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कविता: यह कैसा दौर है

पढ़िए, सांत्वना श्रीकांत की कविता।

प्रतीकात्मक तस्वीर। (Illustration by C R Sasikumar)

सांत्वना श्रीकांत

चलो विस्थापित हो जाएं कहीं
दिखावटी मुखौटों से दूर,
दम घुटता है यहां
विचारों की अशुद्धता में-
यह महामारी का दौर है।
जब टूट रही थीं सांसें
घिनौनी मानसिकता का ही
वजन है अब वक्त पर-
यह महामारी का दौर है।
सरवाइवल आॅफ फिटेस्ट के सिद्धांत को
परास्त करने के प्रयास में है
हर बार की तरह
पतनशील विचारधारा-
यह महामारी का दौर है।
मंदिर और मस्जिद,
गुरद्वारे तथा गिरजाघर
आइसोलेशन में हैं
और क्वॉरंटाइन में चले गए हैं
सभी के अपने-अपने आराध्य,
यह कैसा दौर है?
अपने खेतों से दूर
सो गए हैं देश के अन्नदाता
नंगे पांव चल पड़े कामगार,
अश्रुधारा बहा रहे असहाय।
बिलख रहे नौनिहाल
और भूखके बोझ से
द्रवित है वसुंधरा,
लुप्त हो रही मानवता
युद्धरत है व्यवस्था उनके लिए
जो या तो भूख से मरेंगे
या फिर वैश्विक साजिश से-
यह महामारी का दौर है।

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