सुक्खो देवी पूरा दिन कमरे में अकेले अपना समय बिताती है। पति को मरे पांच वर्ष पूरे हो चुके हैं। जब तक पति जीवित था, तब तक उसे कभी लगा ही नहीं कि जीवन का खालीपन क्या होता है। पति नहीं है तो तीन बेटों-बहुओं और सात पोते-पोतियों से भरे परिवार में भी खालीपन आकाश जितना लगता है। तीज-त्योहारों में पहले जहां सुक्खो से बिना पूछे विधान भी शुरू न किए जाते थे, वहीं आज बड़े पोते के विवाह पर कहा जा रहा, ‘अरे छोड़ो! बुढ़िया को कुछ पता नहीं!’
बूढ़ी सुक्खो उपेक्षित बैठी कमरे के अधखुले दरवाजे से विवाह के आयोजनों की तैयारी देखती रहती। पोते के विवाह में अब एक दिन शेष है। आज बूढ़ा बाबू (पितृ देव) की पूजा होनी है। उसकी ननद जो विधवा होने के उपरांत इसी घर में रह गई थी, भागकर आई और बोली, ‘भाभी!’ ‘हां, चंदा! क्या हुआ? बोल!’ ‘भाभी! वह लड़की, जो पूजा का खाना पका रही थी, जल गई! कड़ाही में ज्यों ही पूरी तलने को डाली तुरंत उछल-उछल गई और गर्म तेल की छींटें उसके चेहरे पर जा पड़े। बेचारी का चेहरा जगह-जगह से जल गया है।’
‘हे भगवान! मेरे दाता, कैसी लुगाइयां हैं ये? खुद कुछ न आता था तो इस बूढ़ी से पूछ लेतीं। कैसी अनहोनी करा दी मेरे पोते के ब्याह में।’ ‘ए चंदा, मुझसे न पूछा कोई बात नहीं, क्या तू नहीं जानती थी कि बूढ़ा बाबू की पूजा केवल घर की बहुएं करती हैं। यहां तक कि खाना पकाने और चढ़ावे का सारा कार्य भी स्वयं करना पड़ता है। घर से बाहर की कोई भी कुंवारी लड़की न तो इस पूजा को देख सकती है और न ही खाना पकाने में कोई मदद कर सकती है। शुक्र है भगवान का कि अभी मुसीबत यहीं टल गई। न जाने फिर कौन बड़ी अनहोनी छुप कर कहां बैठी हो।’ सुक्खो परेशान भाव से कहती है। ‘हां भाभी! कह तो तुम सही रही हो, अब चलो, तुम ही चलो, वरना देर हो जाएगी।’
‘कमला, विमला कोई सी बहू कुछ नहीं जानती इस पूजा के बारे में। शुभा बहू कुछ-कुछ जानती है, लेकिन कहती है कि मेरे मायके में तो आज के दिन मीरा माता की पूजा होती है सो बूढ़ा बाबू पूजना नहीं आता।’ चंदा की बात सुनकर सुक्खो घबराकर बोली, ‘हे मेरे भगवान! जल्दी चल चंदा, इन बहुओं का न पता। कहीं मीरा माता ही न पूज डालें और बूढ़े बाबू का कहर फिर कोई दूसरी अनहोनी ही न कर डाले।’ सुक्खो देवी तुरंत, अपनी साड़ी समेटती-संभालती घर के पूजा स्थान पर पहुंची। उसको देखकर घर की बहुएं अपना सा मुंह लटकाए जो-जो सुक्खो कहती, करती गईं।
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अगला दिन ब्याह का है। आज सब अपने-अपने में व्यस्त दिखाई पड़ते हैं। कोई पार्लर तो कोई बालों में डाई लगवाने गया है। सुक्खो की आज किसी को भी परवाह नहीं है। ऐसे में उसका दिमाग नई-नई संभावनाओं के सपने संजोने लगा है। सुक्खो सोचने लगी, आज उसके बड़े पोते का ब्याह है। घर में नई बहू आएगी। वही कुछ हाल-चाल पूछने आने लगे। नई बहू को मैं बहुत प्यार करूंगी, वह मुझे बहुत सम्मान देगी, मेरे पैर छुएगी, मैं प्यार भरा हाथ उसके सिर पर रखूंगी, उसे ढेरों आशीर्वाद दूंगी और कहूंगी, दूधो नहाओ पूतो फलो! फिर एक दिन जब वह मेरा पड़पोता या पोती पैदा करेगी, तब मैं उन्हें खूब खिलाऊंगी। बुढ़ापा उसके बच्चों को लाड़-प्यार करके काटूंगी।
तभी कुछ सोच कर सुक्खो उठी और अलमारी से एक सुंदर साड़ी निकालकर लाई। उसके पति ने पांच वर्ष पहले ठीक मरने से एक महीने पहले ही यह साड़ी उसे दी थी। हल्के पीले रंग की यह साड़ी देखकर उसने पसंद न आने की बात कही थी, लेकिन आज यही साड़ी उसे दुनिया की सबसे खूबसूरत साड़ी लग रही है। सुक्खो के पति के मरने के बाद, तीन बेटों और बहुओं में से कभी किसी ने उसे आज तक कोई नया कपड़ा-लत्ता नहीं दिलवाया था। पोते के विवाह से एक हफ्ते पहले मंझला बेटा कुछ पैसे सुक्खो को यह कहकर दे गया था कि मां इसकी कोई बढ़िया-सी साड़ी खरीद लाना निखिल के विवाह के लिए! किंतु उसने यह न बताया कि साड़ी किसके साथ जाकर खरीदनी है?
कौन उसके साथ बाजार जाएगा? सुक्खो ने बाजार जाकर कभी कुछ नहीं खरीदा था। कारण था कि उसकी सास, बहू को पर्दे में देखने की आदी थी। जो चाहिए होता, वही घर में लाकर सुक्खो को दे दिया करती थी। अकेले बाहर जाने का आत्मविश्वास उसे अब तक नहीं आया था। खैर! उसने नई साड़ी तो खरीदी नहीं, लेकिन यह पीली साड़ी भी उसे इस वक्त खूब लुभावनी लग रही है। सुक्खो जब वह साड़ी पहनकर तैयार हो रही थी, तभी अचानक उसका ध्यान अपने चेहरे पर की झुर्रियों पर गया। विधवा न होती तो लिपस्टिक, बिंदी लगाकर चेहरा थोड़ा ठीक-ठाक कर लेती। इतना सोचते-सोचते उसकी नजर उसके हाथों की ढीली पड़ी और लटकती खाल पर भी चली गई। तभी उसकी छोटी पोती मिट्टू ने आकर कहा, ‘दादी चलो, बड़े भैया के लिए घोड़ी आ गई है, सब आपका इंतजार कर रहे हैं।’ ‘ मिट्टू देख तो जरा, मेरे हाथों की खाल कैसी चुड़ रही है। अब तो मैं बुढ़िया हो गई हूं बिल्कुल! देख तो जरा मैं कैसी लग रही हूं? लाल बिंदी लगा लूं?’
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मिट्टू ने कहा, ‘लगा लो आपको कौन देख रहा है?’ सुक्खो सोचने लगी, ‘हां, सचमुच! कौन ही मुझे देखेगा?’ सुक्खो अपनी एक और धरोहर अलमारी के किसी कोने से निकालती है। पांच वर्षों के बाद निकाली अपनी पुरानी पड़ी टिकुली को अनामिका अंगुली से माथे पर चिपका लिया। पोते निखिल का विवाह संपन्न हुआ, एक और बहू घर आई। पोते के ब्याह के सालभर के अंदर ही वह दादी से परदादी भी बनी, लेकिन यह साल भी विगत के खाली वर्षों की भांति ही खाली रहा।
पूरे दिन का खालीपन अब रातों को भी उसकी नींद में खलल उत्पन्न करने लगा था। अकेले कमरे में बिस्तर से उठकर कमरे में चक्कर लगाते रहना, पोते के कमरे से नवजात की रोने की आवाज सुनते रहना, क्योंकि गोद में तो वह उसे केवल एक दिन ही ले पाई थी और उस दिन भी पुचकारना शुरू किया ही था कि नई बहू ने तुरंत उसके हाथों से यह कहकर वापस ले लिया था, ‘दादी आपके हाथ कांप रहे हैं, आपसे कहीं छूट न जाए।’ तेरह-चौदह लोगों के परिवार में अब तो सुक्खो को जीवन से प्यारी मौत लगने लगी थी। एक प्रकार का अवसाद उसे निरंतर घेरता जा रहा था। वह अब पहले से शांत हो चुकी थी। अब तो उसे उसके उपेक्षित रह जाने का दुख भी न रहा था।
अवसाद के कारण दिल के रोग पहले ही लग गए थे, सो सुक्खो को दिल का दौरा आया। सब उसे अस्पताल लेकर भागे, लेकिन वह बच न सकी। रात आठ बजे उसके प्राण निकले। अस्पताल वालों ने कहा कि पार्थिव शरीर सुबह दस बजे मिलेगा, तब तक आप लोग घर जाएं। सब लोग वापस घर आ गए। सुक्खो पूरी रात अकेली अस्पताल की मोर्चरी में पड़ी रही। मरने से पहले वह कभी भी घर के बाहर अकेली नहीं ठहरी थी। यह पहला मौका था, जब उसने पूरी रात बिना परिवार के अस्पताल के शवगृह में गुजारी थी।
