निहारिका फेसबुक पर अति सक्रिय है। वह खुद को नारीवादी भी कहती है। शायद कथित नारीवादी बोझ के तहत ही किसी महिला से मिलने के बाद इस तरह के वक्तव्यों के साथ पोस्ट करती है कि इनसे मिल कर बहन जैसा लगा। किसी सामान्य जानकार महिला के यहां किसी कार्यक्रम में जाने पर बताती है कि हमारा सात जन्मों का बंधन है। फिर उसी महिला से जरा सा मनमुटाव होने के बाद वह सोशल मीडिया पर शिकायतों की भरमार भी लगा देती है। सात जन्मों का रिश्ता इतना बेमानी हो जाता है कि निजी व भावुक क्षणों में की गई बातचीत का ‘स्क्रीन शाट’ साझा करना शुरू कर देती है।
कुछ ही देर में उस स्क्रीन शाट पर पंचायत बैठ जाती है। आधे लोग इधर, आधे लोग उधर और बाकी किसी भी तरफ के नहीं होकर अपनी-अपनी राय देने लगते हैं। हिंदी के क्षेत्र में ‘स्क्रीन शाट’ की अदालत देख कर यही लगता है कि अभी तक हिंदी साहित्य का बड़ा तबका इतनी पुरानी तकनीक को लेकर परिपक्व नहीं हो पाया है। लगता है कि इन्हें सोशल मीडिया पर भावनात्मक प्रबंधन करना आता ही नहीं। एक मशहूर उक्ति है- दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त बन जाएं तो शर्मिंदा न हों।
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सोशल मीडिया पर त्वरित टिप्पणी की हड़बड़ी सबसे पहले इसी जगह को खत्म कर देती है। पहले तो आप किसी की इतनी तारीफ कर देते हैं कि तारीफ शब्द कह दे-मेरा तो यह भावार्थ नहीं होता। दूसरी तरफ जरा सी नाराजगी पर आप उनकी उन बातों को भी सोशल मीडिया पर ला देते हैं जो उन्होंने आपको एक गंभीर इंसान जान कर बताई हो। उस वक्त बताने वाले को अंदाजा भी नहीं होगा कि कुछ दिनों के ही अंदर उसका भरोसा ‘स्क्रीन शाट’ के रूप में बांटा और अग्रेषित किया जा रहा होगा। कुछ दिनों पहले मशहूर अदाकार मरहूम इरफान के बेटे बाबिल ने बालीवुड को धिक्कारते हुए इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट डाल दी थी।
उस पोस्ट से हुए खमियाजे के बाद उन्होंने वो वीडियो हटा दी थी। लेकिन इस घटना के बाद बाबिल के बहुत से दोस्तों ने शायद उन पर भरोसा करना छोड़ दिया होगा। उन्हें डर लगता होगा कि पता नहीं, यह भावनात्मक रूप से बेकाबू होकर सोशल मीडिया पर किसी को कुछ बोल दे। बाबिल तो अभी युवा हैं, जो इस स्थिति से उबर गए। लेकिन परिपक्वता की उम्र में वजनी हो जाने के बाद भी मशहूर साहित्यकार, कलाकार, सामाजिक प्रभावकर्ता भावानात्क प्रबंधन में नाकाम दिखते हैं तो इसकी वजह क्या हो सकती है?
एक वजह तो यह भी हो सकती है कि आधुनिकता एक बहुआयामी भाव है। आप किसी आधुनिक यंत्र को बस इस्तेमाल करने लगते हैं, उसके हिसाब से बने नए अध्यायों के अध्ययन में रुचि नहीं रखते। सोशल मीडिया के भी कई सदाचार हैं तो कदाचार भी हैं। हमें अभी भी लगता है कि हमने ‘डिलीट’ कर दिया और बात खत्म। आपका हर ‘डिलीट’ आपके अपरिपक्व व्यक्तित्व की पहचान है।
