सुमि गिलहरी बहुत मेहनती है। उसे चंपकवन के जंगल में आए अभी कुछ दिन ही हुए हैं। सुमि की बुआ यहां रहती है। सुमि गिलहरी को नृत्य करने का बेहद शौक है। मगर उसे कोई सिखाने वाला तक नहीं। वह अपने मन में कुछ भी कल्पना करती और नाचती रहती थी। एक बार बुआ उसके घर आई थी। बुआ उसे देखती ही रह गई। ‘अरे, वाह, वाह तुम तो बहुत ही बढ़िया कमर हिला लेती हो सुमि। तुम्हारे शरीर में भरपूर ऊर्जा है। नृत्य करते वक्त चेहरे पर अदाएं भी लाती हो।’ बुआ ने उसकी तारीफ की। सुमी ने कहा, ‘ओह, बुआ लेकिन इस जंगल में मुझे कोई सिखाने वाला नहीं है। बिना प्रशिक्षण के तो मैं कुछ भी नहीं कर पाऊंगी।’ ‘ओह सुमि।’ बुआ की जुबान से निकला।

‘बुआ मुझे अच्छी नृत्यांगना बनना है। मैं चाहती हूं कि नृत्य की इस कला में कुछ अनोखा सा करके दिखा दूं। मगर मैं तो इतना कुछ जानती नहीं। बस किसी धुन को सुनकर कमर हिला लेती हूं, पैर चला लेती हूं। मुझे नृत्य की शास्त्रीयता का कुछ भी ज्ञान नहीं।’ ऐसा कहते हुए सुमि ने वहीं पर अपनी कमर को मटकाना शुरू कर दिया। उसके पैर तो बहुत ही अच्छे ढंग से चल रहे थे। बुआ देखती रह गई।

‘चलो सुमि, तुम चंपकवन चलो। वहां एक नृत्य का आयोजन हो रहा है। तुमको शायद कुछ सीखने को मिले।’ बुआ ने उसके सामने प्रस्ताव रखा। ‘ओह, बुआ, सच, एक नृत्य आयोजन! बुआ आप सच में मुझे वहां ले जा रही हैं? मुझे तो यकीन नहीं हो रहा है कि मेरी इच्छा इतनी जल्दी पूरी हो जाएगी।’ सुमि की खुशी का ठिकाना न था। ‘अरे, हां मेरी बच्ची तुम बता रही थी कि चार दिन का अवकाश है। तो फिर सोचो मत। अब चलो मेरे साथ।’ सुमि का तो जैसे सपना सच हो रहा था। उसने बैग में सामान समेटा और बुआ के साथ चंपकवन आ गई।

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बुआ ने उसे बताया, ‘सुमि, अनुशासन सबसे पहले जरूरी है। इससे ही नृत्य में एक अनोखापन आता है। साथ ही, एक अच्छे नर्तक को खूब पानी पीना चाहिए। फास्ट फूड तो बिल्कुल नहीं खाना चाहिए। समय पर सोना और जागना चाहिए। अच्छी चीजें पढ़नी चाहिए। अच्छा संगीत सुनना चाहिए। इससे तन और मन दोनों चुस्त-दुरुस्त रहते हैं।’ ‘जी बुआ। आप सही कह रही हैं। मैं आपकी हर बात का पालन करूंगी।’ सुमि ने उत्साह से कहा। उसे तो बहुत ही आनंद आ रहा था।

शाम को बुआ उसे मैदान में ले आई। चंपकवन में उसे मजा आया। सभी लोग नृत्य समारोह के लिए इंतजार कर रहे थे। वहां एक मंच बना हुआ था। बबलू भालू ढोलक बजा रहा था। हरियल तोता हारमोनियम पर था। बनकू बकरी बांसुरी बजा रही थी। तभी जानी मानी नृत्यांगना गिलानी गिलहरी मंच पर आई। उन्होंने अपने मनमोहक नृत्य से सभी को ताली बजाने पर मजबूर कर दिया।

सुमि से तो रहा नहीं गया। वह अपनी सीट पर ही उछलकर जैसा भी हो सकता था गिलानी जी की तरह नृत्य की नकल कर रही थी। खिलखिल खरगोश और ललित लोमड़ सहित कुछ ने उसे फटकार कर बिठाया। पीछे बैठे अन्य दर्शक भी सुमि से नाराज हो गए। लेकिन बैठने के बाद भी संगीत की धुन पर सुमि के शरीर का थिरकना जारी रहा। यह गिलानी जी ने मंच से साफ देख लिया था। नृत्य समाप्त हुआ तो गिलानी जी ने उसे संकेत करके अपने पास बुलाया। पहले तो सुमि समझ ही नहीं पा रही थी कि गिलानी जी उसे संकेत दे रही हैं।

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वह इधर-उधर देखने लगी। गिलानी जी ने दुबारा और सटीक संकेत दिया तो सुमि भागकर गई। उसे भरोसा ही नहीं था कि उसके सामने गिलानी जी हैं। इतने करीब। गिलानी जी ने पूछा, ‘तो तुमको भी नृत्यांगना बनना है ना? मैं गलत तो नहीं बोल रही हूं?’ ‘जी जी बनना है।’ सुमि ने कांपती हुई आवाज में कहा। ‘तो ठीक है। मैं चंपकवन में तीन दिन की कार्यशाला कर रही हूं। तुम आना और सीखना। मेरे सहायक से तुम कार्यशाला का पूरा विवरण ले लेना। और हां, समय पर आ जाना।’

‘जी, मगर मेरे पास घुंघरू ही नहीं हैं।’ सुमि सुबकने लगी। उसका सुबकना देख कर गिलानी जी परेशान हो गईं। फिर उन्होंने कहा, ‘अरे यह लो मेरे घुंघरू, उदास न हो। कार्यशाला में जरूर आना।’

गिलानी जी ने उसे अपने बैग से घुंघरू दिए तो उनके मुख्य सहायक काकू कौए ने हस्तक्षेप किया, ‘यह तो बहुत महंगे हैं। और, इस छोटी सी बालिका को आपने ऐसे ही दे दिए। आप इसके बारे में जानती ही क्या हैं। हमें क्या पता कि इसे नृत्य की कितनी कद्र है।’

‘ओह, कालू तुम तो मेरे साथ बरसों से हो। मेरे पहले के जीवन के बारे मेंसब कुछ जानते तो हो। मेरे साथ भी हालात ऐसे ही थे। मैं गरीब परिवार से आती थी और काफी अभाव देखा है। न पोशाक थी, न घुंघरू थे। आज मेरे पास दौलत, शोहरत सब है। तो मुझे भी उभरती हुई प्रतिभा की हौसलाअफजाई करनी चाहिए कि नहीं। वरना इसका हुनर तो दबकर रह जाएगा।’ कालू ने गिलानी जी की उदारता के लिए उनको झुककर प्रणाम किया। सुमि के सपने सच होने वाले थे। उसकी खुशी का ठिकाना न था।