चार मई 2026 को ‘इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन’ विद्युत की गति से जिसके खाते में मत डाल रही थी, वह पूरे देश को चौंका रहा था। विजय, जिन्हें उनके करोड़ों प्रशंसक थलापति विजय यानी सेनापति कहते हैं, की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) ने 108 सीटों पर जीत दर्ज दर्ज की। दक्षिण भारत में फिल्मी सितारे राजनीतिक पार्टी को चलाते हैं तो उत्तर भारत में सितारों को पार्टी चलाती है। उत्तर और दक्षिण भारत के सिनेमा बनाम सत्ता के परिदृश्य में बुनियादी फर्क है। उत्तर और दक्षिण में सिनेमा और सत्ता के सहसंबंध की व्याख्या करता सरोकार

यह कोई पहली बार नहीं हुआ। दक्षिण भारत में यह परंपरा छह दशक पुरानी है। एमजी रामचंद्रन, जे जयललिता, एनटी रामाराव, एम करुणानिधि-इन सबने पर्दे से सत्ता तक का सफर तय किया। लेकिन जो सवाल हर बार उठता है, और जिसका जवाब आज तक उत्तर भारत के पास नहीं है, वह यह कि दक्षिण में सितारे राजनेता क्यों बन जाते हैं, जबकि बालीवुड के महानायक राजनीति में पहुंचते ही क्यों फीके पड़ जाते हैं?

तमिलनाडु : यहां फिल्म और राजनीति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। तमिलनाडु की राजनीति को समझना हो तो पहले उसके सौ साल पुराने द्रविड़ आंदोलन को समझना होगा। द्रविड़ विचारधारा पर हुए शोध (आइजेसीआरटी, 2025) के अनुसार, साल 1967 के बाद से तमिलनाडु में कोई भी मुख्यमंत्री ऐसा नहीं रहा, जिसका सिनेमा से कोई नाता न हो। सीएन अन्नादुरई (जो द्रमुक संस्थापक थे), करुणानिधि, एमजी रामचंद्रन, जयललिता, एमके स्टालिन, ये सभी फिल्म की दुनिया से जुड़े। यह संयोग नहीं, यह एक सुनियोजित ऐतिहासिक प्रक्रिया है।

इसकी जड़ें 1925 के पेरियार ईवी रामासामी के आत्मसम्मान आंदोलन में है। द्रविड़ राष्ट्रवाद पर राजनीतिक विज्ञान संस्थान के विश्लेषण के अनुसार, जब उत्तर भारत के नेताओं ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की कोशिश की तो यह तमिल अस्मिता पर सीधा हमला माना गया। साल 1930 और साल 1960 के हिंदी विरोधी आंदोलन महज भाषा आधारित नहीं थे, वह सांस्कृतिक अस्तित्व की लड़ाई थी। आइएसईसी के शोध-पत्र के अनुसार, द्रविड़ दलों ने सिनेमा को अपने वैचारिक प्रसार का सबसे सशक्त माध्यम बनाया। ब्राह्मण विरोध, जात समता और तमिल भाषा की गरिमा के संदेश पहले फिल्मों में आए, फिर राजनीति में।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के प्राध्यापक एसवी श्रीनिवास के विश्लेषण के मुताबिक दक्षिण भारत में फिल्मी सितारों के प्रशंसक संगठन जाति-आधारित होते हैं। गरीब, गैर-ब्राह्मण, दलित युवा इन संगठनों के मुख्य सदस्य हैं। जब कोई सितारा राजनीति में आता है, तो ये प्रशंसक संगठन तुरंत चुनाव अभियान की इकाई में बदल जाते हैं। ये संगठन किसी भी राजनीतिक दल के काडर से बेहतर और तेज होते हैं।

एमजीआर : वे पहले नायक, जिन्होंने दक्षिण में इतिहास रच दिया। मरुदुर गोपालन रामचंद्रन (एमजीआर) दक्षिण भारतीय सिनेमा-राजनीति के इस अटूट रिश्ते के सबसे बड़े प्रतीक हैं। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फार एशियन स्टडीज (आइआइएएस) के विश्लेषण में यह दर्ज है कि एमजीआर की साल 1958 की फिल्म नादोडी मन्नन जो कि उनकी 100वीं फिल्म थी और जिसे उन्होंने स्वयं लिखा, निर्देशित और निर्मित किया, तमिल राजनीति में उनके प्रवेश की असली नींव बनी। इस फिल्म में भ्रष्टाचार, अन्याय और दमन के खिलाफ आम आदमी के नायक की जो छवि बनी, वह उनकी राजनीतिक पहचान बन गई।

साल 1977 में एमजीआर ने अन्ना द्रमुक बनाई और पहले ही प्रयास में सत्ता हासिल की। वही उपलब्धि जो 49 साल बाद 2026 में विजय दोहराने की दहलीज पर खड़े हैं। एमजीआर की सफलता का रहस्य था पर्दे पर बनाई गई गरीबों के मसीहा की छवि का सीधा राजनीतिक रूपांतरण। तमिल दर्शक उनके नेता और अभिनेता की छवि में फर्क नहीं करता था। पर्दे पर जो न्याय का योद्धा था, वही मतपत्र पर भी वोट पाने का हकदार माना गया।

जयललिता, करुणानिधि और नंदमूरि तारक रामाराव : तीन अलग रास्ते, एक ही मंजिल

एमजी रामचंद्रन के बाद जयललिता ने यह परंपरा आगे बढ़ाई। जयललिता का सफर सबसे कठिन था। एक महिला अभिनेत्री से तमिलनाडु की सबसे शक्तिशाली नेता बनने तक। रामचंद्रन की छत्रछाया से निकलकर उन्होंने अपनी अलग राजनीतिक पहचान गढ़ी। तमिल राजनीति में अम्मा (मां) की छवि का वे पर्याय बन गईं। उनके कार्यकाल ने साबित किया कि सिनेमाई लोकप्रियता, जब संगठनात्मक शक्ति और राजनीतिक कौशल से जुड़ती है, तो वह स्थायी शासन में बदल सकती है।

करुणानिधि का रास्ता अलग था। वे अभिनेता नहीं, पटकथा लेखक थे। उन्होंने फिल्मों को वैचारिक प्रसार का माध्यम बनाया। द्रविड़ आंदोलन के संदेश पहले फिल्मी संवादों में गूंजे, फिर राजनीतिक भाषणों में। आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव (एनटीआर) ने साल 1982 में तेलगू देसम पार्टी बनाई और नौ महीने के भीतर मुख्यमंत्री बन गए। यह अब तक की सबसे तेज सत्ता-यात्राओं में से एक है।

विजय 2026: 59 साल की बंद खिड़की खुली

जोसेफ विजय चंद्रशेखर 51 साल के हैं। उन्हें दुनियाभर में सिर्फ विजय या थलापति (सेनापति) के नाम से जाना जाता है। उन्होंने तमिलनाडु के आधुनिक इतिहास में सबसे धमाकेदार चुनावी शुरूआत की। उनकी टीवीके को लगभग 35 फीसद मत मिले हैं। द्रमुक की 59 और अन्ना द्रमुक की 47 सीटों की तुलना में 108 सीटें मिली हैं। 234 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए 118 सीटें चाहिए थीं। टीवीके दस सीटों से पीछे रही, जिससे त्रिशंकु सदन बना।

यह जीत किसी चमत्कार की उपज नहीं थी। विजय ने दो फरवरी 2024 को टीवीके के गठन की घोषणा की। वे बिना किसी गठबंधन के 234 सीटों पर अकेले उतरे। 30 मार्च 2026 को अपना घोषणापत्र जारी किया। नशामुक्त राज्य, युवाओं को रोजगार की गारंटी, बिना गारंटी के शिक्षा ऋण और छात्रों को मासिक आर्थिक सहायता। यह एजंडा ठीक वही था जो तमिल युवा चाहता था, और जो द्रमुक और अन्ना द्रमुक दोनों देने में विफल रहे। इस बार तमिलनाडु के इतिहास में सर्वाधिक 85.1 फीसद मतदान हुआ। यह रिकार्ड मतदान आंशिक रूप से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) के कारण था। इसमें नाम काटे जाने के डर से मतदाता रिकार्ड संख्या में निकले, लेकिन इसमें टीवीके की जनाकर्षण शक्ति की भी बड़ी भूमिका थी। प्रस्तुति : संजय शर्मा

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जोसेफ विजय आज तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। अपनी पार्टी टीवीके को यहां तक पहुंचाने में विजय का बहुत बड़ा रोल है, तो वहीं, पर्दे के पीछ छह ऐसे भी किरदार हैं, जिनका नाम चुनाव से पहले शायद ही कोई जानता हो, लेकिन अब हर कोई उनका जानता है, क्योंकि विजय के बाद इन छह किरदारों का पार्टी और विजय को मुख्यमंत्री पद तर पहुंचाने का इनका अहम योगदान रहा है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक