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चर्चाः मकसद से भटकती गोष्ठियां

सेमिनारों की अराजक स्थिति का सबसे बुरा प्रभाव सामान्य श्रोताओं पर पड़ा है। श्रोताओं की स्वत: स्फूर्त भागीदारी अब धीरे-धीरे समाप्त हो रही है। जिसका सेमिनार होता है या जो वक्ता है, उससे जुड़े लोग ही वहां पहुंचते हैं। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि ‘पेड श्रोता’ का चलन शुरू हो गया है।

Author September 30, 2018 2:14 AM
आयोजकों और प्रतिभागियों द्वारा न्यूनतम ईमानदारी का भी पालन न किए जाने के कारण हिंदी के अधिकांश सेमिनार एक-दूसरे को उपकृत करने का माध्यम भर बन गए हैं।

ज्ञान के क्षेत्र में लोकतंत्र का होना परम आवश्यक है। परस्पर सहमति और असहमति से ज्ञान का विस्तार होता है। इसलिए विचार-विमर्श ज्ञान-प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है। ज्ञान की प्रक्रिया को गतिशील बनाए रखने के लिए विचार-विमर्श की प्रक्रिया को गतिशील बनाए रखना अनिवार्य है। इसी सोच के तहत सेमिनारों और गोष्ठियों की संकल्पना की गई, जहां भिन्न-भिन्न मत के लोग भिन्न-भिन्न दृष्टियों से किसी मुद्दे पर अपना विश्लेषण और निष्कर्ष प्रस्तुत कर सकें। सेमिनार विद्वानों के लिए एक अवसर होता है कि वे अपने विचारों को दूसरे विद्वानों के साथ-साथ उस विषय से सरोकार रखने वाले व्यापक समूह के साथ साझा कर सकें। पर सेमिनार या गोष्ठी की यह सार्थकता तभी संभव है जब उसके आयोजक और प्रतिभागी दोनों ईमानदार हों और अपना-अपना दायित्व निभाएं। आयोजक की ईमानदारी इस बात में है कि वह वक्ता या विशेषज्ञ के रूप में ऐसे व्यक्तियों को बुलाए, जिनकी उस विषय में दक्षता हो और प्रतिभागी की ईमानदारी इस बात में है कि वह दिए गए विषय पर पूरी तैयारी के साथ अपने को प्रस्तुत करे। दुर्भाग्य से आयोजक और वक्ता दोनों ही तरफ ईमानदारी खत्म होती जा रही है। परिणाम हमारे सामने है कि इन दिनों सेमिनारों और गोष्ठियों से कुछ भी बेहतर निकल कर नहीं आ रहा है। दूसरे विषयों की अपेक्षा हिंदी में सेमिनारों के लिए अधिक अवसर होता है। हिंदी भाषा (राजभाषा विभाग), हिंदी साहित्य (अकादमियां और साहित्यिक संस्थान) और हिंदी विषय (विश्वविद्यालय) हिंदी के इन तीनों आयामों पर तीन अलग-अलग केंद्रों से सेमिनार आयोजित होते रहते हैं। चूंकि हिंदी में सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं के माध्यम से बहुत अधिक सेमिनारों का आयोजन होता है। इसीलिए, यहां अराजकता भी सर्वाधिक देखने को मिलती है।

एक बड़ा प्रश्न है कि हिंदी में निरंतर होने वाले किसिम-किसिम के सेमिनार हिंदी, हिंदी साहित्य और एक अनुशासन के रूप में हिंदी के विकास में थोड़ी भी भूमिका निभा रहे हैं? हिंदी में बड़े बजट के तमाम आयोजनों को बंद कर दिया जाए तो क्या इससे हिंदी भाषा और साहित्य की सेहत पर कोई फर्क पड़ेगा? दरअसल, हिंदी का पूरा साहित्यिक और बौद्धिक परिवेश एक विचित्र भंवर में फंस गया है। सेमिनारों और गोष्ठियों में पाई जाने वाली गंभीरता और बौद्धिकता अब बीते जमाने की चीज हो गई है। कुछ गुट और गिरोह जरूर सक्रिय हैं। वे ही वक्ता हैं और वे ही श्रोता और वे ही आयोजक भी। ऐसा लगता है कि सेमिनार एक बौद्धिक उपक्रम न होकर धंधा बना गया है और यह धंधा कुछ लोगों द्वारा कुछ लोगों के लिए संचालित है। यह देख कर घोर आश्चर्य होता है कि हिंदी में कुछ अपवादों को छोड़ कर कोई वक्ता बोलने से पहले कोई पूर्व तैयारी नहीं करता है। वह गैर-जिम्मेदाराना ढंग से कुछ भी बोल कर चला जाता है। यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि हिंदी का कोई भी वक्ता हिंदी से संबंधित सभी विषयों में अपने को विशेषज्ञ मानता है। वह आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक और कविता से लेकर उपन्यास आदि किसी भी विधा पर आत्मविश्वास पूर्वक वक्तव्य दे सकता है। इसीलिए भिन्न-भिन्न सेमिनारों में वक्ताओं की अगर सूची देखी जाए तो नामों में प्राय: समानता मिलेगी।

आयोजकों और प्रतिभागियों द्वारा न्यूनतम ईमानदारी का भी पालन न किए जाने के कारण हिंदी के अधिकांश सेमिनार एक-दूसरे को उपकृत करने का माध्यम भर बन गए हैं। सेमिनार का आयोजन और कुछ नहीं, सिर्फ जनसंपर्क अभियान का हिस्सा बन कर रह गया है। किसी भी सेमिनार में किसी को बुलाए जाने की यह आवश्यक शर्त नहीं है कि वह उस विषय का जानकर हो। आज सेमिनारों में बुलाए जाने का मुख्य आधार व्यक्ति की हैसियत, उसकी विचारधारा, निजी मित्रता, आदि जैसी चीजें बन गई हैं। जब सेमिनारों में आमंत्रण का आधार योग्यता न होकर निजी संबंध बन जाएगा, तब सेमिनारों की उपादेयता निश्चित ही समाप्त हो जाएगी।

यह और भी दुखद है कि विश्वविद्यालयों के साथ-साथ हिंदी भाषा और साहित्य के उत्थान के लिए जितनी अकादमियां और सरकारी संस्थान हैं, वहां सेमिनार के नाम पर एक तरह से गुटबाजी और गिरोहबाजी को प्रश्रय दिया जाता है। संस्थान का मुखिया सेमिनार द्वारा अपने गिरोह के लोगों को उपकृत करता है। यह कितनी विडंबना है कि जिन सेमिनारों द्वारा हिंदी में एक स्वस्थ्य लोकतांत्रिक साहित्यिक वातावरण का निर्माण होना चाहिए आज वे ही सेमिनार गिरोहबाजी के साधन बन गए हैं। साहित्य के संवर्धन और संरक्षण के लिए केंद्र और राज्यों में बनी संस्थाएं निरंतर सेमिनार करती रहती हैं। इनका बजट करोड़ों में होता है। इन दो या तीन दिवसीय सेमिनारों में अधिकतर लोग साहित्येतर कारणों से आमंत्रित होते हैं। आमंत्रित लोग भी सेमिनार को अकादमिक गतिविधि के रूप में नहीं, बल्कि सरकारी खर्च पर एक ऐसी पिकनिक यात्रा के तौर पर लेते हैं, जहां सबसे मिलना-जुलना हो जाता है। आयकर दाताओं के धन से चलने वाली ये संस्थाएं सरकारी धन का जम कर दुरुपयोग करती हैं। हम लोग दूसरी संस्थाओं में सरकारी धन के दुरुपयोग को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त करते रहते हैं। पर क्या साहित्यिक संस्थाओं के संदर्भ में यह मुद्दा इसलिए अप्रासंगिक हो जाता है, क्योंकि यहां लाभान्वितों की सूची में हमारा नाम होता है।

सेमिनारों की अराजक स्थिति का सबसे बुरा प्रभाव सामान्य श्रोताओं पर पड़ा है। श्रोताओं की स्वत: स्फूर्त भागीदारी अब धीरे-धीरे समाप्त हो रही है। जिसका सेमिनार होता है या जो वक्ता है, उससे जुड़े लोग ही वहां पहुंचते हैं। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि ‘पेड श्रोता’ का चलन शुरू हो गया है। दिल्ली की हिंदी अकादमी पिछले कुछ सालों से अपने वार्षिक साहित्योत्सव में ‘वालंटियर’ के तौर पर सैकड़ों लोगों को रखती है और उन्हें पांच सौ से एक हजार रुपए प्रतिदिन दिया जाता है। इन वालंटियरों का एक प्रमुख काम यह होता है कि जिस गोष्ठी में श्रोता न हों या कम हों, वहां वे स्वयं जाकर बैठें। शायद यह धन के दुरुपयोग का लोकतांत्रीकरण है। इसका एक सकारात्मक पक्ष तो है ही कि जब सरकारी धन का दुरुपयोग हो ही रहा है, तो उसका फायदा अधिक से अधिक लोगों को मिले। कुछ और संस्थानों में भी सीमित स्तर पर ही सही, ‘पेड श्रोता’ की शुरुआत हो चुकी है। यह कितनी दुखद स्थिति है कि हिंदी के सेमिनारों में श्रोता बिना डर या प्रलोभन के नहीं पहुंचता है। दिल्ली से बाहर की स्थितियां तो कुछ बेहतर हैं, पर दिल्ली का यही सच है।

श्रोताओं को हिंदी के सेमिनारों से कुछ भी नया हासिल नहीं होता। वह यहां तक जान लेता है कि अमुक व्यक्ति अमुक विषय पर क्या बोलेगा? वह उस व्यक्ति को इतनी बार सुन चुका होता है और वह व्यक्ति हर सेमिनार में एक ही बात को इतना दोहरा चुका होता है कि श्रोता को अक्षरश: अनुमान लगाना कठिन नहीं होता है। वक्ता इतने आत्ममुग्ध होते हैं कि वे श्रोताओं की मनोदशा को समझना ही नहीं चाहते। ऐसा लगता है कि मानो श्रोता उनके अनुयायी हों और वे उनके अर्थहीन प्रवचन सुनने के लिए बाध्य हैं। इस प्रवृत्ति ने हिंदी के सेमिनारों को घोर उबाऊ बना दिया है। गंभीर कार्य करने वाले लोग अब प्राय: इन गोष्ठियों और सेमिनारों से अपने को अलग करने लगे हैं। अजीबोगरीब स्थिति तब हो जाती है जब वक्ता स्वयं यह कह देता है कि इस विषय पर बोलने के लिए उसकी तैयारी नहीं है। बावजूद इसके वह निरंतर बोलता रहता है। ऐसे यह प्रश्न स्वाभाविक उठता है कि अगर हिंदी में हो रहे सेमिनारों और गोष्ठियों से कुछ भी नया निकल कर नहीं आ रहा है और न ही इससे हमारे ज्ञान में कोई वृद्धि हो रही है तो फिर इन सेमिनारों और गोष्ठियों में रखा क्या है?

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