‘नहीं, मुझे ही राम की भूमिका निभानी है। देखो मैं कितना सुंदर हूं, पढ़ाई में भी अच्छा हूं।’ करण चिल्लाते हुए बोला। उस समय उसके मम्मी-पापा के साथ वहां चिंकी के दादा-दादी, नूपुर के चाचा, मलय के पापा थे, उसके स्कूल की शालू मैम भी थीं, जो उन्हीं की सोसायटी में रहती थीं। करण को सब जानते थे कि वह बहुत गुस्से वाला है और किसी का अपमान करने में उसे पल भर भी नहीं लगता है। सुंदर है, उसके पापा अमीर हैं, इस बात का भी उसे घमंड था।
‘देखो बेटा, राम के संवाद पंकज ज्यादा बेहतर ढंग से बोल पा रहा है। इसलिए वही उपयुक्त है इस भूमिका को निभाने के लिए।’ उसकी मम्मी ने कहा। ‘लेकिन वह तो सुंदर नहीं है, उसके दादाजी के पास हमारी तरह बहुत सारे पैसे भी नहीं हैं। उसके तो मम्मी-पापा भी नहीं हैं, वह कैसे राम बन सकता है। पापा ने रामलीला के लिए कितना चंदा दिया है। मुझे नहीं बनना हनुमान, मैं तो राम ही बनूंगा। मैं क्या बंदर जैसा दिखता हूं?
पंकज के चेहरे पर उदासी छा गई थी। उसके माता-पिता की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई और दादाजी जैसे-तैसे उसकी देखभाल कर रहे हैं तो इसमें उसकी क्या गलती है? करण की मां उसे खींचते हुए घर ले गईं। वह बहुत शर्मिंदा थीं। उन्हें लग रहा था कि उन्हीं के लाड़-प्यार ने उसे इतना बददिमाग बना दिया था। कितना सुंदर है, कहते नहीं थकती थीं। वह ही क्या जो भी उसे देखता, कितना प्यारा है, कह उसे अपने से चिपटा लेता था। उस दिन सबका मन उखड़ गया।
इस बार सोसाइटी के लान में ही छोटे स्तर पर रामलीला का आयोजन करने का निर्णय लिया गया था। तय किया गया था कि प्रदूषण मुक्त उत्सव मनाने के तौर पर दशहरे के दिन रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले नहीं जलाएंगे। हर व्यक्ति मन ही मन संकल्प करेगा कि वह अपने भीतर की किसी बुराई को अग्नि में भस्म करेगा।
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‘करण की बातों का बुरा मत मानना, वह कुछ भी बोल देता है’। शालू मैम थोड़ी देर बाद घर आईं तो पंकज से बोलीं। ‘रूप-धन किसी इंसान की विशेषताओं या गुणों का निर्धारण नहीं करता है। उसका स्वभाव और दूसरों के प्रति व्यवहार और परिस्थितियों का सामना करने की सहनशीलता ही इंसान के गुण-दोषों का आकलन करती है। रावण इतना बलशाली था, सुदर्शन था, विद्वान था, बड़े साम्राज्य का स्वामी था, लेकिन उससे क्या हुआ, अपने अहंकार की वजह से वह मारा गया। यह तो सदियों से होता चला आ रहा है कि बुराई चाहे किसी भी रूप में क्यों न हो, उसका अंत होता ही है। केवल अभिनय करना ही काफी नही होता, जो मंचित किया जा रहा है, उसे जीवन में उतारना भी जरूरी है। राम की भूमिका तुम ही करोगे।’
‘मैम, करण को राम बना दीजिए, मैं हनुमान बन जाऊंगा। हनुमान ने तो पूरी लंका में आग लगाकर रावण के अहंकार को स्वाहा कर दिया था। और वह तो बंदर थे, अगर वह सोचते तो कभी भी राम-भक्त नहीं बन पाते।’
करण को किसी तरह समझा लिया गया। लेकिन वह पंकज को मजा चखाना चाहता था। वैसे भी अपनी पूंछ से वह कुछ भी कर सकता था। लंका के साथ-साथ अगर पंकज भी जल जाए तो कितना अच्छा हो। उसकी वजह से ही वह राम नहीं बन पाया। हालांकि करण यह जानता था कि उसकी पूंछ में सच में आग थोड़े लगेगी, केवल पीले रंग का कागज बांधा जाएगा और चित्रों के माध्यम से डिजिटल तकनीक से लंका को जलते दिखाया जाएगा। गुस्से और अहंकार में वह अपने ज्ञान को भी नजरअंदाज कर रहा था। जबकि तरह-तरह के प्रयोग करने में वह बहुत कुशल था। चिंकी सीता बनी थी।
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वाटिका वाला दृश्य चल रहा था, जब हनुमान बना करण वहां उनसे मिलने गया, राम की अंगूठी दी। उसके बाद लंका दहन का दृश्य था। करण ने लंका में आग लगाई और पंकज जो मंच के कोने में खड़ा था, उसकी ओर लपका और जोर-जोर से यह सोचकर पूंछ से उसे मारने लगा कि अब तो यह भी जल जाएगा।
पंकज संभल नहीं सका और नीचे गिर गया। करण अपनी धुन में यह नहीं देख पाया कि वह पंकज के ऊपर ही खड़ा हो गया है। करण को किसी तरह से काबू कर मंच से नीचे लाया गया। पंकज बेहोश हो गया था। करण जब गुस्से के आवेश से बाहर निकला तो पहले उसे लगा कि अच्छा हुआ, पंकज अस्पताल पहुंच गया। फिर जब उसने सब को घूरते देखा तो लगा कि यह तो बहुत बड़ी गलती हो गई है। उसे किसी ने कुछ नहीं कहा। मम्मी-पापा ने बात भी नहीं की। हवन में पहनने के लिए उसके लिए जो नया कुरता-पाजामा खरीदा गया था, उसे तक मम्मी ने उसे पहनने को नहीं दिया। यहां तक किसी ने साथ चलने के लिए भी नहीं कहा।
हवन की अग्नि जल रही थी। एक-एक कर सब उठते और मन ही मन संकल्प कर अपनी किसी एक बुराई को, कमी को उसमें स्वाहा कर देते। करण दूर खड़ा देख रहा था। क्या करे वह? अचानक जब सब उठने लगे तो वह आगे बढ़ा और हवन सामग्री हाथ में ले, उसे अग्नि में डाल कर जोर से बोला, ‘मैं अपने गुस्से और अपने अहंकार को भस्म करता हूं। मैं गोरा हूं, मेरे पापा के पास धन है, मैं पढ़ाई में अच्छा हूं तो क्या हुआ, पर मैं सच में राम बनने लायक नहीं हूं। लेकिन वादा करता हूं, चाहे मुझे भी कोई भी भूमिका करने को दी जाए, मैं सबसे अच्छा व्यवहार करने की कोशिश करूंगा। मैं जीवन में रावण नहीं, राम बनूंगा।’ अग्नि में से निकलती लपटें उसके चेहरे को दीप्त कर रही थीं।
