बकरी मिमियायी, शबरी की नींद उचट गई। बिस्तर गीला था, मारे घिन के शबरी की जीभ से गाली फूटी। उसने चिमनी जलाई, बकरी दयनीय दृष्टि से उसे ताक रही थी। शबरी ने उसे अलग कर गद्दा पलटा और खिड़की से बाहर देखने लगी। बाहर घुप्प अंधेरा था, सहसा कुत्तों के भौंकने का स्वर सुनाई दिया। शबरी थर-थर कांपने लगी। अक्सर कुत्ते तभी भौंकते हैं जब कोई गंध महसूस करते हैं। शबरी को अपने बैल व बकरियों की चिंता होने लगी। गोठ के द्वार कच्चे थे, बाघ कभी भी जानवर पकड़ने घुस सकता था, तभी गोठ में छिड़-छिड़ होने लगी।

शबरी डंडा बजाती, हो हल्ला मचाती, सीढ़ियां उतरी। बैल खूंटे से खुल गया था, वह बकरी वाले गोठ में घुस गया था। बकरियां मिमियाने लगीं। बैल को बांधकर शबरी दरवाजे पर लकड़ी फट्टी जमाकर सीढ़ियां चढ़ने लगी तो एकाएक उसे लगा कि उसके साथ कोई साया चल रहा है। कांपते हाथों से उसने दरवाजा बंद कर सांकल चढ़ाई और बकरी के बच्चे के पास लेट गई। बकरी को उसने अपने अकेलेपन से डर कर अपने साथ रखा था।

चिमनी की मरियल पीली रोशनी में बकरी की आंखें चमकने लगी। शबरी को लगा, बकरी के रूप में कोई प्रेतात्मा उसके साथ रह रही है। शबरी का मन हुआ जोर से चिल्लाए, ताकि गांव वालों की नींद में खलल पड़े, वे उसके पास आकर कहें कि तुम इस सूने घर में अकेली नहीं रह सकती। शबरी सोचने लगी, वह कैसी अभागिन है। पांच बेटे-बेटियों के होते अकेले रहने को अभिशप्त है। बेटियां तो एक-एक कर अपने घर चली गईं, पर बेटा उसका अपना क्यों न हुआ? वह अपने घर से दूर…वहां क्यों चला गया? बेटे की याद आते ही वह छटपटाने लगी। उसके मन की करुण पुकार निचाट शून्य में भरने लगी, ‘प्रभु! इतनी क्रूर सजा मेरे लिए ही क्यों तय की गई? सभी लोग अपने बाल-बच्चों के साथ सुख की नींद सो रहे हैं, मैं ही एक अभागी जागने पर विवश क्यों?’

आज सुबह जग्गू ने उसे उसके दीपू की लाठी से कोंचा था। क्या कहा था उसने जग्गू को? यही न कि वो उसके ही खेतों में सबसे आखिर में हल जोतता है। इसलिए फसल भी देर से पकती है। जग्गू ने कैसा तीर उसके कलेजे में चुभोया था, ‘बौजी! रे! कितना चाहिए तेरे अकेले पेट को? कुलदीपक तो तेरा आने से रहा, उसे तो लूट का माल और जेल की रोटी खाने का चस्का लग चुका है। तेरी मेहनत की कमाई कौन खाएगा अब?’ जग्गू के पिचके चेहरे पर विद्रूप मुस्कान थी। जग्गू क्या समझेगा, जिस कुलदीपक के लिए खुद को तिल-तिल मारा, कमलेश्वर के मंदिर में हथेली में जलता दिया थामे वह पूरी रात खड़ी रही थी। संतान के लिए सारे व्रत-अनुष्ठान किए।

गदेरे में पत्थर डालने के बहाने उठी थी वह और पत्थर पर सिर मारकर रो पड़ी। वहां पेड़ों पर बैठे पंछियों ने उसका विलाप सुनकर सहानुभूति जताई होगी, पर जग्गू, वह तो उसकी डबडबायी आंखों में झांक कर कोई मौका नहीं चूकता, ‘बौजी! देख तो समय की लीला। चाचा कितने भले आदमी हुए। भाई भी भला ही ठहरा। एक ये दीपू कंबख्त किसके पापों का फल हुआ? मरता भी…’। शबरी फफक पड़ती, ‘मुझे कुछ भी बोल दे। पर मेरे दीपू को मारना नहीं। अभी उसके बुरे दिन चल रहे। उसका भी समय पलटेगा’। समय ने अपनी केंचुली उतारी जाने कैसे? उसके पति की उतरन पहनने वाले जग्गू की अब कितनी लंबी जीभ हो गई। बेबसी में उसकी आंखें छलकने लगी, ‘बचपन क्रूर पिता के आंतक के साये में बीता।

तेरह वर्ष की होने पर ससुराल आ गई, तब से पति की सेवा करती रही और सासू का हुक्म बजाती रही। पति के सिवा कोई मेरे ध्यान में भी नहीं आया। गांव के जवान देवरों की हंसी-ठिठोली छोटा सा मजाक भी पाप लगा। कभी किसी का बुरा किया हो मुझे याद नहीं, चोरी से किसी के खेतों की घास काटी हो, याद नहीं। एक बार सासू के साथ झगड़ा जरूर हुआ था, सासू ने इल्जाम ही ऐसा लगाया था, ससुर जी को लेकर! ससुर जी मेरा दुख समझते रहे, मेरे पीछे खेत में हाथ बंटाने आ जाते भले मानुष! मैंने कहा था, सासू तुम्हारी जीभ में कीड़े पड़ें। बस, खुद तो छज्जे की चौधरी बनी बैठी रहेगी और ससुर जी दया न करें तो कौन करेगा। इतनी बड़ी खेती, ढोर डंगर अलग, मैं एक जान! तुम तो सिर्फ दो समय का खाना भर बनाने में थक जाती हो’।

सासू का बेटा जब देश से आता तो उसे एक सेर का गिलास भर मलाईदार दूध पिलाती और मुझे कभी दूध की कटोरी भी नहीं देती जबकि मैं ही घास लाती। बासमती मैंने रोपे, काटे, मंडाई कर थैलों में भरे, ओखल में कूटे, खुशबू जरूर सूंघी लेकिन स्वाद मुझे नहीं मालूम! धान की रोपनी लगाती, गीली मिट्टी में पांव सूज जाते, मंडाई करते खेतों में रात हो जाती।

सासू मुझे दो महीने बेटे के साथ भेजती, कुलदीपक की उम्मीद में, पर बेचारी की उम्मीदों पर हर बार पानी फिरता रहा, जब कन्या जन्मती। अब सासू ने बेटियों के पैदा होने पर नमक चटाने को कहा तो मेरी रुह कांप गई। अंत में उन्होंने बेटे को दूसरे विवाह के लिए कहा, पर तुम्हारी भी क्या लीला हुई भगवान कि मां बेटे की योजना पर पानी फेर दिया। जब बेटे के सिर पर सेहरा बंधने का विचार पक्का हो रहा था तभी मेरी कोख से दीपू ने जन्म लिया। सासू ने सात गांवों को जीमने का न्योता दिया। सासू तो कुलदीपक को दो साल खिलाने के बाद चली गई। मैं ही अभागी रही सजा पाने को। पिता तो जाने कहां लापता हो गए, उनसे देखा नहीं गया, शायद मर-खप गए हों, कहीं कुछ पता नहीं चला।’

उस दिन जब दीपू के बारे में खबर आई थी तो उसे लगा था कि धरती फट जाए और वो उसमें समा जाए। पर न धरती फटी और न वह उसमें समा पाई, उल्टे अपने जेवर बेच उसे छुड़ाने निकल पड़ी थी। सोचा था एक बार छुड़वा लेगी, फिर उसका मुंह भी नहीं देखेगी। पुरखों के नाम पर कीचड़ पोत गया। मुसलमान की लड़की लेकर भागा। सुनने में आया था लड़की ही लेकर भागी थी छोकरे को। बाद में डर के कारण मुकर गई। मेरे दीपू पर कलंक लगा गई। दीपू को लंबी सजा हुई। लड़की के बाप ने दीपू पर चोरी का इल्जाम भी लगा दिया। लड़की तो बेदाग छूट गई प्रभु! वह भी तो तुम्हारी बेइंसाफी हुई, सजा सिर्फ मेरे बच्चे को मिली।

इधर गांव वालों ने जीना दूभर कर दिया था। उसके भीतर से दर्द की लहर उठने लगी, उसने बकरी को आलिंगन में बांध लिया और बुक्का फाड़कर रोने लगी। उसे लगा बकरी उसकी पीड़ा समझ रही है, सहसा दरवाजा पीटने की आवाज उसके कानों में पड़ी, ‘बौजी हे! कान बहरे हुए क्या? देखती नहीं।’ शबरी ने देखा, अंधेरा तेजी से भाग रहा है। पौ फटने वाली है। वह सोचने लगी, ‘प्रत्येक रात की सुबह होती है। इस रात की सुबह कब होगी’? गीली आंखें धोती के पल्लू से पोंछती हुई वह जग्गू के लिए खाना बनाने लगी, ‘जब तक देह में प्राण हैं कर्मों से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए। शायद रात की सुबह होने का यही नियम हो। है न प्रभु’।