इन दिनों सोशल मीडिया के गदाधारियों ने एक नई राजनीतिक ‘खलनायिका’ पैदा की है। चार मई के पहले यही राजनेता एक नायिका के तौर पर देखी जा रही थीं। लेकिन चार मई को बंगाल विधानसभा चुनाव की घोषणा होने के बाद सयोनी घोष को लेकर आभासी आबादी जिस तरह अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर रही है, उससे आभास होता है कि राजनीति में स्त्री तभी तक पूजनीय है, जब वह किसी तरह बड़ी जीत लेकर खुद को कथित तौर पर दुर्गा, काली साबित करे। स्त्री किसी कारणवश साधारण साबित होती है तो राजनीतिक परिदृश्य में उसके लिए कोई जगह नहीं होगी।
याद कीजिए पिछला बिहार विधानसभा चुनाव। चुनाव के पहले राष्ट्रीय जनता दल की प्रवक्ता कंचना यादव और प्रियंका भारती की मीडिया के मंचों पर तूती बोल रही थी। दोनों प्रवक्ता मुखर तरीके से सत्ता-पक्ष का विरोध कर विपक्ष की आवाज बन रही थीं।
हर चैनल पर उनकी मांग थी, क्योंकि दर्शक उनके तर्क सुनना पसंद करते थे, फिर चाहे वे सत्ता-विरोधी क्यों न हों। बिहार विधानसभा चुनाव में राजद की हार का ठीकरा इन्हीं दोनों पर फोड़ा जाने लगा। ये दोनों प्रवक्ता वही बोल रही थीं जो राजद की विचारधारा थी। लेकिन आभासी आबादी ने कहा, इन वाचाल स्त्रियों के कारण ही चुनाव में राजद की हार हुई। ऐसा ठीकरा किसी पुरुष प्रवक्ता पर नहीं फोड़ा गया। प्रियंका भारती की शक्ल-सूरत पर अभद्र टिप्पणियां होने लगीं।
अंग के बाद बंग की राजनीति में सयोनी घोष के भाषण के अंश आम लोगों के मोबाइल पर आ रहे थे। चाहे संसद में उनका भाषण हो या बंगाल के दूर-दराज के गांवों में उनका चुनाव प्रचार। इंटरनेट का बाजार उन्हें दृश्यता दे रहा था। बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के सारे प्रचारक एक तरफ थे तो सयोनी घोष एक तरफ।
बंगाल के नतीजे आने के बाद इंटरनेट पर सयोनी घोष की दृश्यता तो बरकरार रही, लेकिन अब आभासी आबादी उन्हें लेकर पूरी तरह नकारात्मक है। जब गंभीर जगहों पर बंगाल चुनाव में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की भूमिका पर बात हो रही है तो इंटरनेट का समुदाय आरोप लगा रहा है कि तृणमूल इसलिए हारी क्योंकि सयोनी घोष आंखों में काबा और दिल में मदीना वाले गीत गा रही थीं। वैचारिक रूप से तृणमूल धर्मनिरपेक्ष राजनीति का प्रतिनिधित्व करती है तो सयोनी घोष पार्टी की विचारधारा पर ही चलेंगी।
अब कृत्रिम मेधा के जरिए पितृसत्ता रचनात्मक तरीके से घोष की गरिमा का हनन कर रही है। एक स्त्री नेता के रूप में सयोनी घोष को दोहरी हार की मार झेलनी पड़ रही है। उनकी पार्टी हार कर सत्ता से बाहर हो गई है और वे निजी तौर पर अभद्रता झेल रही हैं। ऐसा सिर्फ विपक्ष की स्त्री नेताओं के साथ नहीं हो रहा है। बात चाहे कंगना रनौत की हो या फिर मैथिली ठाकुर की, इन दोनों को भी राजनीतिक विचारधारा के परे स्त्री होने के कारण अभद्र भावों की हिंसा का शिकार होना पड़ता है।
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पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सोमवार को तेजी से कदम उठाते हुए तृणमूल कांग्रेस (TMC) के चुनाव प्रचार के सबसे बड़े मुद्दों में से एक को बेअसर कर दिया। उन्होंने घोषणा की कि नई बीजेपी सरकार के तहत बंगाल में ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना और अन्य सभी मौजूदा कल्याणकारी कार्यक्रम जारी रहेंगे। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
