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नृत्योत्सवः कृष्ण की बाल लीला

नृत्य रचना ‘वृंदावन’ का आरंभ मीरा बाई की रचना से हुआ। यह मीरा बाई के पद ‘आली मणे वृंदावन नीको, घर-घर तुलसी ठाकुर पूजा’ पर आधारित थी। भरतनाट्यम नृत्यांगना गीता चंद्रन और कथक नृत्यांगना शोवना नारायण ने भाव के साथ अंग संचालन की शुरुआत की। दोनों नृत्यांगनाओं ने अपने नृत्य से मंच को वृंदावन जैसा कर दिया।

Author Published on: March 13, 2020 3:19 AM
नृत्यांगना गीता चंद्रन और शोवना नारायण।

शशिप्रभा तिवारी

पिछले दिनों वरिष्ठ नृत्यांगना गीता चंद्रन और शोवना नारायण ने नृत्य रचना ‘वृंदावन’ पेश किया, जो भरतनाट्यम और कथक नृत्य में पिरोई गई थी। इस कार्यक्रम का आयोजन इंडियन कैंसर सोसाइटी द्वारा चिन्मय मिशन सभागार में किया गया था।

नृत्य रचना ‘वृंदावन’ का आरंभ मीरा बाई की रचना से हुआ। यह मीरा बाई के पद ‘आली मणे वृंदावन नीको, घर-घर तुलसी ठाकुर पूजा’ पर आधारित थी। भरतनाट्यम नृत्यांगना गीता चंद्रन और कथक नृत्यांगना शोवना नारायण ने भाव के साथ अंग संचालन की शुरुआत की। दोनों नृत्यांगनाओं ने अपने नृत्य से मंच को वृंदावन जैसा कर दिया। इस युगल पेशकश के बाद गीता चंद्रन ने वरणम पेश किया। जिसमें उन्होंने भक्ति मार्ग में समाहित स्मरण, दर्शन, सेवा, कीर्तन के भावों को अपने नृत्य में रूपायित किया। नंदकुमार अष्टकम से ली गई, रचना ‘सुंदर गोपालम उर वनमालम’ का चयन काफी समीचीन था। इस राग मालिका में यमन, चंद्रकौंस, दुर्गा, केदार व बसंत का मेल था। कृष्ण के रूप का वर्णन करते हुए, नृत्यांगना ने विशाल नयन, दुखहर, कुंचित केश, नटवर, विपिन बिहारी, मुकुटधर को दर्शाया। वहीं कृष्ण की बाल लीला का चित्रण करने के क्रम में कालिया दमन व गोपालक प्रसंग को निरूपित किया। गीता चंद्रन ने ‘चित्तहरम चीरहरम’ की व्याख्या विस्तार और मनोरम ढंग से की। उनके नृत्य में, एक ओर अभिनय का कमाल था, वहीं दूसरी ओर हर चलन और गति में रस की भीनीं खुशबू थी। पुष्टिमार्गी संत वल्लभाचार्य की इस रचना को गायिका सुधा रघुरामन ने जिस तन्मयता से गाया, उसी तत्परता से गीता चंद्रन ने नृत्य पेश किया। दोनों कलाकारों ने संगीत और नृत्य से समां बांध दिया।

इसके अगले अंश में, कथक नृत्यांगना शोवना नारायण ने कथक नृत्य पेश किया। उन्होंने लखनऊ घराने की तकनीकी पक्ष को अपने नृत्य में पिरोया। उन्होंने उपज अंग में पैर का काम पेश किया। इसके लिए रचना ‘ता धा किट धा धा धा’, ‘थर्रि किट ता धा’, दिग दिग थेई तत् के बोलों पर पैर व अंगों का लयात्मक संचालन पेश किया। एक तिहाई में कृष्ण के पैरों की आवाज और नटवरी नृत्य के अंदाज को पेश किया।

दोनों नृत्यांगनाओं की नृत्य प्रस्तुति की पराकाष्ठा अंतिम प्रस्तुति में दिखी। यह वल्लभाचार्य की रचना ‘अधरं मधुरं’ पर आधारित थी। कृष्ण के मधुर रूप का यह वर्णन लासानी था। एक ओर जहां गीता चंद्रन ने भरतनाट्यम शैली में पेश किया, वहीं दूसरी ओर कथक नृत्यांगना शोवना नारायण ने इसे अपनी शैली में दर्शाया।

इस कार्यक्रम में दोनों ही नृत्यांगनाओं ने कर्नाटक और हिंदुस्तानी संगीत पर अपने-अपने नृत्य शैली में नृत्य प्रस्तुत किया। नृत्य की ऐसी प्रस्तुति वर्षों के अनुभव और लगातार प्रयास से ही संभव है। प्रस्तति के संगत कलाकारों में मनोहर बालचंद्रन, सुधा रघुरामन, जी रघुरामन, एस शंकर, माधव प्रसाद, शकील अहमद और महावीर गंगानी शामिल थे।

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