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निराशा के अंधकार में उजाले की किरण जैसा है सोहनलाल द्विवेदी का गीत – ‘कोशिश करने वालों की हार नहीं होती’

'लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती' कविता हर उस शख्स का ज़बानी गीत है जो कभी न कभी प्रतिद्वंदिता के रण में घायल हुआ है। यह गीत उसे नया जीवन देता है।

सोहनलाल द्विवेदी

“नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है/ चढ़ती दीवारों पर सौ बार फिसलती है/ मन का विश्वास रगों में साहस भरता है/ गिरकर चढ़ना, चढ़कर गिरना तो अखरता है/ आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती/ कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।”

हताशा, निराशा, उदासी, पराजय और हीनता प्रतिस्पर्धात्मक समाज के साइड इफेक्ट्स हैं। हर दिन के अखबार का कोई न कोई कोना इन अंधेरों की स्याह स्याही से लाल होता है। हार जाने का डर और हार जाने पर सब कुछ लुट जाने का भाव जीवन को समाप्त कर देने के एकमेव विकल्प की ओर रोशनी डालने लगती है। यह रोशनी ही आज के दौर का सबसे बड़ा अंधकार है। ऊपर जो पंक्तियां लिखी गई हैं वो न जाने किस मनःस्थिति में न जाने किसके लिए लिखी गई हैं लेकिन जब यह काव्य पंक्तियां हताशा और निराशा के अंधकार में बैठे किसी हारे हुए मन की जमीन में पड़ती हैं तो उसमें नए जीवन की पौध उग आती है। नया उत्साह जन्म लेता है। नई ऊर्जा सागर लहरों की मानिंद हिलोरें मारने लगती है। और तब जाकर कवि की ये पंक्तियां उसे वास्तविक सृजक होने का प्रमाणपत्र देती हैं कि उसने एक नहीं हजारों-लाखों नई जिंदगियों का सृजन किया होता है।

‘लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती’ कविता हर उस शख्स का जबानी गीत है जो कभी न कभी प्रतिद्वंदिता के रण में घायल हुआ है। यह गीत उसे नया जीवन देता है। आंकड़े नहीं निकल पाएंगे कि कितने जीवन इस गीत से जीवंत हो गए होंगे। यह गीत काल से परे होकर सदियों-सदियों तक गिरकर उठने, खाली हाथ गोताखोर के लौटने और असफलताओं की चुनौतियों से लड़ते किसी चींटी, किसी गोताखोर और किसी असफल मनुष्य के संघर्षों की कहानियों में अपने समस्त वैभव के साथ जीवित रहेगा। आज इस गीत की चर्चा इसलिए करने का मन है कि आज ही के दिन इस अमर गीत का लेखक संघर्षों की साखी लिखने के अलक्षित लक्ष्य को लेकर इस धरती पर आया था।

अब जरूर आपके मन में एक बात आई होगी कि आज तो हरिवंश राय बच्चन का जन्मदिन नहीं है। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्मदिन भी तो कल था। फिर आज इस गीत के रचनाकार का जन्मदिन कैसे हो सकता है? दरअसल ये दोनों नाम इस रचना के रचनाकार के रूप में अक्सर लिए जाते हैं, लेकिन इन दोनों महान रचनाकारों का इस रचना से कोई संबध नहीं है। महान छायावादी रचनाकार निराला और ‘मधुशालाकार’ बच्चन बहुत दिनों तक इस गीत का श्रेय अनजाने में लेते रहे हैं लेकिन इस अमर गीत को रचा है राष्ट्रीय चेतना के गीतकार और अपनी माटी से प्रेम के अद्भुत रसिक कवि सोहनलाल द्विवेदी ने। उत्तर प्रदेश के फतेहपुर के बिंदकी गांव में 22 फरवरी 1906 को पैदा हुए सोहलनाल द्विवेदी ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि प्राप्त साहित्यकार हैं। स्वाधीनता के अहिंसक संग्राम के सेनानी रहे द्विवेदी महात्मा गांधी से बेहद प्रभावित थे। उन्होंने महात्मा गांधी पर अनेक भावपूर्ण गीतों की रचना भी की है।

‘कोशिश करने वालों की हार नहीं होती’ कविता उनकी अनेक अद्भुत भावपूर्ण रचनाओं में से एक है। यह महाराष्ट्र बोर्ड की छठवीं के पाठ्यक्रम में पढ़ाई जाती है। छठवीं की पुस्तक में लिखी कविता के साथ उसके रचनाकार का नाम दर्ज नहीं है। ‘महाराष्ट्र पाठ्य पुस्तक समिति’ तक जब इसके रचनाकार की पड़ताल पहुंची तब पता चला कि इसके लेखक सोहनलाल द्विवेदी हैं। इस बाबत लोकप्रिय कवि देवमणि पांडेय ने अपने ब्लॉग मे लिखा है कि महाराष्ट्र की छठीं की पाठ्य पुस्तक में शामिल इस कविता के बारे में जब उन्होंने मुम्बई विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त हिंदी विभागाध्यक्ष एवं महाराष्ट्र पाठ्य पुस्तक समिति के अध्यक्ष डॉ.रामजी तिवारी से फोन पर सम्पर्क किया और इस संदर्भ में जानकारी मांगी तो उन्होंने बताया कि अशोक कुमार शुक्ल नाम के एक सदस्य ने सोहनलाल द्विवेदी की यह कविता वर्धा पाठ्यपुस्तक समिति को लाकर दी थी। तब यह शायद किसी पत्रिका में प्रकाशित थी। इस कविता को छ्ठी या सातवीं के पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया था। उन्होंने लिखा है कि समिति के रिकार्ड में रचनाकार के रूप में सोहनलाल द्विवेदी का नाम तो दर्ज है मगर उसके साथ एक टिप्पणी लिखी है कि ‘पता अनुपलब्ध है।’ इसी वजह से कभी इस गीत की रॉयल्टी नहीं भेजी गई।

कई पुराने कवि भी इस संबंध में कहते हैं कि यह रचना उन्होंने कई बार सोहनलाल द्विवेदी को मंचों पर पढ़ते सुना है। हिंदी फिल्मों के अभिनेता अमिताभ बच्चन ने कई बार मंचों पर यह कविता पढ़ते हुए इसे हरिवंश राय बच्चन की कविता बताया था। बाद में अमिताभ ने 3 और 4 दिसंबर 2015 को क्रमशः ट्विटर और फेसबुक पर पोस्ट कर यह स्पष्ट किया कि यह कविता ‘बाबूजी’ की नहीं बल्कि सोहनलाल द्विवेदी की लिखी हुई है। उनके इस कदम की काफी सराहना भी हुई और इस तरह से यह स्पष्ट हो गया कि यह कविता बच्चन जी की नहीं है। कविता का शब्द शिल्प भी इस बात की पुष्टि करता है। तमाम विद्वानों ने इस कविता के द्विवेदी जी की होने के संदर्भ में यह तर्क भी प्रस्तुत किया है। उनका कहना है कि कविता का भाषाई शिल्प कहीं से भी बच्चन या फिर निराला की तरह का नहीं है। इसकी शब्दावली और भाव पूरी तरह से द्विवेदी जी की कविताई के अनुकूल हैं। इसलिए इस कविता के उनके होने को लेकर कोई संदेह शेष नहीं रह जाता।

कविताः सोहनलाल द्विवेदी

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है।
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती।
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है।
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में।
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती।
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो।
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम।
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती।
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

(साभारः कविता कोश)

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