सुबह के पांच बजे थे, लेकिन सूरज जैसे सिर पर चढ़कर खड़ा हो। सीमा की आंख खुली तो उसे लगा कि रात जैसे आई ही नहीं। पसीना उसकी गर्दन से होते हुए पीठ तक बह रहा था। उसने पंखे की तरफ देखा, वह अपनी पूरी ताकत से घूम रहा था, पर हवा में ठंडक नहीं, सिर्फ गर्मी घुली हुई थी।

वह धीरे से उठी, बाथरूम में गई और नल खोला। पानी भी गुनगुना था। उसने जैसे-तैसे नहा लिया, लेकिन बाहर आते ही फिर वही हालत—पसीना, चिपचिपाहट और घुटन।

‘अब तो नहाना भी मजाक हो गया है’, उसने खुद से कहा और रसोई की तरफ बढ़ गई।

रसोई में कदम रखते ही ऐसा लगा जैसे किसी भट्टी के सामने आ गई हो। गैस जलाते ही गर्मी दोगुनी हो गई। उसका उस रोज खाना बनाने का बिल्कुल मन नहीं था। दिल चाहता था कि बस कुछ फल खा ले, ठंडा पानी पी ले और दिन काट दे। लेकिन घर था, परिवार था और जिम्मेदारियां थीं, जो चाहने या न चाहने से नहीं रुकतीं। वह चुपचाप सब्जी काटने लगी।

थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला। उसका पति अमित बाहर से आया। उसके कपड़े पसीने से भीगे हुए थे।

‘आज तो बाहर आग बरस रही है,’ उसने आते ही कहा।

सीमा ने उसकी तरफ देखा और हल्की सी मुस्कान के साथ बोली—

‘अच्छा, यहां ठंड लग रही है क्या?’

अमित ने उसकी बात को अनसुना कर दिया। फ्रिज से बोतल निकालते हुए बोला—

‘कुछ ठंडा बना दो पहले, फिर बाद में खाना खा लेंगे।’

सीमा ने बिना कुछ कहे सिर हिला दिया।

दोपहर तक रसोई में खड़े-खड़े गर्मी के मारे उसका सिर भारी हो गया था। फिर भी बिना उफ्फ किए उसने खाना तैयार किया। सब खाने बैठे। पहला कौर मुंह में डालते ही बेटे ने मुंह बनाया—

‘मम्मी, आज सब्जी अच्छी नहीं बनी।’

अमित ने भी बिना देखे कह दिया—

‘थोड़ा नमक कम है शायद?’

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सीमा ने एक पल के लिए सबकी तरफ देखा। बिना कुछ बोले उठकर फिर से रोटी सेंकने लगी। उसके अंदर कुछ खौल रहा था। शायद वही गर्मी, जो बाहर थी, अब अंदर भी जगह बना चुकी थी। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती।

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

सीमा ने जाकर दरवाजा खोला तो देखा, बाहर एक दुबला-पतला नन्हा सा बच्चा खड़ा था। चेहरा धूल से भरा हुआ, होंठ सूखे हुए।

‘आंटी, पानी मिलेगा?’ उसने धीमी आवाज में पूछा।

सीमा कुछ कहती, उससे पहले अंदर से अमित की आवाज आई—

‘अरे, हर रोज आ जाते हैं। अपने घर जाकर पियो न पानी। यहां कोई नदी बह रही है क्या? आगे भेजो इसे।’

सीमा एक पल के लिए ठिठकी, फिर बिना कुछ बोले अंदर गई, गिलास में पानी भरा और बाहर आकर बच्चे को दे दिया। बच्चे ने पानी ऐसे पिया जैसे कई दिनों की प्यास बुझा रहा हो। उसकी आंखों में एक अजीब सी राहत थी।

‘धन्यवाद’, कहकर वह चला गया।

सीमा दरवाजे पर खड़ी उसे जाते हुए देखती रही।

शाम को अमित गाड़ी लेकर बाहर निकला। थोड़ी देर बाद वापस आया तो चिढ़ा हुआ था।

‘यार, एक तो पहले ही इस देश में किसी को गाड़ी चलाने का सलीका नहीं है, ऊपर से इतनी गर्मी में एक भी पेड़ नहीं बचा इस इलाके में। गाड़ी इतनी गरम हो जाती है कि बैठना मुश्किल हो जाता है।’

सीमा ने धीमे स्वर में कहा—

‘पेड़ लगाने का समय किसके पास है।’

अमित ने उसकी तरफ देखा, मगर कुछ बोला नहीं।

रात होने लगी, लेकिन गर्मी कम होने का नाम नहीं ले रही थी। दीवारें जैसे दिन भर की आग उगल रही थीं। घर के अंदर हवा ठहरी हुई थी, भारी और तपती हुई।

सीमा कुछ सोचकर छत पर चली गई। आसमान में तारे भी जैसे थके हुए लग रहे थे। चारों तरफ सीमेंट ही सीमेंट थी। न हरियाली, न ठंडी हवा।

वह चुपचाप वहीं बैठ गई। उसे अपने बचपन का घर याद आने लगा। आंगन में बड़ा सा नीम का पेड़, दोपहर की ठंडी छांव और मिट्टी की वह सोंधी खुशबू। तब इतनी गर्मी भी नहीं लगती थी।

‘या शायद’, उसने सोचा, ‘तब हम इतने बिगड़े हुए नहीं थे।’

अचानक उसकी नजर नीचे गली में गई। वही बच्चा फिर दिखा। इस बार हाथ में खाली बोतल लिए, पानी की खोज में इधर-उधर देखता हुआ। उसे ऐसी हालत में देखकर सीमा का दिल कसमसा गया।

वह तुरंत नीचे उतरी, रसोई में गई और एक मटका पानी से भर दरवाजे के बाहर रख दिया। पास में एक छोटी सी तश्तरी में भी पानी भरकर रख दिया पक्षियों के लिए।

अमित यह सब देख रहा था।

‘इससे क्या फर्क पड़ेगा?’ उसने पूछा।

सीमा ने उसकी तरफ देखा। इस बार उसकी आंखों में थकान नहीं, एक ठहराव था।

‘फर्क पड़े या न पड़े, शुरुआत तो करनी होगी’, उसने शांत स्वर में कहा।

अमित चुप हो गया।

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अगले दिन सुबह वही बच्चा फिर आया। इस बार उसने खुद मटके से पानी लिया। पीकर उसने इधर-उधर देखा, फिर वहीं मटके के पास ही बैठ गया। थोड़ी देर बाद एक चिड़िया आई और तश्तरी से पानी पीने लगी।

सीमा खिड़की से यह सब देख रही थी। उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई।

धीरे-धीरे मोहल्ले के दो-तीन और लोग भी उस मटके का इस्तेमाल करने लगे, खासकर सड़क पर खेलते बच्चे। किसी ने कुछ कहा नहीं, लेकिन सबको जरूरत थी।

एक दिन पड़ोस की औरत आई और बोली—

‘अच्छा किया तुमने यह रख दिया। बच्चों को बहुत दिक्कत हो रही थी पानी की। भगवान तुम्हें खुश रखे। भूखे को भोजन कराना और प्यासे को पानी पिलाने से बड़ा और कोई पुण्य नहीं होता, बेटी।’

सीमा ने बस मुस्कुरा दिया।

उस दिन अमित घर आया तो उसके हाथ में एक छोटा सा पौधा था।

‘सोचा, इसे बाहर लगा देते हैं।’ उसने थोड़ा संकोच से कहा।

सीमा ने उसकी तरफ देखा। इस बार उसकी आंखों में हल्की सी चमक थी।

‘हां! क्यों नहीं, चलो लगाते हैं।’