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पौराणिक कथा पर आधारित नृत्य देखकर दर्शक मंत्रमुग्ध

कीर्तन ‘श्री कृष्ण गोविंद’ का प्रयोग किया, जो राधा-कृष्ण के भावों से मेल खाता हुआ नजर नहीं आया। यह उचित होता कि कृष्ण के प्रणय की स्वीकारोक्ति के साथ ही कविता इस प्रस्तुति को विराम देतीं।

Author July 5, 2019 4:16 AM
नृत्यांगना कविता द्विवेदी

शशिप्रभा तिवारी

ओडिशी नृत्यांगना कविता द्विवेदी को कुछ साल पहले ओडीशा संगीत नाटक अकादमी की ओर से सम्मानित किया गया। इससे पहले भी उन्हें कई सम्मान मिल चुके हैं। अक्सर कविता देश के विभिन्न हिस्सों में स्पिक मैके और अन्य संस्थाओं के आयोजनों में अपनी नृत्य का प्रदर्शन करती रही हैं। नृत्यांगना कविता की खासियत है कि वे हमेशा नए विषयों पर सोचती हैं और अपनी सोच को नृत्य में बेहतरीन तरीके से पेश करती हैं। उन्होंने ‘राधा’, ‘पिंगला’, ‘देवी’, ‘भगवान बुद्ध’, ‘वर्षा’, ‘तुलसी’ जैसे विषयों पर अच्छी सोच और रचनात्मकता के साथ नृत्य पेश किया है। पिछले दिनों उन्होंने संगीत नाटक अकादमी की ओर से आयोजित सुसंस्कृति समारोह में ओडिशी नृत्य पेश किया।

आदि शंकराचार्य रचित शिव पंचाक्षर से नृत्यांगना कविता द्विवेदी ने अपना नृत्य आरंभ किया। मंगलाचरण में पहले भगवान जगन्नाथ का स्मरण करने के बाद उन्होंने शिव की वंदना आरंभ की। पंचाक्षर के बीज अक्षर न, म, शि, वा और व को पंचतत्व क्रमश: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश ऊर्जावान बनाते हैं। मानव शरीर भी तो इन्हीं पंचतत्व का बना है और इस मंत्र से इस तन को भी ऊर्जा प्राप्त होती है। इन्हीं भावों को नृत्यांगना ने नृत्य में निरूपित किया। पंचाक्षर-‘नागेंद्रहाराये त्रिलोचनाय’ राग जैत और झंपा व एक ताली में निबद्ध था। नृत्यांगना कविता ने शिव के रौद्र रूप और तांडव नृत्य को प्रभावकारी अंदाज में पेश किया।

उनकी दूसरी पेशकश उड़िया गीत पर आधारित अभिनय था। कवि वनमाली दास की रचना ‘कालि काहिं कि न आएला श्याम नागर’ में नायिका राधा के भावों को दर्शाया। यह राग यमन और एकताली ताल में निबद्ध था। इसमें छंद ‘छम-छम-छम-कित-छम’ का प्रयोग मोहक था। वहीं राधा को अभिसारिका और खंडिता नायिका के रूप में चित्रण मनोरम था। नाराज राधा को मनाते हुए कृष्ण की मनोदशा को नृत्यांगना कविता ने जयदेव के गीत गोविंद के अंश ‘प्रिय चारूशीले त्वमसि मम् भूषण’ के जरिए दर्शाया। जिसने प्रस्तुति का सुंदर संयोजन किया।

लेकिन, यहां कीर्तन ‘श्री कृष्ण गोविंद’ का प्रयोग किया, जो राधा-कृष्ण के भावों से मेल खाता हुआ नजर नहीं आया। यह उचित होता कि कृष्ण के प्रणय की स्वीकारोक्ति के साथ ही कविता इस प्रस्तुति को विराम देतीं। राग मालिका और ताल मालिका में नृत्यांगना कविता द्विवेदी की अगली पेशकश थी। यह रमेश मंगराज की रचना पर आधारित थी। यह नृत्य रचना सती वृंदावती थी। इस प्रस्तुति में जलंधर और उसकी महासती पत्नी तुलसी की कहानी को दर्शाया गया। पौराणिक कथा पर आधारित नृत्य में विष्णु तुलसी का शील हरण करते हैं ताकि भगवान शिव युद्ध में जलंधर को परास्त कर सकें। इधर तुलसी को विष्णु पर संदेह होता है और वह उन्हें शिला यानि शालिग्राम बनने का शाप देती है और उधर जलंधर मृत्यु को प्राप्त होता है। लेकिन, भगवान विष्णु तुलसी को महासतीत्व, पवित्रता और उसे सदा मस्तक पर धारण करने का वरदान देते हैं।

कविता की यह प्रस्तुति भावभीनी थी। अभिनय में भी सरलता और सहजता दिखी। हालांकि हर पल पात्र के अनुसार भावों को बदलने का अंदाज काफी कठिन होता है पर लगातार रियाज से इसे वे सरलता से कर पाईं। गौरतलब है कि इस नृत्य रचना को वह कई समारोहों में पेश कर चुकीं हैं और इस प्रस्तुति को हर जगह सराहा गया है। कविता के साथ संगत कलाकारों में गायक सुरेश कुमार सेठी, मरदल पर रामचंद्र बेहरा, बांसुरी पर रजत प्रसन्ना, सितार पर यार मोहम्मद और वायालिन पर अग्निमित्र बेहरा शामिल थे।

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