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सत्रीय नृत्य में आती है पूर्वोत्तर की सुगंध

सत्रीय नृत्य गुरु जतिन गोस्वामी ने कहा कि सत्रीय नृत्य को इक्कीसवीं सदी के आरंभ में बतौर शास्त्रीय नृत्य परंपरा मान्यता प्रदान की गई। माना जाता है कि इस नृत्य की शुरुआत 15वीं शताब्दी में वैष्णव संप्रदाय के संत श्रीमंत शंकर देव ने की थी।

Author नई दिल्ली | Published on: August 30, 2019 5:37 AM
गुरु जतीन दास

शशिप्रभा तिवारी

पूर्वोत्तर सांस्कृतिक सौंदर्य में भी अनूठा है। ऐसा ही अनोखा है असम का सत्रीय नृत्य। इस नृत्य को अभी हाल ही में संगीत नाटक अकादमी की ओर से शास्त्रीय नृत्य की एक और शैली के रूप में मान्यता मिली है। अब इसे कलाकार विभिन्न मंचों पर लुभावने अंदाज में पेश करते हैं। इसी संदर्भ में सत्रीय बैठक का आयोजन किया गया। पहले दो दिवसीय कार्यशाला में गुरु जतीन दास ने सत्रीय नृत्य की तकनीकी पक्ष से परिचित करवाया। पद संचालन, स्थान एवं स्थिति, हस्तकों के बारे में बताया। कथक नृत्य की तरह ही सत्रीय में भी कलाकार जब मंच पर प्रवेश करता है तो उसे स्थान कहते हैं और जब वह सम पर आता है तो उसे स्थिति कहते हैं।

सत्रीय नृत्य नवधा भक्ति की तरह है इसमें नामघर में गुरु के आसन के समक्ष शिष्य नाम प्रसंग का वर्णन व गायन करता है। समारोह के दौरान मीनाक्षी मेदी और अन्य प्रशिक्षुओं ने सत्रीय नृत्य की तकनीकी बारीकियों में चाली और ओजा पाली पेश किया। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में सत्र और असम के सत्रीय नृत्य पर चर्चा की गई। सत्रीय नृत्यांगना मीनाक्षी मेदी ने सत्रीय नृत्य की बारीकियों की चर्चा की। इसके अलावा, गुरु जतिन गोस्वामी, ओडिशी नृत्यांगना शेरॉन लॉवेन, कथक नृत्यांगना निशा महाजन, असम के देबाशीष और गीतार्थ दर्शन बरुआ ने सत्रीय नृत्य के स्थितियों पर चर्चा की।

सत्रीय नृत्य गुरु जतिन गोस्वामी ने कहा कि सत्रीय नृत्य को इक्कीसवीं सदी के आरंभ में बतौर शास्त्रीय नृत्य परंपरा मान्यता प्रदान की गई। माना जाता है कि इस नृत्य की शुरुआत 15वीं शताब्दी में वैष्णव संप्रदाय के संत श्रीमंत शंकर देव ने की थी। जबकि अंकीय नाट की शुरुआत श्रीमंत शंकर देव के शिष्य श्रीमंत माधवदेव ने की। एक शरण धर्म यानि सत्र के प्रांगण में सत्रीय नृत्य को सत्र में रहने वाले ब्रह्मचारी शिष्य करते थे। वे सहज रूप में नाट्यशास्त्र, अभिनय दर्पण और संगीत रत्नाकार जैसे शास्त्रों के मार्ग का अनुसरण अपने नृत्य और नाट्य में करते थे।

इस परिचर्चा में ओडिशी नृत्यांगना शेरॉन लॉवेन ने कहा कि इसे स्कूलों और मंदिरों में प्रस्तुत कर लोकप्रिय बनाया जा सकता है। कथक नृत्यांगना निशा महाजन ने कहा कि यह नृत्य सत्र के गर्भ गृह से निकलकर मंच तक आया है। इसे कलाकारों को तय करना है कि वह इसे किस रूप में दर्शकों के सामने रखना चाहते हैं। इस दौरान देबाशीष मोहंता ने कहा कि नामकीर्तन और भावना के प्रति लोगों में जागरूकता है, पर इसे और लोकप्रिय बनाने की जरूरत है। जबकि गीतार्थ दर्शन ने कहा कि सत्रीय नृत्य की परंपरा को महानगरों में पोषित करने की जरूरत है।

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