स्वतंत्रता आंदोलन में कई बार जेल जाने वाले रामवृक्ष बेनीपुरी ने कारावास को भी लेखन की जमीन बना दिया। ‘माटी की मूरतें’, ‘पतितों के देश में’, ‘आम्रपाली’ और ‘गेहूं और गुलाब’ जैसी रचनाओं में उनकी कलम ने उस समाज को दर्ज किया, जिसके लिए वे आंदोलन भी कर रहे थे।

जेल का नाम सुनते ही आम तौर पर एक बंद दरवाजा, पहरेदार और बाहर की दुनिया से कटे हुए दिनों की तस्वीर सामने आती है। लेकिन रामवृक्ष बेनीपुरी के लिए जेल सिर्फ बंद रहने की जगह नहीं थी। वहां भी उनके भीतर का लेखक बाहर की दुनिया से संवाद करता रहता था।

वे स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे, कई बार जेल गए और जीवन के करीब आठ वर्ष कारावास में बिताए। लेकिन उन्होंने इन वर्षों को केवल राजनीतिक संघर्ष के दिनों की तरह नहीं जिया। जेल उनके लिए लिखने की जगह भी बनी। जब वे बाहर आते तो उनके साथ केवल जेल की यादें नहीं होती थीं, कई बार नई रचनाओं की पांडुलिपियां भी होती थीं।

यही बात रामवृक्ष बेनीपुरी को केवल स्वतंत्रता सेनानी या केवल साहित्यकार मानकर पढ़ने से रोकती है। उनके जीवन में आंदोलन और साहित्य दो अलग-अलग रास्ते नहीं थे। दोनों एक-दूसरे में मिलते थे।

‘प्रताप’ से शुरू हुआ शब्दों का सफर

23 दिसंबर 1899 को बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के बेनीपुर गांव में जन्मे रामवृक्ष बेनीपुरी का बचपन आसान नहीं था। माता-पिता का निधन बचपन में ही हो गया था और उनका पालन-पोषण ननिहाल में हुआ। संघर्ष उनके जीवन में बहुत जल्दी आ गया, लेकिन शायद इसी ने उनके भीतर लोगों और उनके दुख-सुख को देखने की वह नजर भी पैदा की, जो आगे चलकर उनके साहित्य की पहचान बनी।

1916 में उनकी पहली रचना ‘प्रताप’ में प्रकाशित हुई। तब वे किशोर ही थे। आगे चलकर यही किशोर लेखक पत्रकार बना, संपादक बना, स्वतंत्रता आंदोलन में उतरा और बार-बार जेल गया।

1920 के आसपास असहयोग आंदोलन से जुड़ने के बाद उनके जीवन की दिशा बदल गई। उन्होंने पढ़ाई छोड़ी और राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय हो गए। लेकिन उनके लिए आंदोलन का अर्थ केवल सभा, जुलूस और जेल जाना नहीं था। लिखना, लोगों तक बात पहुंचाना और समाज को भीतर से बदलने की कोशिश करना भी उसी संघर्ष का हिस्सा था।

यही वजह है कि पत्रकारिता उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी। ‘युवक’ जैसी पत्रिका के माध्यम से उन्होंने युवाओं में राष्ट्रीय चेतना जगाने की कोशिश की। वे कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादन से जुड़े और पत्रकारिता को अपने सामाजिक सरोकारों का माध्यम बनाया।

जेल की दीवारों के भीतर भी चलता रहा लेखन

बेनीपुरी के जीवन का सबसे दिलचस्प पक्ष शायद यही है कि जेल उनके लेखन के रास्ते में दीवार नहीं बन सकी। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वे हजारीबाग जेल में थे। उस समय जेल में बैठे बहुत से कैदियों के लिए बाहर की दुनिया से कट जाना मजबूरी थी। बेनीपुरी के लिए भी यह आसान समय नहीं था, लेकिन उन्होंने उस एकांत को रचनात्मक समय में बदल दिया।

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यहीं एक दिन उनके सामने बाहर की दुनिया से बिल्कुल अलग दृश्य उभरने लगा। हजारीबाग जेल के एकांत में उन्हें अपने गांव और ननिहाल के कुछ लोग याद आने लगे। वे लोग जैसे उनकी आंखों के सामने आकर खड़े हो गए। बेनीपुरी ने महसूस किया कि ये चेहरे उनसे अपना चित्र बनाने की मांग कर रहे हैं। आखिरकार उनकी कलम चल पड़ी और इन्हीं स्मृतियों से ‘माटी की मूरतें’ का संसार तैयार हुआ।

रामवृक्ष बेनीपुरी की तस्वीर के साथ जेल की सलाखें, पांडुलिपि, कलम और दवात को दर्शाती संपादकीय फीचर इमेज।
रामवृक्ष बेनीपुरी की कुछ पुस्तकें।

यह प्रसंग बेनीपुरी के लेखन को समझने की कुंजी है। जेल की चारदीवारी में बंद लेखक की नजर बाहर की दुनिया पर नहीं, अपनी स्मृतियों के भीतर चली गई। वहां उसे बड़े नेता नहीं, गांव के साधारण लोग दिखाई दिए। और वही साधारण लोग साहित्य के पात्र बन गए।

जेल में मिला एक आदमी भी साहित्य का पात्र बन गया

‘माटी की मूरतें’ की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसमें केवल गांव और ननिहाल के लोग नहीं हैं। इसमें जेल की दुनिया से आया एक आदमी भी है – बैजू मामा। बैजू मामा से बेनीपुरी की मुलाकात जेल में हुई थी। वह बार-बार जेल आने वाला कैदी था और लंबे समय तक कारावास भुगत चुका था। लेकिन बेनीपुरी ने उसे केवल एक अपराधी की तरह नहीं देखा। उसके भीतर का आदमी उन्हें दिखाई दिया – उसकी आदतें, उसकी हंसी, उसकी जिंदगी और उसके भीतर छिपी करुणा। बाद में वही आदमी ‘माटी की मूरतें’ के एक शब्दचित्र का पात्र बन गया। यहीं बेनीपुरी की लेखकीय नजर अलग दिखाई देती है।

जिस आदमी को समाज केवल ‘चोर’ कहकर छोड़ सकता था, लेखक उसके जीवन के भीतर चला गया। उसने उसके अपराध से आगे उसके व्यक्तित्व को देखने की कोशिश की। शायद यही कारण है कि बेनीपुरी के यहां साधारण आदमी कभी केवल पृष्ठभूमि नहीं बनता। वह कहानी का केंद्र बन जाता है।

‘माटी की मूरतें’ में मिट्टी के लोगों की असली पहचान

बेनीपुरी अपने पात्रों को चमकाकर पेश करने वाले लेखक नहीं थे। उनकी कोशिश थी कि आदमी जैसा है, उसकी मूल पहचान वैसी ही बनी रहे। ‘माटी की मूरतें’ के बारे में उनका अपना लेखकीय आग्रह भी इसी ओर संकेत करता है। वे मानते थे कि कला पात्रों को सजाए-संवारे, लेकिन इतना नहीं कि उनका असली चेहरा ही गायब हो जाए।
इसलिए उनके रेखाचित्रों में गांव के लोग अपनी पूरी मानवीय जटिलता के साथ आते हैं। उनमें अच्छाइयां हैं, कमजोरियां हैं, स्वाभिमान है, दुख है, हंसी है और संघर्ष भी।

रजिया हो, बलदेव सिंह, बालगोबिन भगत, सुभान खां या बैजू मामा – बेनीपुरी उन्हें केवल याद नहीं करते, उनके भीतर का मनुष्य खोजते हैं। यही वजह है कि ‘माटी की मूरतें’ सिर्फ पात्रों का संग्रह नहीं लगती। वह उस समाज का जीवित दस्तावेज बन जाती है, जिसे इतिहास की बड़ी किताबें अक्सर पीछे छोड़ देती हैं।

जेल में साहित्य, जेल के बाहर आंदोलन

हजारीबाग जेल का समय केवल साहित्य रचने का समय नहीं था। वह स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का भी एक रोमांचक अध्याय था। 1942 में इसी जेल से जयप्रकाश नारायण और उनके साथियों के निकलने की घटना स्वतंत्रता आंदोलन की चर्चित घटनाओं में रही। बेनीपुरी का जयप्रकाश नारायण से निकट संबंध था और उपलब्ध स्रोतों में उनके इस पूरे प्रसंग से जुड़े होने का उल्लेख मिलता है।

इससे बेनीपुरी के जीवन का एक और चेहरा सामने आता है। वह केवल जेल में बैठकर साहित्य लिखने वाले लेखक नहीं थे। जेल की दीवारों के भीतर भी वे उस राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बने हुए थे, जिसके लिए उन्होंने अपना जीवन दांव पर लगा दिया था। उनके लिए साहित्य और आंदोलन अलग-अलग काम नहीं थे। दोनों एक ही जीवन के दो रूप थे।

‘गेहूं और गुलाब’ वाला लेखक

बेनीपुरी को केवल क्रांतिकारी लेखक समझ लेना भी उनके साहित्य के साथ न्याय नहीं होगा। उनकी रचनाओं में संघर्ष के साथ जीवन की सुंदरता की तलाश भी दिखाई देती है। ‘गेहूं और गुलाब’ इसका एक अच्छा उदाहरण है। यहां ‘गेहूं’ जीवन की भौतिक जरूरतों का और ‘गुलाब’ मनुष्य के भीतर की सुंदरता, संवेदना और सांस्कृतिक आकांक्षा का प्रतीक बन जाता है।

यानी जिस लेखक ने जेल में बैठकर स्वतंत्रता और समाज की बेचैनी लिखी, वही लेखक यह भी पूछता है कि केवल पेट भर जाने से मनुष्य का जीवन पूरा हो जाता है क्या?यहीं बेनीपुरी एक राजनीतिक कार्यकर्ता से आगे बढ़कर मनुष्य और जीवन के लेखक बन जाते हैं। उनकी रचनाओं में इसलिए गांव भी है, इतिहास भी है, राजनीति भी है, जेल भी है और मनुष्य के भीतर की कोमल दुनिया भी।

दिनकर ने क्यों कहा था – ‘असल सूर्य तो बेनीपुरी थे’

बेनीपुरी के व्यक्तित्व की तीव्रता को समझने के लिए रामधारी सिंह दिनकर से जुड़ा एक प्रसिद्ध कथन अक्सर उद्धृत किया जाता है। मस्तराम कपूर द्वारा संपादित ‘रामवृक्ष बेनीपुरी रचना संचयन’ के परिचय में दिनकर के हवाले से लिखा गया है – “नाम तो मेरा दिनकर है पर असल सूर्य तो बेनीपुरी थे।”

यह सिर्फ प्रशंसा का वाक्य नहीं लगता। बेनीपुरी के जीवन को देखें तो इसकी पृष्ठभूमि समझ में आती है।

जिस व्यक्ति ने युवावस्था में आंदोलन का रास्ता चुना, पत्रकारिता को राजनीतिक और सामाजिक चेतना का माध्यम बनाया, बार-बार जेल गया, जेल में भी लिखता रहा और वहां मिले एक कैदी तक को साहित्य का पात्र बना दिया – उसके व्यक्तित्व में एक असाधारण ऊर्जा थी। वह ऊर्जा उनकी भाषा में भी थी और जीवन में भी।

कलम को उन्होंने आराम की चीज नहीं बनने दिया

रामवृक्ष बेनीपुरी का निधन सितंबर 1968 में हुआ। उनकी मृत्यु की तारीख को लेकर विभिन्न स्रोतों में मतभेद मिलता है, इसलिए इस लेख का आधार किसी एक विवादित तारीख को नहीं बनाया जा रहा है। लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान किसी तारीख में नहीं, उस जीवन-शैली में है जिसमें लेखन और जीवन अलग नहीं थे। वे आंदोलन में गए तो लेखक साथ था। जेल गए तो लेखक साथ था। पत्रकारिता की तो उसमें भी साहित्य और समाज साथ रहे।

उनकी जिंदगी यह बताती है कि साहित्य हमेशा शांत कमरे में मेज पर बैठकर ही नहीं लिखा जाता। कभी-कभी वह जेल की कोठरी में जन्म लेता है। कभी वह गांव की किसी भूली हुई शक्ल से निकलता है। कभी किसी ऐसे आदमी में अपना पात्र खोज लेता है, जिसे समाज ने पहले ही खारिज कर दिया हो।

इसलिए बेनीपुरी को पढ़ना केवल एक पुराने लेखक को याद करना नहीं है। यह उस नजर को फिर से हासिल करना है, जो इतिहास के बड़े नामों के बीच खड़े साधारण मनुष्य को भी देख सके। और शायद यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है – उन्होंने जिन लोगों को साहित्य में जगह दी, वे उनकी किताबों के पन्नों पर आकर फिर से जीवित हो गए। उनकी कलम जेल की दीवारों के भीतर भी बंद नहीं हुई।