ताज़ा खबर
 

तकनीकः आधुनिकता का स्त्री पक्ष

कोई तकनीक समय के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव का औजार कैसे बन सकती है, कैमरा इसका बेहतरीन उदाहरण है। कैमरे के आविष्कार के बाद उसके इस्तेमाल के विभिन्न चरण अपने आप में बदलाव के स्वायत्त अध्याय हैं। इंटरनेट और मोबाइल फोन ने कैमरे के इस्तेमाल को सुगम ही नहीं बनाया, इसे काफी सुलभ भी कर दिया है। कैमरे ने परिवर्तन की जो नई रचनात्मक दुनिया रची है उसका असर वैसे तो सब पर पड़ा है पर महिलाओं का संसार इससे सबसे ज्यादा बदला है। तकनीक और स्त्री के साझे ने बदलाव की वो इबारत लिखी है, जिसमें कई बड़े अभियान और संघर्ष असफल रहे। अस्मिता और पहचान से लेकर खुद को जाहिर करने की रचनात्मकता तक कैमरे ने महिलाओं की दुनिया रातोंरात बदल कर रख दी है। तकनीक और परिवर्तन की इस दास्तां को सामयिक हवालों के साथ सामने ला रही हैं मृणाल वल्लरी।

August 20, 2020 5:24 AM
समाज में महिलाओं की शिनाख्त हमेशा से एक बड़ी समस्या रही है।

एक दिन पहले विश्व फोटोग्राफी दिवस बीता है। एक ऐसा दिन जो हमें फिर से याद दिला गया कि हमारे द्वारा उतारी गईं तस्वीरें विभिन्न दौरों के बदलाव की साक्षी ही नहीं रही हैं, बल्कि इनके जरिए बदलाव का पूरा मंजरनामा तैयार हुआ है। आज जब हम कैमरे के क्लिक को किसी आयोजन या प्रयोजन के तात्कालिक ‘फोटो फिनिश’ से आगे व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक हवालों से समझने की कोशिश करते हैं तो हमें कुछ बातें अपेक्षित ठहराव के साथ और खासी गहराई से समझनी होंगी।

समाज और व्यवहार के लैंगिक मूल्यांकन का सबसे बड़ा तकाजा तो यह है कि हम यह समझें कि कैमरे के लेंस का भी एक जेंडर होता है। कैमरा और स्त्री का दोस्ताना हमारे समय का एक कीमती सुलेख है। महिलाओं के बारे में लिखना और उन्हें समझना आज भी एक चुनौती है। आलम यह है कि इस बारे में आज भी कोई बात छठी-सातवीं जमात में रटाई गई नारी तुम श्रद्धा हो, तुम अबला नहीं हो जैसी बातों से ही शुरू होती है और इसका अंत भी भावुकता के ऐसे ही किसी इकहरे निष्कर्ष पर होता है। यह एक समझ का दोहराव भर नहीं बल्कि एक बंद मानसिकता का खतरनाक पोषण है। अगर इक्कसीवीं सदी के दूसरे दशक में भी महिलाओं के बारे में कहने-बतियाने के लिए लोगों के पास न तो भाषा है, न शब्द हैं और न ही कुछ नया व सार्थक कहने का विवेक। लैंगिक दुर्भावना और पूर्वाग्रहों से भरे ऐसे स्वभावों को खारिज करने की कोशिश की है तकनीक ने और तकनीक का इस्तेमाल करतीं देश और दुनिया की महिलाओं ने।

तकनीक और बाजार
तकनीक और बाजार, ये दोनों न सिर्फ एक सीध के शब्द हैं बल्कि इनके प्रभाव का पसारा अर्थ और उद्यम से लेकर समाज और संस्कृति तक है। तीन दशक पहले जब उत्तर आधुनिक विमर्श का हिंदी अवतरण सामने आया तो ऐसे लेखों और जुमलों की बाढ़ आ गई कि यह देह, संदेह और उपभोग का चरम दौर है और इस दौर की सनक हमारे शयनकक्ष से लेकर बैठकखाने तक दाखिल होती जा रही है। नए समय और परिवेश को लेकर कही जाने वाली ये बातें कहीं न कहीं महिलाओं को नए दौर और हालात के जोखिमों से परिचित करा रही थी, तो इनसेमुकाबले के लिए आगाह भी कर रही थी।
पर देखते-देखते ये सारी तैयारियां एक किनारे धरी की धरी रह गर्इं। सोशल मीडिया के अनपेक्षित प्रचलन और मोबाइल फोन के धुंधाधार प्रसार के बीच एक नई दुनिया रातोंरात बसती चली गई। एक ऐसी दुनिया जो आभासी से आगे हमारी सोच-समझ में तेजी से दाखिल हो रही थी। इन सारे बदलावों की लाक्षणिकता में महिलाओं के प्रति सलूक का तेजाबी यथार्थ भी सामने आया। अच्छी बात यह रही कि तकनीक और इंटरनेट के जरिए अपने खिलाफ बढ़ते मंसूबों और नाखूनों को भांपने में महिलाओं ने वक्त नहीं गंवाया।

हाशिए से हैशटैग तक

न बिंदिया, न काजल…अब तेरा क्या होगा बाजारवाद। गीता यादव (फिलहाल फेसबुक खाता गीता यथार्थ के नाम से) की एक पोस्ट ने हैशटैग ‘नेचुरल सेल्फी’ से महिलाओं को एक बहनापे से जोड़ दिया। ऐसे ही कई और अभियान चले जिनमें जवां होती लड़कियों से लेकर बुजुर्ग महिलाओं ने ‘सुंदरता’ के पुरातन पुरुषवादी रवैए को अपनी तरह से समझने की कोशिश करते हुए इसमें हिस्सा लिया। सुंदर दिखने के खौफ से आजाद हुर्इं स्त्रियों का चेहरा बिना मेकअप के सामने आया। एक पोस्ट से बहनापे का कारवां बढ़ता गया।

‘मेरी रात मेरी सड़क’ हैशटैग की मुहिम तो छोटे कस्बों तक पहुंची और महिलाएं निकल पड़ीं आधी रात को सड़कों पर अपनी हिस्सेदारी मांगने। यह सड़क मेरी भी है और मैं इस पर चलने के लिए घड़ी का कांटा क्यूं देखूं जैसे कंटीले सवाल मर्दों को खूब चुभे और वो गीता यादव सहित अन्य महिलाओं को ये आजादी झूठी है कह ट्रोल करने पहुंच गए।
बात करें कोविडकाल की तो इस दौरान भी महिलाओं ने अपनी दुनिया से विमर्श और रचनात्मकता के क्षेत्र को कई अनछुए विकल्प सौंपे। ये विकल्प उनके लिए खुद की शिनाख्त को नए सिरे से गढ़ने की जहां एक तरफ सर्जनात्मक मुठभेड़ रही, वहीं दूसरी तरफ बाकी दुनिया के लिए यह चुनौती भी कि वह महिलाओं तक सिर्फ निहार की मानसिकता के साथ नहीं पहुंचे।

पहचान का संकट

समाज में महिलाओं की शिनाख्त हमेशा से एक बड़ी समस्या रही है। लेकिन पिछले दो दशकों में तकनीक का सहारा ले महिलाएं अपनी पहचान को लेकर जितनी शिद्दत से सामने आई हैं वह दर्ज होने के लिए अपना हिस्सा तो मांगता है।
वो कभी कहती है कि साड़ी में मैं कैसे लग रही हूं तो कभी कहती है कि मेरी श्वेत श्याम तस्वीर कैसी है। पितृसत्ता ने जिसकी कोई पहचान ही नहीं बनने दी उसने पूरे इंटरनेट को, पूरी साइबर दुनिया को अपनी पहचान से भर दिया है। वो इतराती भी है और चिढ़ाती भी है। हैशटैग से शुरू होकर अभिव्यक्ति तक आ जाती है और उसके साथ अपनी बातें भी कहती है, अपने तर्क भी बना लेती है।

आसान नहीं बदलाव

कोई भी बदलाव लाना कितना मुश्किल होता है वो गीता यादव जैसी महिलाओं की फेसबुक की दीवार पर थोड़ी देर समय गुजार कर समझा जा सकता है। बस संवैधानिक बात कहने भर से एक स्त्री को क्या नहीं सुनना पड़ता है। गीता उन महिलाओं में से हैं जिन्होंने इंटरनेट और सोशल मीडिया को जागरूकता का मंच बनाया और इसके जरिए अपनी एक बड़ी पहचान बनाई।

सवाल है कि क्या तकनीक आपको सशक्त करता है? इस सवाल पर हामी भर कर ही आप मौजूदा दौर में रह सकते हैं। सशक्त कौन होगा? वही होगा जो पहले सशक्त नहीं था। जो पहले से बहुत सशक्त है तकनीक की दुनिया में उनके लिए कुछ खास नहीं है। उनकी मजबूत दुनिया कहीं से भी कमजोर होने नहीं जा रही है। आप अगर कंगूरे पर खड़े हैं, बड़े फिल्मकार हैं तो आप वहां से कहां जाएंगे? लेकिन वैसा तमाम तबका जिसके सामने पहचान का संकट रहा है उसके लिए यहां क्रांति है।

महिला दमखम

सूचना क्रांति के बारे में मीडिया के तमाम माध्यमों से लेकर तमाम समारोहों तक हमने कहा कि भारतीय नौजवानों ने आइटी के क्षेत्र में अमेरिका तक में झंडे गाड़ दिए। पर अब यह झंडा हमारे समाज के बीच गाड़ा जा रहा है। स्त्रियां अपनी पहचान का झंडा गाड़ रही हैं। अपनी रोजमर्रा की जिंदगी पर कैमरा ऐसे डालती हैं कि हम चौंक पड़ते हैं। आप यू-ट्यूब पर चले जाइए, 14-16 सोलह साल की किशोरियों से लेकर प्रौढ़ स्त्रियों तक के अनगिनत चैनल हैं। कोई संगीत सुना रही है, कोई कविता गुनगुना रही है। कोई मौजूदा स्थितियों पर अपनी बात दिलचस्प तरीके से कह रही है। कोई अपने शोध में बता रही है कि भारत का मीडिया यह गलत लिख रहा है। वह अपनी छोटी सी जगह से कैमरा और इंटरनेट के सहारे बड़े हस्तक्षेप कर रही है। इसके वर्गीय चरित्र पर अलग से बात हो सकती है जो सिर्फ इंटरनेट नहीं पूरी दुनिया की समस्या है।

कैमरा एक रचनात्मक तजुर्बा

इंटरनेट और कैमरे के जरिए जाने-अनजाने बहुत कुछ बदल चुका है। यह बदलाव न तो इकहरा है और न ही इकतरफा क्योंकि सोच-समझ के नए फैसले सब जगह लागू हो रहे हैं। फिल्म निर्माण की बड़ी दुनिया में महिलाओं की दमदार दखल पहले से थी। सिनेमा एक मुश्किल और सामूहिक माध्यम है। अभी तक अपने कोने में कविता और कहानी लिख रही स्त्री कैमरे की अहमियत समझने लगी है। वह कैमरे से कलम का काम ले रही है। बात करें हिंदी साहित्य की तो यहां कैमरे का प्रयोग कुछ अलग तरीके से हुआ और इसे हिंदी की रचनात्मक दुनिया की समृद्ध प्रयोगधर्मिता के तौर पर देखने की जरूरत है।

हिंदी सिनेमा और कला के संबंध में तीन नाम अहम हैं। पहला फणीश्वरनाथ रेणु, दूसरा मनोहरश्याम जोशी और तीसरा साहित्य से थोड़ा बाहर आ जाएं तो एमएफ हुसैन। अलग-अलग कारणों से ये सब फिल्म में गए। मनोहर श्याम जोशी ने जब ‘कसप’ लिखा था तो उस समय यह बात कही गई थी कि ‘कसप‘ या ‘कसप’ के आसपास जो उन्होंने चीजें लिखीं वह नए समय का लेखन है। उन्होंने इस सवाल का रचनात्मक जवाब मुहाया कराया कि तकनीक से लैस पाठकों-दर्शकों को आप कैसा गद्य देंगे।

नामवर सिंह ने रेणु के बारे में कहा था कि ये बंदा कलम से कैमरे का काम लेता है। यानी हिंदी में कैमरे की कमी पहले से उद्धृत की जा जुकी है। जहां तक सामूहिकता की बात है तो कलम उतना काम नहीं कर पाती है जितना कैमरा करता है। एक अहम बात है कि एमएफ हुसैन के प्रयोग को खास लोगों ने तो सराहा लेकिन उनका प्रयोग चला नहीं। यानी कैमरा तो कलम बन गया लेकिन तूलिका बनने में अभी उसे संघर्ष करना पड़ रहा है।

आज कैमरा अपने आप में एक स्कूल बन गया है और महिलाएं उसमें मास्टरी कर रही हैं। सारे नियमों को तोड़ कर गली-मोहल्लों में नए तरह का सिनेमा बनाया जा रहा है। कोई कैमरा को सीधा पकड़ रहा है तो कोई उलटा। कोई चीजों को बहुत नजदीक से देख रहा है तो कोई बहुत दूर से। परिवेश, कल्पना और आंतरिक अभिव्यक्ति की यह दुनिया न सिर्फ अपनी बनावट में नईहै बल्कि काफी रचनात्मक तौर पर खासी घनी भी है।

Next Stories
1 कविता: अबकी बार जो मिलोगे
2 द लास्ट कोच: मैं फिर आऊंगी
3 कविता: इंसानों की दुनिया के लिए
यह पढ़ा क्या?
X