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संगीत : स्वर-संध्या में सुर और संतूर का मेल

शास्त्रीय संगीत में गहरी पैठ के अलावा राहुल ने अपनी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय फ्यूजन और फिल्म संगीत में भी दिया है।

Author नई दिल्ली | April 21, 2016 11:40 PM
राग रागेश्री की अलाप में संतूर की तारों में डूबे राहुल शर्मा।

संगीत नाटक अकादमी ने प्रात: कालीन रागों की ‘स्वर-प्रभात’ शृंखला के प्रति संगीत-रसिकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया से उत्साहित हो कर सायंकालीन रागों की एक नई शृंखला ‘स्वर-संध्या’ का शुभारंभ पिछले सप्ताह मेघदूत परिसर में किया। स्वर संध्या का शुभारंभ दरभंगा घराने के युगल-गायक नीलेश कुमार मल्लिक व नीकेश कुमार मल्लिक के ध्रुपद गायन से हुआ। पं. रामचतुर मल्लिक जैसे विद्वान गायक के वंशज नीलेश और नीकेश को ध्रुपद गायन की तालीम अपने पितामह स्व. चंद्रकुमार मल्लिक, पिता पं. नवल किशोर मिश्र और चाचा पं. उदय कुमार मल्लिक से मिली। इस शाम इनका पखावज पर साथ देने के लिए कुदऊ सिंह घराने के राजकुमार दास और सारंगी पर संगत के लिए दिल्ली घराने के रऊफ मोहम्मद थे।

ध्रुपद गायन का शुभारंभ मल्लिक बंधुओं ने राग भिन्न षड्ज से किया और इस सायंकालीन राग की ध्रुपद सम्मत आलापचारी की। चौताल में निबद्ध ध्रुपद में स्थाई अंतरा भरने के बाद उन्होंने दुगुन, तिगुन, चौगुन आदि का काम बोलबांट सहित किया। इस दौर में लय पर तो उनकी पकड़ बनी रही लेकिन तिहाई लेकर सम पर आने के जोश में सुर का होश अक्सर जाता रहा। मुख्य राग के बाद उन्होंने राग अड़ाना में द्रुत सूलताल की बंदिश ‘शम्भू हर हर रे…’ भी उसी जोशोखरोश से गाई। मुख्य राग के बाद उन्हें जो विराम मिला था उसमें रुककर यदि वे उतरे हुए तानपुरे मिला लेते तो शायद हालात बेहतर हो जाते लेकिन सुर से उतरे तानपुरों की ओर उनका ध्यान तक न जाना सुधी श्रोताओं को कुछ अजीब सा लगा।

स्वर संध्या के दूसरे कलाकार थे संगीत नाटक अकादमी के उस्ताद बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार प्राप्त कर चुके युवा संतूरवादक राहुल शर्मा। पं. शिव कुमार शर्मा के सुपुत्र और शिष्य राहुल ने अपने पितामह पं. उमा दत्त शर्मा से संगीत की शुरुआती तालीम के बाद अपने पिता से संतूर वादन में मार्गदर्शन पाया। शास्त्रीय संगीत में गहरी पैठ के अलावा राहुल ने अपनी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय फ्यूजन और फिल्म संगीत में भी दिया है। डीप फारेस्ट ग्रुप के साथ एलेक्ट्रानिका में उनके फ्यूजन के प्रयोग और ‘मुझसे दोस्ती करोगे’ जैसी फिल्मों में उनके संगीत निर्देशन के भी काफी चर्चे रहे हैं। उनके साथ इस शाम तबले पर पं. अनोखे लाल के नाती और पं. छन्नू लाल मिश्र के सुपुत्र होनहार तबला वादक राम कुमार मिश्र थे।

शाम की सुमधुर राग रागेश्री की आलाप में मंद्र षड्ज तक विस्तार के बाद लय कायम करके राहुल ने जोड़ के दौरान विविध छंदों में काम करते हुए झाले तक पहुंचाया। इस तरह सुविस्तृत आलाप-जोड़-झाले से राग का सुरीला वातावरण बनाकर उन्होंने सात मात्रा के रूपक ताल में गत शुरू की तो रामकुमार मिश्र की जोरदार उठान ने उनकी इतनी लंबी खामोशी का जोशीला जवाब दिया। राहुल ने बेहद इत्मीनान से इस गत के माध्यम से राग की परतें खोली और विविध तानों से सजाकर तीनताल में द्रुत गत बजाई। राहुल जितने सुरीले हैं उतने ही लयदार भी लेकिन रामकुमार के पास भी संतूर की हर बारीकी का सटीक प्रत्युत्तर था। मुख्य राग के बाद एक मीठी धुन से उन्होंने अपना संतूर वादन और ‘स्वर संध्या’ शृंखला का शुभारंभ संपन्न किया।

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