देने में है।
जैकी का जन्म कोई उत्सव लेकर नहीं आता है। वह दुनिया में आते ही असुरक्षा, गरीबी और परित्याग का सामना करता है। उसकी मां हालात के दबाव में उसे छोड़ने को विवश हो जाती है। किस्मत उसे ट्रैंप की गोदी में डाल देती है। ट्रैंप व जैकी का संबंध जैविक नहीं है। यह मानवीय संबंध दुनिया के सबसे खूबसूरत रिश्ते के रूप में परिपक्व होता है। ट्रैंप और जैकी पिता-पुत्र कम और जीवन-संघर्ष के साथी अधिक हैं।
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इन दोनों को एक-दूसरे पर अटूट भरोसा है। चार्ली चैपलिन दिखाते हैं कि संवेदनशीलता ऐसा धन है जो इंसान को गरीबी में भी मानवीय बनाए रखता है। जैकी जिज्ञासु है, शरारती है और परिस्थितियों से जूझना जानता है। उसकी मासूमियत जीवन से भरी हुई है। यही चीज उसे सिनेमा के अन्य बाल पात्रों से अलग बनाती है।
फिल्म का सबसे यादगार दृश्य वह है, जब अधिकारी जैकी को ट्रैंप से अलग करने आते हैं। बच्चा रोता है, ट्रैंप उसे बचाने के लिए दौड़ता है और दर्शक अपनी आंखों में आंसू लिए यह महसूस करता है कि रक्त-संबंधों से अधिक शक्तिशाली भावनात्मक संबंध भी होते हैं। बिना एक शब्द बोले चैपलिन ने पितृत्व की सबसे सुंदर परिभाषा लिख दी।
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‘द किड’ के जरिए चैपलिन समाज के सामने कई तरह के नैतिक प्रश्न रखते हैं। दुनिया में क्या हर बच्चे को यह अधिकार नहीं है कि उसके पास परिवार हो? चैपलिन ने गरीबी का महिमामंडन नहीं किया है। जैकी की भूमिका निभाने वाले जैकी कूगन उस समय केवल छह वर्ष के थे। उनका अभिनय इतना सहज था कि दर्शकों को बाल कलाकार नहीं अपने घर का मासूम बच्चा दिखाई देता था।
सौ साल से ज्यादा अंतराल के बाद भी आज ‘द किड’ दुनिया को संबोधित कर रही है। दुनिया बदल गई है, तकनीक बदल गई है, सिनेमा बदल गया है, लेकिन जैकी नहीं बदला। उसकी मुस्कान आज भी वही है, उसके आंसू आज भी उतने ही सच्चे हैं और उसका प्रेम आज भी उतना ही निर्मल है। जैकी एक संघर्षशील बचपन का सार्वकालिक प्रतीक बन चुका है।
