बालीवुड के सितारों का राजनीतिक इतिहास चमकदार नहीं रहा है। अमिताभ बच्चन साल 1984 में इलाहाबाद से लोकसभा चुनाव जीते। लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच कार्यकाल पूरा भी नहीं किया और खुद कहा, ‘यह खेल मुझसे बड़ा है, मैं इसे नहीं संभाल सकता।’ धर्मेंद्र को पता ही नहीं था कि वे राजनीति में क्यों आए। संसद में वे शायद ही बोले। गोविंदा ने पांच साल के कार्यकाल में संसद में मात्र दो मिनट का भाषण दिया। उनकी उपस्थिति 15 फीसद से भी कम थी।
उत्तर भारत में बालीवुड के सितारे पार्टी के लिए भीड़ खींचने वाले की भूमिका में रहते हैं, खुद नेता नहीं बनते। एक अभिनेत्री ने कहा कि मैंने कई बार अपनी बात रखने की कोशिश की, लेकिन विनम्रता से कहा गया, प्रचार करो, बाकी हम देखेंगे। सबसे सफल उत्तर भारतीय सितारा-नेता रहे सुनील दत्त। वे पांच बार सांसद रहे और मंत्री भी बने। उन्होंने फिल्मी सितारे की आभा को शासन के ऊपर कभी नहीं आने दिया। वे एक राजनेता के रूप में ढल गए।
पांच बुनियादी फर्क
पहला- भाषाई और सांस्कृतिक पहचान। एक विश्लेषण के अनुसार, तमिल, तेलगू, कन्नड़, इन भाषाओं की अपनी मजबूत सांस्कृतिक पहचान है जो राष्ट्रीय राजनीति से अलग और प्रतिस्पर्धी है। उत्तर भारत में हिंदी सिनेमा व्यापक है। कोई एक राज्य उसे अपना नहीं मान सकता। दक्षिण में तमिल फिल्म तमिल गौरव का प्रतीक है। जब विजय तमिल भाषा के लिए आवाज उठाते हैं, तो वे सिर्फ अभिनेता नहीं, तमिल अस्मिता के प्रतिनिधि बन जाते हैं।
दूसरा: पर्दे पर राजनीतिक भूमिकाएं। आइआइएएस के विश्लेषण के अनुसार, दक्षिण भारतीय फिल्में दशकों से नायक को जनता के मसीहा, व्यवस्था विरोधी नायक, गरीबों के रक्षक के रूप में दिखाती हैं। एमजीआर की हर फिल्म में वे कमजोर की लड़ाई लड़ते थे। एक समीक्षक का कहना है कि, यह मानना गलत है कि उनकी सफलता विचारधारा से थी, लेकिन पर्दे पर बनाई गई सामाजिक छवि ने जातीय और वर्गीय समूहों को एकजुट किया। उत्तर भारत में अमिताभ भी ‘एंग्री यंग मैन’ थे, लेकिन वह छवि किसी एक राज्य की सांस्कृतिक पहचान से नहीं जुड़ी।
तीसरा- प्रशंसक संगठन का चुनावी संगठन। दक्षिण भारत में प्रशंसकों के संगठन जाति-समूहों पर आधारित हैं और इनके पास संगठन, संसाधन और अनुशासन होता है। जैसे ही कोई सितारा राजनीति में आता है, ये संगठन चुनाव-प्रबंधन इकाइयों में बदल जाते हैं। उत्तर भारत में ऐसी संगठित प्रशंसक संस्कृति नहीं है। बालीवुड के सितारों के प्रशंसक राष्ट्रव्यापी बिखरे हैं, किसी एक राज्य में केंद्रित नहीं।
चौथा- स्वतंत्र पार्टी बनाम पार्टी का उपकरण। एमजीआर, एनटीआर और विजय सभी ने अपनी स्वतंत्र पार्टी बनाई। उनकी राजनीतिक पहचान किसी बड़ी पार्टी की मुहताज नहीं थी। उत्तर भारत में अमिताभ कांग्रेस के टिकट पर लड़े, धर्मेंद्र-हेमा मालिनी भाजपा के। वे पार्टी के चेहरे थे, पार्टी के नेता नहीं। यह मूलभूत फर्क है कि दक्षिण में सितारा पार्टी को चलाता है, उत्तर में पार्टी सितारे को चलाती है।
पांचवां- द्विदलीय थकान की बात करते हैं। तमिलनाडु में साल 1967 से द्रमक और अन्ना द्रमुक का बारी-बारी से शासन रहा। 59 साल में मतदाता इस चक्र से ऊब चुके थे। विजय ने इसी थकान को भुनाया। आंध्र में एनटीआर ने कांग्रेस की एकाधिकारी सत्ता के खिलाफ उठे जनाक्रोश को आवाज दी। उत्तर भारत में बहुदलीय राजनीति पहले से इतनी विखंडित है कि किसी एक नए चेहरे के लिए जगह बनाना मुश्किल है।
क्या उत्तर में भी हो सकता है ऐसा?
प्रश्न उठता है कि क्या भविष्य में उत्तर भारत का कोई फिल्मी सितारा ऐसा कर सकता है? जिस तरह बालीवुड के सितारों ने राजनीति में प्रवेश किया है, उसमें कभी-कभी उनकी सितारा शक्ति ने वोट दिलाए। हेमा मालिनी मथुरा से तीन बार लगातार जीतीं, मनोज तिवारी उत्तर-पूर्व दिल्ली से तीन बार जीते। लेकिन इनमें से किसी ने भी स्वतंत्र पार्टी नहीं बनाई, जाति-समूहों को एकजुट नहीं किया और किसी बड़े सांस्कृतिक आंदोलन की नुमाइंदगी नहीं की।
रजनीकांत ने साल 2021 में राजनीति में उतरने की घोषणा की थी, लेकिन स्वास्थ्य कारणों से पीछे हट गए। कमल हासन की पार्टी मक्कल नीधि मैयम साल 2021 में विफल रही और बाद में वे द्रमुक गठबंधन में शामिल हो गए। टीवीके की सफलता ने अब पवन कल्याण (आंध्र प्रदेश) जैसे दूसरे दक्षिण के सितारों के लिए भी एक नई राह खोली है जो जनसेना पार्टी से उपमुख्यमंत्री बन चुके हैं।
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चार मई 2026 को ‘इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन’ विद्युत की गति से जिसके खाते में मत डाल रही थी, वह पूरे देश को चौंका रहा था। विजय, जिन्हें उनके करोड़ों प्रशंसक थलापति विजय यानी सेनापति कहते हैं, की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) ने 108 सीटों पर जीत दर्ज दर्ज की। दक्षिण भारत में फिल्मी सितारे राजनीतिक पार्टी को चलाते हैं तो उत्तर भारत में सितारों को पार्टी चलाती है। उत्तर और दक्षिण भारत के सिनेमा बनाम सत्ता के परिदृश्य में बुनियादी फर्क है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
