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द लास्ट कोच शृंखला: सर जी खेलोगे पबजी?

एसोचैम की रिपोर्ट बता रही है कि 82 फीसद से ज्यादा भारतीय किशोर हर सप्ताह करीब 20 घंटे गेम खेलने में समय बर्बाद कर देते हैं। इनमें सात फीसद बच्चों में वीडियो गेम खेलने की लत लग चुकी है। ये वही बच्चे हैं जो 20 घंटे गेम खेलते हैं। नतीजा यह कि ये न ठीक से पढ़ते-लिखते हैं और न नियम से स्कूल जाते हैं। होमवर्क की ओर तो उनका ध्यान ही नहीं। क्या होगा इन बच्चों का? जरा सोचिए। इस बार ''द लास्ट कोच'' शृंखला में पबजी की समस्या उठा रहे हैं संजय स्वतंत्र

Author Updated: September 20, 2019 5:23 PM
एसोचैम की रिपोर्ट बता रही है कि 82 फीसद से ज्यादा भारतीय किशोर हर सप्ताह करीब 20 घंटे गेम खेलने में समय बर्बाद कर देते हैं।

दृश्य एक

रात के तीन बजे हैं। सब गहरी नींद में सोए हैं। कमरे के बाहर आहट से श्याम बाबू की नींद खुल गई है। दूसरे कमरे से किसी के फुसफुसाने की आवाज आ रही है- रुक-रुक आराम से। आज तेरे छोटे भाई को उठा कर ले जाएंगे। यह गेम का पार्ट है। बड़ा भाई कह रहा है, वो पबजी गेम है यार। मिशन को पूरा करने का यह मतलब नहीं कि आधी रात को तुम मेरे भाई को उठा ले जाओ। किसी को पता चल जाएगा तो खैर नहीं। ….. उधर, श्याम बाबू को काटो तो खून नहीं। वे दनदनाते हुए बाहर निकले और तड़ातड़ थप्पड़ जड़ दिए बबलू को। उसका दोस्त घर से भाग निकला है।

दृश्य दो
देर रात पबजी खेल रहे बेटे को कैलाश बाबू डांट रहे हैं। बेटा कह रहा है, पापा आज पढ़ाई कर के थक गया। कल पेपर है तो थोड़ा रिलेक्स करने दो न। कुछ देर गेम खेल कर सो जाऊंगा। सच जल्दी सो जाऊंगा। प्रॉमिस। …… पक्का न? पापा ने पूछा। हां पापा। पक्का, बेटे ने कहा। पापा सोने चले गए हैं। अब बेटे ने पबजी गेम खेलना शुरू कर दिया है। तड़के तीन बजे तक गेम का मिशन पूरा नहीं हुआ है। इस मिशन में वह घर का मुख्य दरवाजा खोल कर चला गया है। जब वह लौटा तो पांच बज रहे थे। आते ही वह बिस्तर पर लुढ़क गया। सुबह आठ बजे कैलाश जी की नींद खुली तो सोचा कि बेटा परीक्षा देने स्कूल चला गया होगा। जब वे ड्राइंगरूम में गए तो देखा बेटा सोफे पर गहरी नींद में सो रहा है। यह देख कर उन्हें चक्कर आ गया। वे गश खाकर वहीं कालीन पर गिर पड़े।

ये दोनों दृश्य काल्पनिक नहीं है। यह इस लेखक की देखी-सुनी है। इन दिनों भारतीय बच्चे पबजी गेम की लत का शिकार हो रहे हैं। इसकी बड़ी चर्चा है। ये पबजी-पबजी क्या है? तीन साल पहले तक कोई इसे जानता नहीं था। दरअसल, पबजी यानी प्लेयर्स अननोंस बैटलग्राउंड एक आॅनलाइन मल्टीप्लेयर बैटल गेम है जो माइक्रोसॉफ्ट विंडोज, एंड्रायड, आइओएस, एक्सबॉक्स वन और प्ले स्टेशन-4 पर मौजूद है। यानी कई प्लेटफार्म पर यह खेला जा सकता है। इसे दक्षिण कोरिया की एक कंपनी ने तीन साल पहले 2000 में आई जापानी फिल्म रॉयल बैटल से प्रेरित होकर तैयार किया था।

भारतीय किशोरों में इस गेम के प्रति इतना जुनून क्यों है। इसे खेलते खेलते वे क्यों स्कूल और परिवार से लेकर दोस्तों तक में अलग-थलग पड़ रहे हैं। उनसे जब मोबाइल छिना जाता है, तो उग्र रूप धारण कर लेते हैं। वे बड़े-छोटे का लिहाज भूल रहे हैं। स्क्रीन पर निगाहें लगातार गड़ी होने से उनकी आंखें कमजोर हो रही हैं। क्या यह पीढ़ी अपना और देश का भविष्य साफ-साफ देख पाएगी? पबजी गेम में मिशन पूरा करने के दबाव में बच्चों का रक्तचाप भी बढ़ रहा है। वे मानसिक रूप से बीमार हो रहे हैं। यहां तक कि वे आत्मघाती हो रहे हैं। हमने स्मार्टफोन देकर उन्हें और खुद को भी खतरे में डाल दिया है।

पिछले दिनों न्यूजरूम में काम करते हुए रोहतक की एक खबर पर मेरी निगाह थम गई। खबर पबजी पर ही थी। शीर्षक था- दसवीं में आई थी मेरिट, पबजी की लत से बीटेक में फेल। …..खबर पढ़ कर मन खट्टा हो गया। मजदूर मां-बाप का इकलौता बेटा और दो बहनों का भाई पबजी के फेर में ठीक से पढ़ नहीं पाया और बीटेक के अंतिम वर्ष के सात पेपरों में फेल हो गया। इस छात्र ने दसवीं की परीक्षा में मेरिट हासिल की थी। बेटे की चिंता में घुल रही मां अवसाद में चली गई। घरवाले कुछ न कहते। ये सोच कर कि बेटा कहीं गलत कदम न उठा ले।

खबर में लिखा है- एक दिन मां को पता चला तो वह सन्न रह गई। रात को सोते समय आवाज आने पर लगा कि घर में चोर घुस आए हैं। वह छत पर गई तो देखा कि बेटा गेम खेल रहा है। वह बुदबुदा रहा था- मारो-मारो। यह बंदूक मेरी है। मैं भी इसी स्क्वायड में हूं। देखो तुम्हारे पीछे दुश्मन हैं। …..जब मां ने उसे देर रात गेम खेलने पर डांटा तो बेटे ने उसका गला दबोच लिया। फिर छत से कूदने की धमकी देने लगा। रोहतक जिले के इस मजदूर परिवार ने अपने होनहार बेटे को इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला मिलने के बाद बड़ी मुश्किल से आठ हजार रुपए का फोन दियाया था।

यह खबर मुझे कई घंटे तक विचलित करती रही। ये कैसा गेम है? पहले तो कहते हैं कि इस गेम में सौ लोग खेलते थे। मगर अब चार दोस्त भी एक लक्ष्य तय कर खेल लेते हैं। इसके पीछे इतने पागल हो जाते हैं कि वे होशो-हवाश तक भूल जाते हैं। मैं अपने आसपास ऐसे बच्चों को गेम खेलते हुए देखता हूं तो चिंता में डूब जाता हूं। टिकटॉक और पबजी में उलझी यह पीढ़ी इस देश को कितना आगे ले जाएगी?

आज मैं खिन्न मन से दफ्तर निकला हूं। बेमन से मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियां चढ़ रहा हूं। नोएडा सिटी सेंटर की आठ कोच वाली मेट्रो आने की घोषणा हो रही है। अभी इसके आने में दो मिनट बाकी है। मैं प्लेटफार्म नंबर एक के अंतिम छोर की तरफ बढ़ रहा हूं। देख रहा हूं कि तीन किशोर भी वहां इंतजार कर रहे हैं। ……. कुछ ही क्षणों में मेट्रो प्लेटफार्म पर लग गई है। दरवाजे खुलते ही वे सामने की सीट पर बैठ गए हैं। मैं कोने की सीट पर बैठा उन्हें देख रहा हूं। तीनों ने अपने मोबाइल फोन आॅन कर लिए हैं। गेम चालू आहे। पबजी का भूत उन पर सवार हो चुका है। तीनों एक मिशन को पूरा करने में लग चुके हैं। एक खिलाड़ी और चाहिए। उनमें से एक ने मेरे कौतुहल को देख कर पूछा, सरजी खेलोगे पबजी? मैंने मुस्कुराते हुए टाल दिया है। यह जीवन भी तो खेल ही है। क्या खेलें पबजी।

मेट्रो एक के बाद एक स्टेशन पार करती जा रही है। सचमुच समय मुट्ठी में रेत की तरह है। हम सब व्यर्थ के काम में अपना समय गंवा रहे हैं। आजकल के किशोर और युवा सड़क पर घूमने और गेम खेलने में अपना कीमती समय जाया कर रहे हैं। ज्यादातर लोगों का हर दिन यूं ही खाने और सोने में निकल जाता है। कोई रचनात्मक बातचीत नहीं। कोई सार्थक संवाद नहीं। घर-परिवार के लिए भी कोई योगदान नहीं। क्या हम ऐसी पीढ़ी को तैयार होते देख रहे हैं जो आगे चल कर परिवार और देश के लिए बोझ बनने वाली है।

उद्घोषणा हो रही है, अगला स्टेशन सिविल लाइंस है। दरवाजे बांयी ओर खुलेंगे। मेरा ध्यान सामने कोच के दरवाजे की ओर चला गया है। स्टेशन आने पर एक पढ़े-लिखे बुजुर्ग सज्जन सवार हुए हैं। सीट खाली देख ठीक मेरे बगल में बैठ गए हैं। वे कुछ उनींदे दिख रहे हैं। कोच की ठंडक पाकर उन्हें झपकी आ रही है। एक बार के लिए उनका सिर मेरे कंधे पर टिक गया है। मैंने हल्के से उन्हें झकझोरा तो वे झेंपते हुए बोले, सॉरी जेंटलमैन। क्या करूं। पोते की वजह से सो नहीं पाया। देर रात गेम खेलते हुए वह घर का दरवाजा खोल कर निकल जाता है। फिर चिंता में नींद नहीं आती। कितना भी रोकूं, कितना भी टोकूं, वह मानता वहीं। वे अपना दुखड़ा बता रहे हैं।

क्या इसी तरह खेलते है? मैंने कोच में सामने बैठे पबजी खेलते तीन किशोरों की ओर इशारा करते हुए पूछा। उन्हें देख कर उनके चेहरे पर उदासी का भाव पसर गया है। ये सब नाशुक्रे हैं। इन्हें अपने मां-बाप की चिंता नहीं। पढ़ाई पर खर्च हो रही उनकी गाढ़ी कमाई की भी परवाह नहीं। ये बड़े होकर मां-बाप की क्या सेवा करेंगे? बुजुर्ग सज्जन किशोरों को गेम खेलते देख कर उखड़ गए हैं। न जाने कैसा गेम है, जिसमें बच्चे घंटों उलझे रहते हैं। न पानी पीते हैं न ढंग से खाना खाते हैं। खुद के लिए भी क्या करेंगे। कुछ भी नहीं। वे बोले जा रहे हैं। यह करीबन हर घर के बुजुर्ग और हर मां-बाप की पीड़ा है।

उधर, तीनों किशोर पबजी खेल रहे हैं। उनकी आवाज आ रही है- मार मार…. पकड़-पकड़। जाने मत दे। समचमुच ऐसे गेम तो हमारे बच्चों को हिंसक बना देंगे। मेरे बगल में बैठे बुजुर्ग ने आंखें बंद कर ली हैं। वे रात की नींद यहीं पूरी कर रहे हैं। मैं पूरे कोच में देख रहा हूं कि ज्यादातर लोग मोबाइल में खोए हैं। सब खुद में गुम । कुछ लोग कानों में ईयरफोन लगा कर संगीत सुन रहे हैं। हमारे जीवन में मोबाइल ही सब कुछ हो गया है। उसने हम सब को अकेला कर दिया है। किसी को किसी के सुख-दुख से मतलब नहीं। कोई बातचीत नहीं।

बरसों पहले बसों-ट्रेनों में यात्रा के दौरान लोग बात कर लेते थे। पूछ लेते थे कि आप क्या काम करते हैं। फिर घर-परिवार से लेकर देश-दुनिया की बात हो जाती थी। आज मेट्रो में आधे घंटे की यात्रा में लोग एक दूसरेकी शक्ल तक नहीं देखते। सहयात्री कब बगल में बैठा और कब उठ कर चला गया, कोई देखता तक नहीं। संवाद तो बहुत दूर की बात है।

मेरे सोचने के क्रम को इस उद्घोषणा ने भंग कर दिया है-अगला स्टेशन राजीव चौक है। दरवाजे दांयी ओर खुलेंगे। …….. बुजुर्ग सज्जन अब भी झपकी ले रहे हैं। तीनों किशोर अब भी पबजी में मशगूल हैं। मैं सीट से उठ रहा हूं। मुझे लगता है कि इतनी बड़ी समस्या को लेकर तमाम चिंताओं के बीच हमारा सिस्टम भी इसी तरह सो रहा है। मैदानों में खेलने के बजाय बच्चे बिस्तर पर पड़े वर्चुअल गेम खेल रहे हैं। ….. मेट्रो के दरवाजे खुल गए हैं। मैं प्लेटफार्म पर आ गया हूं।

ज्यादातर यात्री यंत्रवत चले जा रहे हैं। ज्यादातर के भावहीन चेहरे हैं। मैं प्लेटफार्म नंबर तीन की ओर बढ़ रहा हूं। ……. आखिरी छोर पर एक लड़का फर्श पर बैठा मोबाइल में खोया है। उसके बगल में खड़ी लड़की कह रही है, दिखाओ न मुझे। दिखाओ न। छिपा क्यों रहे हो। अरे ये वीडियो क्लिप है। नहीं दिखाऊंगा। ….. अच्छा तुम ये सब देख सकते हो और हम लड़कियां इसे नहीं देख सकतीं। अब तो जरूर देखंूगी। इस छीना-झपटी में मोबाइल फिसल कर मेरे कदमों के पास आ गिरा है। मैंने झुक कर उसे उठा लिया है। मोबाइल स्क्रीन पर पोर्न फिल्म चल रही है। बंद कमरे का रोमांस बेपर्दा हो गया है। लड़की की नजरें उस पर पड़ गई हैं। लड़के ने सकपकाते हुए मेरे हाथ से मोबाइल फोन ले लिया है। लड़की ने अब उससे मोबाइल छीन लिया है। दैहिक और आत्मीय रिश्तों के सार्वजनिक हो जाने का न कोई संकोच है न शर्मिंदगी। यह है हमारी आज की पीढ़ी। उसे पार्क में या मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों पर पोर्न फिल्में देखने से भी गुरेज नहीं।

उधर, नोएडा इलेक्ट्रोनिक सिटी जाने वाली मेट्रो प्लेटफार्म पर आ रही है। वे दोनों भी कोच में सवार हो गए हैं। लड़का मुझे देख कर अब भी झेंप रहा है। मगर लड़की को कोई परवाह नहीं। वह उसके कंधे पर झूल रही है। मैं आज सीनियर सिटीजन की सीट पर बैठ गया हूं। लग रहा है कि मैं कितने साल पीछे चला गया हूं। कुछ फिल्में बंद कमरे में देखते हुए डर लगता था कि कोई यह सब देख न ले। आज की पीढ़ी सरेआम देख रही है। बंद कमरों की खिड़कियां खुल गई हैं। सब कुछ बेपर्दा हो गया है।

मेट्रो चल पड़ी है। यह अंधेरी सुरंग की ओर बढ़ रही है। लग रहा है कि हमारा यह दौर भी अंधी सुरंग से गुजर रहा है। जहां पबजी है। पोर्न फिल्में हैं। बिखरते हुए सामाजिक मूल्य हैं। और इसी अंधेरे में संवादहीनता है। पोर्न फिल्में देख कर हिंसक हो रहे यौन पशुओं की शिकार लड़कियों की चीखें हैं। क्या आपको सुनाई पड़ रही है? यह नहीं सुनाई पड़ेगी आपको। क्या पबजी खेल रहे बच्चों के मोबाइल से बम-धमाकों और गोलियां चलने की आवाज आ रही है? नहीं न?

दरअसल, आपने पहले देखना बंद किया, फिर आपने अब कानों को भी बंद कर लिया है। एक दिन हम सब अंधेरे में गुम हो जाएंगे। …….. मेट्रो की गति तेज हो गई है। हमारे जीवन की रफ्तार बढ़ गई है। मगर अफसोस कि हमारे सोचने की रफ्तार कुंद हो गई है। चलिए इस अंधी गुफा से निकलते हैं। कुछ संवाद करते हैं। कोई हल निकालते हैं।

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