ताज़ा खबर
 

नृत्य : मुरली की धुन पर पग ताल

इंडिया हैबिटाट सेंटर में स्वरमई और सुर सागर सोसायटी ऑफ दिल्ली घराना ने मिलकर दो रोज के समारोह का आयोजन किया।

ओडिशी नृत्यांगना झेलम परांजपे मुरली की धुन पर नृत्य करतीं हुईं।

ओडिशी नृत्यांगना झेलम परांजपे का सौभाग्य रहा कि उन्हें गुरु केलु चरण महापात्र का सानिध्य मिला। उनके नृत्य में गुरु के अंदाज में अंगों के बरतने और भाव का बर्ताव व अंदाज दिखता है। नृत्यांगना झेलम ने कई तरह के प्रयोग अपने नृत्य में किए हैं। पिछले दिनों उन्होंने प्रतिबिंब-सहस्र स्वरप्रभा समारोह में डा प्रभा अत्रे की गाई बंदिशों पर ओडिशी नृत्य पेश किया। उनकी प्रस्तुति की खासियत रही कि हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के रागों की बंदिशों पर आधारित नृत्य में ओडिशी के परंपरा के अनुरूप नृत्य प्रस्तुत किया गया।

इंडिया हैबिटाट सेंटर में स्वरमई और सुर सागर सोसायटी ऑफ दिल्ली घराना ने मिलकर दो रोज के समारोह का आयोजन किया। समारोह की दूसरी शाम 19 अप्रैल को नृत्यांगना झेलम परांजपे ने मंगलाचरण से नृत्य आरंभ किया। इसके लिए उन्होंने राग दुर्गा में एक ताल की दो बंदिशों का चयन किया था। पहली विलंबित लय की बंदिश-‘मां जगदंबा कालिका सुन ले’ और दूसरी द्रुत लय की बंदिश-‘जयति-जयति जगत जननी’ थी।

अगले अंश में झेलम ने राग तेलंग की बंदिशों का चुनाव किया। इसके बोल थे-‘कान्हा माने ना माने ना’ और ‘जादू भरी तोरी मुरली कन्हाई’। यह बंदिशें तीन ताल में निबद्ध थीं। इन बंदिशों में नायिका राधा कृष्ण से राह छोड़ने को कहती है। कृष्ण उसे जाने नहीं देते और उसे नृत्य करने को कहते हैं। नायिका कृष्ण को मनाने के लिए नृत्य करती है, जिसे नृत्यांगना झेलम व पल्लवी अभिनय के जरिए दर्शाती हैं। इसी के विस्तार में नायक कृष्ण बांसुरी बजाने लगते हैं। नायिका कृष्ण को बांसुरी ना बजाने को कहती है। वह बांसुरी को अपने आंचल में, गागर के पानी में, धरती की मिट्टी में छिपा देती है। पर बांसुरी बजना बंद नहीं होता। अंत में, नायिका कृष्ण को बांसुरी लौटा देती है। इस प्रसंग का चित्रण झेलम ने अपने नृत्य अभिनय में बहुत सुघड़ता से किया।

राग नायकी कान्हड़ा में दादरा और एक ताल में निबद्ध बंदिशें थीं। रचना के बोल थे-‘बसंती चुनरिया लाओ सईयां’ और ‘अजहुं ना आयो मोरे संवरिया’। इसमें नृत्यांगना झेलम ने एक ओर अभिसारिका नायिका तो दूसरी ओर विरहिणी नायिका के भावों को दर्शाया। उनके मुखाभिनय और आंगिक अभिनय में अच्छा तारतम्य था। उन्होंने अपनी प्रस्तुति में राग शंकरा की बंदिशों को भी शामिल किया।

दरअसल, नृत्यांगना झेलम परांजपे ने एक अच्छी कोशिश की। उन्होंने ओडिशी के फलक में एक और आयाम जोड़ा। जबकि, हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की वरिष्ठ कलाकार विदुषी डा प्रभा अत्रे एक अच्छी परफॉर्मर और वाग्येकार रही हैं। उन्होंने मंच पर गायन पेश करने के साथ-साथ बंदिशों की रचनाएं की हैं। उनकी बंदिशों में नवीनता के साथ परंपरा का सहज निर्वाह नजर आता है। दो कलाकार मिलकर एक-दूसरे की विधा और काम का सम्मान करते हैं, तभी इस तरह की संभावना बनती है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App