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तपनी- पढ़िए सुशील कुमार फुल्ल की कहानी

ज्‍वाला प्रसाद ने अपनी मिचमिचाती आंखों से देखते हुए कहा- ‘गणेशी, अभी धुंआ उठना भी शुरू नहीं हुआ।’

तपनी- पढ़िए सुशील कुमार फुल्ल की कहानी
सांकेतिक फोटो।

सुशील कुमार फुल्ल

‘हां, तुम ठीक कहते हो, पर नई पीढ़ी को कौन समझाए। इन्हें हर बात में जल्दी रहती है।’‘हमें बैठे हुए डेढ़ घंटा हो गया। इतने में तो हनुमान जी ने लंका को जला कर राख कर दिया था। बेवजह बैठे रहना कितना अटपटा लगता है। पर क्या करें?’

गणेशी लाल ने अपने अंदाज में कहा- ‘ये नए जमाने के लोग हैं। काम-धाम कुछ आता नहीं, लेकिन कहीं भी नंबर बनाने के लिए उछल-उछल कर आगे तो हो जाते हैं, पर कर कुछ नहीं पाते। अनुभव के बिना ऐसे काम संभव नहीं होते। अब देखो न, इन्होंने गत्ते डाल दिए। गत्ते तो आग को रोकते हैं। दो-चार सूखे पूले लाते तो आग एकाएक धधक उठती। दरअसल, चिता को चिनने का अपना ढंग होता है। कुछ इस प्रकार लकड़ियों को रखा जाता है कि मुखाग्नि देते ही चिता आग पकड़ ले। और फिर बीच-बीच में घी भी तो डालते चलते हैं।’‘और अब तक हम जा चुके होते।’ ज्वाला प्रसाद ने वाक्य पूरा किया।

तभी ओंकार ने कहा- ‘अरे ज्वाला प्रसाद जी, आप तो कुछ दिन पहले अमेरिका से फेसबुक पर अपने फोटो डाल रहे थे।’ ‘तो, क्या मनाही है? वैसे, मुझे तो फोटो-वोटो डालने नहीं आते, पर पोते-पोतियां डाल देते हैं।’ ज्वाला प्रसाद ने व्याख्या की।‘तुम्हें वह दो इन्क्रीमेंट्स तो मिल गई थीं न?’ फंटू ने ज्वाला प्रसाद को छेड़ने के लिए पूछा।


‘तुम्हें बड़ी चिंता है। रिटायरमेंट से पहले तुम्हीं तो सबसे ज्यादा विरोध किया करते थे। अब पेंशनर हैं। जो मिलता है ठीक है।’ ज्वाला प्रसाद ने शांत भाव से कहा। वे जानते थे कि फंटू उनकी दुखती रग को जानबूझ कर छेड़ रहा था। उन्हें चार अतिरिक्त इन्क्रीमेंट्स मिली थीं, पर शरारती लोगों ने आपत्तियां उठा दीं और फाइल बीस साल तक घूमती रही, फिर थक-हार कर बंद हो गई। कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो सारी उम्र खुराफातों में ही लगे रहते हैं। फंटू भी उन्हीं में से एक था।

‘मिल जातीं तो पेंशन में फरक पड़ जाता।’ फंटू ने सहानुभूति की मुद्रा बनाई। फिर कहा, ‘आजकल तो महंगाई भी आसमान छूने लगी है। एलपीजी ही एक हजार के पार हो गई है। पता नहीं क्या होने वाला है।’‘अरे, चिंता न करो। अभी जो पेंशनर्स को संशोधित वेतनमान के आधार पर वृद्धि मिलने वाली है, वह तो कहते हैं, सारे रिकार्ड तोड़ देगी। डाक्टरों के तो पैंतीस-पैंतीस हजार रुपए महीना बढ़ रहे हैं।’ ‘अरे, हम कोई डाक्टर थोड़े ही हैं। पर, कुछ न कुछ तो हमारा भी बढ़ेगा ही।’ ‘हां, हां, क्यों नहीं। बस थोड़ा धैर्य रखो।’अब चिता से थोड़ा-थोड़ा धुआं निकलने लगा था।

कमलेश नया-नया रिटायर हुआ था। वह उन लोगों के पास आकर खड़ा हो गया। कुछ देर वह उनकी नोंक-झोंक सुनता रहा, फिर बोला- ओंकार जी, आपको रिटायर हुए कितने वर्ष हो गए?’‘यही कोई पंद्रह-सोलह वर्ष।’ उन्होंने विस्मय से उसकी ओर देखते हुए जवाब दिया।‘तब तो हो लिया आप का काम।’ कह कर वह अजीब-सी हंसी हंसा। ओंकार को गुस्सा आया, वह बोला- ‘तो अभी बैठ जाऊं जाकर चिता पर?’

‘कमलेश, तुम तो शायद पट्टा लिखवा कर आए हो कि कभी मरोगे नहीं। मूर्ख कहीं का।’ ज्वाला प्रसाद ने कहा। उन्होंने सिर घुमा कर इधर-उधर देखा- अधिकतर लोग पेंशनर थे, जो आगे-पीछे रिटायर हुए थे। अरे, क्या सभी इसलिए ऐसे स्थान पर आते हैं कि वे अपनी बारी का इंतजार कर रहे होते हैं।
‘इस देह का गुमान नहीं करना चाहिए। पता नहीं कब हवा निकल जाए। वह बड़ा दिल का डाक्टर बना फिरता था। पता भी नहीं चला, जब स्वयं उसे दिल का दौरा पड़ गया और वह चलाना कर गया।’

तभी दो अधेड़ वहां पंहुचे और जोर-जोर से चिल्लाने लगे- ‘पहले सारा हिसाब करेंगे, फिर तभी यहां से अस्थियां उठाने देंगे।‘अरे, समय की नजाकत तो देखो। यह समय बखेड़ा खड़ा करने का नहीं। आपके चाचा थे, तो यह तो बहुत ही नजदीक की रिश्तेदारी है। लेनदेन अगर कोई रही हो तो बाद में भी निपटा जा सकता है।’‘बाद में कौन पूछता है। इतने साल हो गए, जब चाचा ने मेरे पिता से पचास हजार लिए थे। पैसे कोई पेड़ों पर तो नहीं उगते। कुछ भी हो जाए, आज फैसला होकर ही रहेगा।’ वह गुर्राया।

‘भाई जी, यहां तो तमाशा न करो। मैं आश्वस्त करता हूं कि यह क्रिया-कर्म पूरा हो ले, मैं तुरंत आपका कर्जा उतार दूंगा।’ ‘ऐसे वादे तो बीसियों बार सुन चुका हूं। यह ढकोसला और नहीं चलेगा।’ ‘देखो बच्चो, आप मेरी बात सुनो। जिन लोगों पर आपको विश्वास हो, उनका नाम ले दो। हम उन्हें ही यह दायित्व सौंप देंगे। कोई नहीं मुकरेगा। जो वचन यहां दिया जाएगा, उसका पालन होगा। आप निश्चिंत रहें।’

‘अरे ये लोग झूठ का पुलिंदा हैं। मुझे इन पर रत्ती भर भी विश्वास नहीं। मैं अस्थियां नहीं उठाने दूंगा।’ ‘अक्ल से काम लो। समय की नजाकत समझो। हम जो बुजुर्ग लोग यहां बैठे हैं, वे पूरा ध्यान रखेंगे। अभी चिता जली भी नहीं कि आप लोगों ने व्यर्थ का बखेड़ा खड़ा कर दिया।’ बुजुर्ग पंचम ने कहा।
लपटें उठने लगी थीं। वे दोनों क्षण भर के लिए शांत हो गए।

‘भाई ज्वाला प्रसाद जी, अब तो लपटें निकलने लगी हैं, चलो लकड़ी डाल आएं।’ गणेशी ने कहा। ‘अरे, पहले बताओ, समय क्या हुआ है?’
‘पौने दो बज गए हैं।’‘ओहो, मैंने तो दो बजे अपनी पोती को स्कूल से लेना था। उसकी मां मुझ पर झल्लाएगी। मेरी लकड़ी भी आप ही डाल देना। नासुकरों ने दाह संस्कार में ही दिन निकाल दिया। मैं जा रहा हूं।’ और वे हड़बड़ाहट में वहां से उठ कर चले गए।

श्मशान घाट का परिसर किसी पांच सितारा होटल के प्रतीक्षा परिसर-सा बना दिया गया था। दानवीर वहां बढ़िया से बढ़िया बेंच देखना चाहते थे, ताकि लोग आराम से बैठ कर चिता के धधकने का इंतजार कर सकें।हाथ-मुंह धोने के लिए पानी और नई किस्म की टोंटियों की व्यवस्था थी। पर्यावरण को बनाए रखने के लिए पेड़-पौधे लगा दिए थे किसी पर्यावरण प्रेमी ने। ज्वाला प्रसाद सोच रहा था कि दिव्यांगों के लिए जो नगरपालिका ने रैन बसेरा बनाया है, वह तो इतना साफ-सुथरा नहीं, जितना यह श्मशान घाट। शायद यहां लोगों ने जो चंदा दिया है, उनके नाम बोर्डों पर मोटे अक्षरों में लिखे गए हैं।

परलोक गमन के लिए प्रवेश शुल्क या प्रचार की भूख, जो भी हो, इस बहाने कुछ अच्छा तो हुआ ही है। दूसरी बेंच पर बैठे बुजुर्ग कह रहे थे- ‘बेचारा जल्दी चला गया।’ ‘उसकी हसरत मन में ही रह गई कि एक बेटा तो हो जाता। लड़कियां ही टपकती रहीं।’ साथ बैठे व्यक्ति ने कहा।‘अरे, इस युग में भी वही बातें।’‘अरे क्या हो गया, प्रो ज्वाला प्रसाद क्यों भागे जा रहे हैं?’

‘चार बेटों का बाप है। स्कूल से बच्चे लाने हैं। लेट हो गए, सो दौड़ लगाई है। तपनी में आकर भी चैन नहीं। पहले कहते थे कि तपनी में आकर श्मशान बोध होता है, पर यहां भी लोग फेसबुक में ही खोए हुए हैं या फिर ज्वाला प्रसाद जी की भांति भागे जा रहे हैं। पर समय को कब कौन बांध पाया है।’ ओंकार ने कहा।‘कुछ भी हो, समय तो ठहरता नहीं। चलो हम भी अब उठें और लकड़ी डाल आएं।’सब हाथ में चंदन की छोटी-छोटी तीलियां लेकर चिता की ओर बढ़ गए। उन्हें लगा, उन्होंने गंगा नहाने का पुण्य प्राप्त कर लिया था।

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First published on: 02-10-2022 at 11:14:26 pm