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चेहरे और भी हैं…

बाल श्रम ने एक नया रूप ले लिया है। सड़कों पर बच्चे भीख मांग रहे हैं। कभी पेन बेचते हैं तो कभी करतब दिखाते हैं तो कभी गाड़ियों के शीशे साफ करने लग जाते हैं। बदले में इन्हें मिलती है दुत्कार। इनकी आंखों में रोज मरते हैं मासूम सपने। ये बच्चे जब भीख के लिए हाथ पसारते हैं तो कलेजा चाक हो जाता है। ‘सुबह से कुछ नहीं खाया’, उनका यह कातर स्वर विचलित कर देता है। पढ़िए संजय स्‍वतंत्र की सीरीज- ''द लास्ट कोच'' की नई कड़ी।

बाल श्रम रोकने का मसला सिर्फ कानूनी नहीं है। (Illustration : C R Sasikumar)

लाल बत्ती पर अपने करतब दिखा कर कोई बच्ची कारों के नजदीक पहुंचती है तो पाषाण हृदय लोग शीशे ऊपर कर लेते हैं और नजरें मोबाइल पर गड़ा देते हैं। अपनी कोमल मुट्ठियों से दस्तक देती बच्ची की गुहार अनसुनी रह जाती है। …… और गाड़ी चल देती है। दिल्ली में बाल श्रम का ऐसा चेहरा जो किसी को दिखाई नहीं देता। चेहरे और भी हैं…….।

वसंत ऋतु अपने यौवन पर है। माह-ए-इश्क को ठंडी हवाओं ने अभी तक गुलाबी नहीं होने दिया है। सर्दी ऐसी कि लोग बेमन से रजाइयों से बाहर निकलते हैं। बच्चे नहाने से कतराते हैं। बुजुर्ग लोग खुद को मफलर-टोपी में लपेट कर ठंड से मुकाबला करते हैं। सर्द सुबह से मुठभेड़ करते हुए लाखों लोग रोजी-रोटी के लिए रोज निकलते हैं घरों से। पतियों के जाने के बाद गृहणियां धूप के टुकड़े तलाशती हैं। निर्धन परिवारों के बच्चे सड़कों पर उतर आते हैं। कुछ बच्चे कचरा बीनते हैं तो कुछ होटलों-ढाबों में काम करते हैं। वहीं चंद बच्चे भीख भी मांगते हैं। लेकिन अलग-अलग रूपों में।

दिल्ली की एक विशेषता है कि यह किसी को बेरोजगार रहने नहीं देती। बुजुर्ग हों या बच्चे, सबको कोई न कोई काम जरूर देती है। आज मैं समय से कुछ पहले ही दफ्तर के लिए निकल गया हूं। सबसे पहले जो आटो दिखा, उसे बुजुर्ग चला रहे थे। उम्र यही कोई सत्तर बरस। आंखों पर मोटा चश्मा। सिर पर भूरे रंग की टोपी। मुझे देखते ही वे सामने आकर रुके। ‘……मेट्रो स्टेशन चलेंगे।’ पूछने पर उन्होंने कहा, ‘बैठ जाइए। उधर ही जा रहा हूं। जो मन में आए दे दीजिएगा।’ इस पर मैंने कहा, ‘मैं रोज तीस रुपए देता हूं स्टेशन जाने के लिए।’ बुजुर्ग सज्जन मुस्कुरा कर बोले, ‘अच्छा ठीक है। जैसी आपकी इच्छा।’ आटो चल पड़ा है।

आजादपर पुल से नीचे उतरते हुए यातायात जाम मिला है। उसमें उलझने से पहले आटो आगे बढ़ा तो लाल बत्ती ने हमें रोक लिया। देख रहा हूं कि दो-तीन बच्चे अगल-बगल खड़ी कारों के शीशे पोंछ रहे हैं। खाए-अघाए दिल्ली वालों की कारें यों ही चमकती रहती हैं। ऐसे में इन बच्चों का गंदे कपड़ों से कारों पर हाथ लगाना इन नवधनाढ्यों को गवारा नहीं। वे उन्हें दुत्कार देते हैं। एक ऐसे ही बच्चे को एक चालक ने कार से उतर कर चांटे जड़ दिए हैं। यह देख कर उसकी छोटी बहन सहम कर दूर खड़ी हो गई हैं। यह मनुष्यता का कैसा रूप है जो मेहनत कर कुछ कमाने की चाहत की भी कद्र नहीं करता।

इस ट्रैफिक सिग्नल की अवधि लंबी है। मगर इतनी भी नहीं कि उस निर्दयी चालक से उलझ जाऊं और पूछूं कि बच्चे को तुमने क्यों मारा? तभी नौ-दस साल के बच्चे ने मेरा ध्यान खींच लिया है- अंकल पेन ले लो। भूख लगी है मुझे। यह बालश्रम का नया रूप है। इसे कौन रोकेगा? आंखें नम हैं। क्या कहूं इस बच्चे से। दो-चार रुपए से तो पेट भरने से रहा। मैंने उसे दस रुपए देकर पेन खरीद लिया है। वैसे पेन की कीमत पांच रुपए से ज्यादा नहीं। इसे मैं अपनी टेबल की दराज में संभाल कर रखूंगा।

यह इस बच्चे का आखिरी पेन था। तुमने तो सारे पेन बेच दिए, मैंने कहा तो उसने मुस्कुराते हुए सिर हिला दिया। बच्चे के रूखे बाल और सूखे होंठ देख कर लग रहा कि इसे महीनों से पौष्टिक खाना नहीं मिला है। शायद ही ठीक से कभी नहाया हो। ……मैंने इसे यह कह कर आटो में बैठा लिया है कि चलो तुमको आगे छोड़ देता हूं। वह मान गया है। सीधा-साधा बच्चा है यह। तभी यातायात सिग्नल की बत्ती हरी होते ही आटो फिर से चल पड़ा है। इस बच्चे के बदन पर सिर्फ सूती कमीज है। सोच रहा हूं कि वो मां-बाप कितने लाचार होंगे, जिनके बच्चे सड़कों पर भटकते हैं और सर्दी में ठिठुरते हैं।

…….मैंने बच्चे से पूछा, ‘तुम स्कूल नहीं जाते?’ उसने कहा-ना…..पहले जाता था। अब नहीं। पिताजी के साथ काम पर निकल जाता हूं। वे फुटपाथ पर फल बेचते हैं और मैं यहां पेन बेचता हूं। शाम को हम लोग दाल-चावल खरीद कर घर लौटते हैं। ……. जिस घर में दो वक्त की रोटी का मुश्किल से जुगाड़ होता हो, वहां बच्चों की पढ़ाई पर कौन ध्यान दे। देश में निशुल्क शिक्षा का लक्ष्य कैसे पूरा होगा। यह एक बड़ा सवाल है।

मैंने 20 रुपए का नोट बच्चे की हथेलियों पर धर दिया है। मगर वह लेने से इनकार कर रहा है- नहीं-नहीं, मैं नहीं लूंगा। आपने पेन के पैसे दे दिए हैं। फिर ये क्यों दे रहे हैं अंकल? मैने बच्चे के हाथ से नोट लेकर उसकी जेब में रखते हुए समझाया, ‘तुमने मुझे अंकल कहा है न, तो अंकल का आशीर्वाद समझ कर इसे रख लोे। कुछ खा लेना।’ ……वह मान नहीं रहा, लेकिन मेरी यह बात सुन कर वह सकुचा सा गया है। उसे जवाब देते नहीं बन रहा। मुझे उसकी खुद्दारी पर नाज है।

उधर, आजादपुर में मेट्रो स्टेशन को जोड़ने वाले पुल के नीचे बुजुर्ग चालक ने आटो रोक दिया है। बच्चा उतरते ही फुटपाथ पर संतरे बेच रहे पिता के पास जाकर खड़ा हो गया है। वह सुबह से दोपहर डेढ़ बजे तक बिके पैने के पैसे उन्हें दे रहा है। मैं उसकी ईमानदारी का कायल हो गया हूं। आटो वाले को किराया देने के बाद देखा कि वह बच्चा पिता से एक संतरे लेकर उसे छिलता हुआ उमंग से चला जा रहा है। एक दिन यही बच्चा अपने परिवार को संभाल लेगा। उसकी मेहनत रंग लाएगी।

मैं मेट्रो पुल की सीढ़ियां चढ़ रहा हूं। स्टेशन परिसर में प्रवेश से पहले नीचे की सीढ़ियों पर नंगे बदन बैठे एक बच्चे ने मेरा ध्यान खींच लिया है। उसकी पीठ पर ऐसा निशान है, मानो किसी ने उसे गरम चिमटे से दाग दिया हो। इसे देख कर मैं सिहर उठा हूं। वह करुण स्वर में एक ही रट लगाए हुए हैं- दो रुपए दे दो बाबू……दो रुपए दे दो बाबू। वह सिर झुकाए इस तरह उकड़ूं बैठा है, जिससे उसकी पीठ सबको दिखे। वैसे उसका जख्म भर चुका है। मगर बच्चे की याचना भाव विह्वल कर रही है। इसे कोई भी देख कर पसीज सकता है।

इस बच्चे से सवाल पूछने की हिम्मत नहीं हो रही। मैं उसके पास बैठ गया हूं। मैंने उससे धीरे से कहा, ‘तुम स्कूल क्यों नहीं जाते। यहां भीख क्यों मांगते हो? मेरा यह सवाल उसे अच्छा नहीं लगा। उसने मुझे गैर से देखा और कहा, ‘क्या करूं। बाप पीटता है। माई के कहने पर यहां आ जाता हूं। जो पैसे शाम तक मिलते हैं, उसे दे देता हूं।’ भिक्षावृत्ति की आड़ में यह कैसा बालश्रम है? उसके ठिठुरते बदन पर हाथ धरते ही कांप गया हूं। वह कैसा कसाई बाप है जो अपने बच्चे को भीख मांगने के लिए कहता है। मैं इसे भीख नहीं देना चाहता। मगर मन कह रहा है कि कुछ तो दे दूं इस बच्चे को। मैंने इसे पांच रुपए का सिक्का दे दिया है। वह इसे मुट्ठी में लेकर फिर से टेर लगाने लगा है- दो रुपे दे दो बाबू…….।

मैं स्टेशन की ओर चल पड़ा हूं। बच्चे की आंखें मेरा पीछा कर रही हैं। उसका कातर स्वर मेरे पीछे दौड़ रहा है- दो रुपए दे दो……दो रुपए दे दो। इस समय प्लेटफार्म नंबर एक पर हूं। हुडा सिटी सेंटर की मेट्रो आने की उद्घोषणा हो रही है। …….लास्ट कोच के दरवाजे खुल गए हैं। कोने की आखिरी सीट पर बैठ गया हूं। आंखें बंद कर उन सबको याद कर रहा हूं जो सड़कों पर भाख मांगते हुए मिले या फिर ढाबों-दुकानों पर काम करते हुए दिखे। मगर उनमें से ज्यादातर चेहरे अब गुम हो चुके हैं।

फिलहाल मुझे एक बच्ची का चेहरा याद आ रहा है। वह मुझे यहीं ट्रैफिक सिग्नल पर मिली थी। गोल तार के घेरे में समा कर करतब दिखाने के बाद वह मेरे सामने आकर खड़ी हो गई थी। छह-सात साल की बच्ची। लाल रिबन से बंधी दो चोटियां। मासूम सा चेहरा और आंखों में गुहार। बच्ची ने अपनी नन्हीं सी हथेली पसारते हुए कहा था- अंकल पैसे दे दो। इस पर मैंने उससे पूछा था- स्कूल क्यों नहीं जाती तुम? इस सवाल पर एक पल के लिए गुम हो गई थी वह। वह अपलक मुझे देखती रही। फिर जोर से उसने कहा- नहीं जाती स्कूल। मैं खुद ही नहीं जाती। मैंने पूछा- ऐसा क्यों तो उसने कहा था, ‘मेरी मां नहीं है। कोई मुझे स्कूल नहीं भेजता। और अब मैं जाऊंगी भी नहीं।’ यह कहते हुए वह दूसरी गाड़यों की ओर दौड़ गई।

बालिका शिक्षा पर हम चाहे जितने दावे कर लें। मगर हजारों-लाखों बच्चियां आज भी लक्ष्य से पीछे छूट रही हैं। उस बच्ची का चेहरा रह-रह कर आंखों के सामने आ रहा है। उसकी भूरी आंखें। सूखे होंठ। करतब दिखा कर ही सही, मगर कुछ करके कमाने का जज्बा। उसने भीख मांगने के लिए हथेली नहीं फैलाई थी। वह अपनी मेहनत के बदले कुछ मांग रही थी। मैं उसे वह भी न दे पाया। शायद उसके दिल को चोट लग गई थी। न जाने अब वह कहां होगी। शायद किसी और सिग्नल पर करतब दिखा रही हो।

गुमनाम बाल श्रमिकों को याद करते हुए कई स्टेशन निकल चुके हैं। उद्घोषणा हो रही है-अगला स्टेशन कश्मीरी गेट है। कुछ यात्री उतर रहे हैं तो कुछ सवार हो रहे हैं। इन्हीं यात्रियों में 13-14 साल के दो बच्चों के साथ एक सज्जन भी सवार हुए हैं। महाशय ने अपने भारी-भरकम थैलों का बोझ इन बच्चों पर लाद दिया है। बातचीत से लग रहा है कि इनके बीच नौकर-मालिक का रिश्ता है। वह बच्चों को हिदायत दे रहा है-ठेला ठीक से लगा लेना। अभी पहुंचोगे तो मुन्नी भी तब तक आ जाएगी। समझे। बच्चों ने मालिक की बात सुन कर सिर हिला दिया- जी अच्छा।…….अगला स्टेशन चांदनी चौक है, उद्घोषणा हो रही है। स्टेशन आते ही बच्चों के साथ उनका मालिक भी उतर गया है। कुछ देर बाद ये बच्चे किसी सड़क के किनारे ठेले के सामने आवाज लगा रहे होंगे-दस रुपए प्लेट……दस रुपए प्लेट।

बालश्रम अपराध है। इसे रोकना मुश्किल है। क्योंकि जिन पर दायित्व है, वही आंखें मूंदे हुए हैं। दूसरी ओर हमारा समाज भी इसको लेकर संवेदनशील नहीं। न जाने कितने छोटे बच्चे दुकानों से लेकर घरों में काम कर रहे हैंं। मगर किसे परवाह है? बोझिल मन से राजीव चौक स्टेशन उतर गया हूं। यहां स्कूल से घर लौट रहे बच्चों को देख रहा हूं। मुस्कुराते हुए। खिलखिलाते हुए। बच्चे वो भी हैं, जिनके चेहरे पर उदासी है। अधूरे सपने हैं। और जो कभी स्कूल गए ही नहीं।

प्लेटफार्म नंबर तीन से मुझे अभी-अभी नोएडा के लिए मेट्रो मिल गई है। लास्ट कोच में सन्नाटा पसरा है। आज यात्रियों की संख्या कम हैं। ज्यादातर सीटें खाली हैं। मेरी सहयोगी एक दिन बता रही थी कि उसने पिछले दिनों नेताजी सुभाष प्लेस मेट्रो स्टेशन पर भीख मांगती महिला को देखा। उसके बच्चे भी भीख मांग रहे थे। यह पूछने पर कि वह बच्चों को स्कूल क्यों नहीं भेजती तो उसने कहा था कि फिर घर कैसे चलेगा। ये भी कुछ पैसे मांग लेते हैं लोगों से। यह है बाल श्रम की दुखद तस्वीर। निर्धन मां-बाप के बच्चों को न ठीक से खाने को मिलता है न पहनने को। इन बच्चों के बारे में सोचते हुए आंसू बह चले हैं।

…..एक के बाद एक स्टेशन निकल गए हैं। बाल श्रम रोकने का मसला सिर्फ कानूनी नहीं है। यह समाज और परिवार से जुड़ा मुद्दा भी है। रोजगार से जुड़ा मसला भी है। विकसित समाज ही इस समस्या से निपट सकता है। हमें ऐसे समाज की रचना करनी होगी, जहां एक भी बच्चा भीख मांगता या काम करता हुआ न मिले। अगर मिल भी जाए तो उसके परिवार तक पहुंच कर समस्या का हल निकाला जाए। मगर क्या यह संभव है? इसके लिए शासन और समाज दोनों को मिल कर काम करना होगा। उद्घोषणा हो रही है, अगला स्टेशन न्यू अशोक नगर है।

मैं प्लेटफार्म पर आ गया हूं। बाहर निकलने के लिए सीढ़ियों की ओर बढ़ चला हूं। देख रहा हूं कि मेट्रो कर्मचारी नीचे की ओर एकटक देख रहा है। मैं वहीं रुक गया हूं। न जाने यह क्या करने वाला है। कर्मचारी धीरे-धीरे नीचे उतर रहा है। ठीक वैसे ही जैसे कोई बाघ अपने शिकार की ओर बढ़ता है। सामने देख रहा हूं कि उससे बेखबर एक बच्चा अपने दोनों घुटने मोड़े बैठा है। वह आते-जाते लोगों से भीख मांग रहा है- भूख लगी है बाबू। कुछ दे दो बाबू……। तभी उसे खतरा महसूस हुआ। उसने कातर भरी से नजरों से कर्मचारी को देखा। उसकी आंखों में याचना है- मुझे मारना मत। लेकिन लगता है कि कर्मचारी उसे पीटने के मूड में है।

मैं कर्मचारी के पीछे-पीछे सीढ़ियों से उतर रहा हूं। यह सोच कर कि अगर बच्चे को पीटेगा तो मैं इसे रोकूंगा। डरा-सहमा बच्चा उठ नहीं पा रहा। बेहद कमजोर है यह। देर तक बैठे रहने से उसकी टांगें अकड़ गई हैं। उसके एकदम पास पहुंच कर कर्मचारी ने जैसे ही अपने जूते उसकी पीठ पर रखे, मैंने कर्मचारी को रोकते हुए कहा, क्या इसे पीटने से बच्चा भीख मांगना छोड़ देगा। अभी बेशक चला जाएगा, मगर बाद में फिर आ जाएगा। मेरे समझाने पर भी कर्मचारी ने एक न सुनी और उसे दो-चार हाथ लगा दिए हैं।

बच्चा रोते हुए जा रहा है। मुझे मालूम है, यह फिर लौट कर आएगा और हर आते-जाते लोगों से गुहार लगाएगा-भूख लगी है बाबू। कुछ दे दो बाबू। ……… मैं रिक्शे पर बैठ गया हूं। इस बच्चे की समस्या का हल मेरे पास भी नहीं हैं। क्या आपके पास है? अगर है तो जरूर बताइएगा।

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