संगम तीरे, जहां गंगा-यमुना और अदृश्य सरस्वती का मिलन होता है, वहीं शब्दों का भी एक अद्भुत संगम सदियों से बहता आया है। इलाहाबाद सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि एक जीवित साहित्यिक व्यवहार है—जहां बातचीत भी कविता की तरह होती है, बहसें उपन्यास की भूमिका बन जाती हैं और चाय की मेज पर बैठे लोग इतिहास रच देते हैं। यहां लेखक पैदा नहीं होते, वे वातावरण से गढ़े जाते हैं। गलियों में तर्क है, चौक में व्यंग्य है, विश्वविद्यालय के बरामदों में स्वप्न हैं और सिविल लाइंस की मेजों पर शब्दों का ताप। यह वही शहर है जहां लेखनी पेशा नहीं, स्वभाव है; जहां मतभेद भी भाषा को समृद्ध करते हैं; और जहां हर पीढ़ी अपने पूर्वजों की परंपरा से संवाद करती हुई आगे बढ़ती है। ‘संगम तीरे’ प्रस्तुत है उसी शहर की कहानी — उस इलाहाबाद की, जो नाम बदलने पर भी अपनी साहित्यिक आत्मा नहीं बदलता।

प्रयागराज: जहां शब्दों का भी संगम होता है

सुबह का समय है। सिविल लाइंस की सड़कें अभी पूरी तरह जागी नहीं हैं। लेकिन एक जगह है जहां हमेशा हलचल रही —इंडियन कॉफी हाउस। यहीं कभी चाय के प्यालों के बीच कविता जन्म लेती थी, कहानी की रूपरेखा बनती थी और बहसों से उपन्यासों के बीज तैयार होते थे। जरा कल्पना कीजिए — एक मेज पर हरिवंश राय बच्चन बैठे हैं, दूसरी तरफ सूर्यकांत त्रिपाठी निराला अपनी ही धुन में कुछ बुदबुदा रहे हैं। पास ही कहीं महादेवी वर्मा गंभीर चेहरे के साथ सुन रही हैं। और थोड़ी दूरी पर युवा धर्मवीर भारती नोट्स बना रहे हैं। यह कोई काल्पनिक दृश्य नहीं, बल्कि उस दौर की सच्चाई है जब इलाहाबाद हिंदी साहित्य का धड़कता हुआ दिल था।

मधुशाला का वह किराए का कमरा

सबसे चर्चित किस्सा बच्चन जी से जुड़ा है। जब वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ते और बाद में पढ़ाते थे, तब उन्होंने विश्वविद्यालय के पास एक साधारण से किराए के कमरे में बैठकर मधुशाला लिखी। बाहर साहित्यिक बहसों की आवाजें, अंदर शब्दों का सागर। ‘मधुशाला’ 1935 में प्रकाशित हुई और देखते-देखते पूरे देश में गूंजने लगी। बच्चन जी बाद में अपने साथियों को पत्रों में लिखते थे कि इलाहाबाद को साहित्य का कारखाना कहना गलत नहीं होगा। यहां लोग हालात से समझौता कर लें, लेकिन शहर को भूल नहीं पाते।

निराला की निराली चाल

दारागंज के मल्लाहन टोले में रहने वाले निराला जी अकसर यमुना किनारे टहलते दिख जाते थे। वे अलग मिजाज के थे — कभी फक्कड़, कभी विद्रोही। आर्थिक तंगी झेली, सामाजिक विरोध सहा, लेकिन कविता नहीं छोड़ी। लोग कहते हैं, वे कभी-कभी अचानक किसी सभा में पहुंच जाते और अपनी कविता सुनाकर सबको चुप कर देते। उनका व्यक्तित्व ही इलाहाबाद की पहचान बन गया। इसलिए उन्हें ‘महाप्राण’ कहा गया।

महादेवी का खुला दरवाजा

अशोकनगर में महादेवी वर्मा का घर साहित्यकारों का अड्डा था। वहां सिर्फ चाय नहीं मिलती थी, विचार भी मिलते थे। वे छायावाद की प्रमुख स्तंभ थीं, लेकिन साथ ही एक सख्त अनुशासन वाली शिक्षिका भी। उनके घर में बैठकर कई नई कविताओं और कहानियों पर चर्चा होती थी। वे सुनती ज्यादा थीं, बोलती कम। लेकिन जब बोलती थीं तो शब्द सीधे दिल में उतरते थे।

सरस्वती और द्विवेदी जी की सख्ती

अगर इलाहाबाद को हिंदी साहित्य का केंद्र कहा जाता है, तो उसमें बड़ा हाथ है महावीर प्रसाद द्विवेदी का। वे प्रसिद्ध पत्रिका सरस्वती के संपादक थे। द्विवेदी जी की खासियत थी अनुशासन। वे लेखकों की रचनाएं वापस कर देते थे अगर भाषा या विचार कमजोर हों। लेकिन यही सख्ती आगे चलकर हिंदी को मजबूत बनाती गई। उनके संपादन में ‘सरस्वती’ ने हिंदी को नई दिशा दी। कहा जाता है, कई बड़े लेखक पहली बार अपनी रचना लेकर उनके पास गए और डांट खाकर लौटे। लेकिन उसी डांट ने उन्हें बेहतर लेखक बना दिया।

कॉफी हाउस की बहसें

सिविल लाइंस का इंडियन कॉफी हाउस सिर्फ खाने-पीने की जगह नहीं था। वहां घंटे भर की बहस आम बात थी। साहित्य, राजनीति, समाज — हर विषय पर चर्चा होती थी। इन्हीं बहसों के बीच धर्मवीर भारती ने अपने उपन्यास गुनाहों का देवता की रूपरेखा तैयार की। यह उपन्यास इलाहाबाद की गलियों और विश्वविद्यालय के माहौल से निकला। आज भी युवा इसे पढ़ते हैं और अपने कॉलेज जीवन की याद करते हैं। भारती कहा करते थे कि कैलाश गौतम की कविता इसलिए अच्छी लगती है क्योंकि वे शब्दों में शहर की तस्वीर उतार देते हैं।

“इलाहाबाद मेरा मायका है”

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले बेल्जियम मूल के विद्वान कामिल बुल्के कहा करते थे — “इलाहाबाद मेरा मायका है।” यह बात वे मजाक में नहीं कहते थे। उन्होंने रामकथा पर गहरा शोध किया और हिंदी को अपना लिया। उनके लिए इलाहाबाद सिर्फ नौकरी की जगह नहीं था, भावनाओं का घर था।

उर्दू की खुशबू

इलाहाबाद की पहचान गंगा-जमुनी तहजीब से है। यहां हिंदी और उर्दू साथ-साथ फली-फूलीं। फिराक गोरखपुरी की गजलें यहां की हवा में घुली रहीं। उनकी किताब ‘गुले-नगमा’ ने उन्हें बड़ा नाम दिया। वहीं अकबर इलाहाबादी ने व्यंग्य के जरिए समाज और अंग्रेजी प्रभाव पर तीखे तंज कसे।

कहानी का शहर

इलाहाबाद सिर्फ कविता का नहीं, कहानी का भी शहर रहा।

अमरकांत की कहानियों में आम आदमी की पीड़ा दिखती है।
दुष्यंत कुमार ने गजल को नया तेवर दिया।
कमलेश्वर ने कहानी और पत्रकारिता दोनों में पहचान बनाई।

बाद में रवींद्र कालिया और उनकी पत्नी जानी-मानी लेखिका ममता कालिया ने भी इस शहर की साहित्यिक परंपरा को आगे बढ़ाया। वरिष्ठ साहित्यकार और भारतीय ज्ञानपीठ के पूर्व निदेशक रवींद्र कालिया साठोत्तरी पीढ़ी के प्रमुख गद्यकार थे। कालिया ने ‘नया ज्ञानोदय’ और ‘वागर्थ’ जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया और ‘ग़ालिब छुटी शराब’, ‘नौ साल छोटी पत्नी’, ‘एबीसीडी’ व ‘कामरेड मोनालिजा’ जैसी चर्चित कृतियां लिखीं। उन्हें प्रेमचंद स्मृति सम्मान, पदुमलाल बक्शी सम्मान और लोहिया सम्मान सहित कई पुरस्कार मिले।

कैलाश गौतम की याद

कैलाश गौतम जब मुंबई गए तो इलाहाबाद को याद करते हुए लिखा — “जब से बंबई आया हूं मैं, तब से हुई नींद हराम, चौपाटी तुझसे भली लोकनाथ की शाम।” यह पंक्ति बताती है कि इलाहाबाद सिर्फ जगह नहीं, एक एहसास है। अमावस्या का मेला प्रयागराज के संगम क्षेत्र में लगने वाला एक प्रमुख धार्मिक आयोजन है, जहां श्रद्धालु पवित्र स्नान और पूजा-अर्चना के लिए बड़ी संख्या में जुटते हैं। इस मेले की लोक-आस्था और ग्रामीण संवेदना को कवि कैलाश गौतम ने अपनी प्रसिद्ध कविता ‘अमवसा का मेला’ में बेहद जीवंत और मार्मिक ढंग से चित्रित किया है। उन्होंने मेले के दृश्य, जन-जीवन और आस्था को सरल, देशज भाषा में उतारा। उनकी यह रचना हिंदी कविता में लोक-संवेदना का महत्वपूर्ण उदाहरण मानी जाती है।

पुरानी जड़ें

इलाहाबाद की साहित्यिक जड़ें और भी पुरानी हैं। भक्ति काल के संत मलूक दास का संबंध भी इसी क्षेत्र से माना जाता है। आधुनिक हिंदी की शुरुआत में भारतेंदु हरिश्चंद्र और बाद में बालकृष्ण भट्ट जैसे लोगों ने खड़ी बोली को आगे बढ़ाया।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय का असर

इलाहाबाद विश्वविद्यालय को कभी ‘पूर्व का ऑक्सफोर्ड’ कहा जाता था। यहां पढ़ने वाले छात्र आगे चलकर बड़े लेखक बने। विश्वविद्यालय का माहौल ही ऐसा था कि हर छात्र कुछ लिखना चाहता था।

बदलता समय, वही आत्मा

आज शहर का नाम बदलकर प्रयागराज हो गया है। सड़कों का नक्शा बदला है। कई पुरानी इमारतें नहीं रहीं। लेकिन शब्दों की परंपरा खत्म नहीं हुई। कभी जहाज से इस शहर को देखें तो लगता है जैसे गंगा और यमुना यज्ञोपवीत की तरह इसे धारण किए हुए हैं।

किसी ने ठीक ही लिखा — “याद तुम्हारी मेरे साथ ऐसे रहती है, जैसे किले से सटकर यमुना बहती है।”

लेखनी कभी थकती नहीं

बदलाव के इस दौर में सृजन भले कम दिखाई दे, पर जो लिखा जा रहा है वह गंभीर है। नई पीढ़ी फिर से अपने अतीत की ओर देख रही है। इलाहाबाद यानी प्रयागराज अपने अमरूदों के लिए जितना मशहूर है, उतना ही साहित्य के लिए भी।

यह शहर सच में नक्षत्रशाला है — जहां प्रतिभाएं कभी खत्म नहीं होंगी।

आज भी अगर सिविल लाइंस के कॉफी हाउस में बैठें तो लगता है कि किसी कोने में बच्चन जी मुस्कुरा रहे हैं, निराला जी यमुना किनारे टहल रहे हैं, महादेवी जी किसी नई कविता पर सोच रही हैं और द्विवेदी जी लाल पेंसिल से किसी पांडुलिपि को सुधार रहे हैं। और शहर धीरे से कहता है — अच्छा लिखो, दिल में उतर जाओ। लेखनी कभी थकती नहीं, रुकती नहीं।

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कहते हैं कि अंग्रेजों के जमाने में प्रयागराज वालों की कुछ खास आदतें मशहूर थीं। यूं तो स्वतंत्रता आंदोलन के पहले से ही प्रयागराज (इलाहाबाद) राजनीति का केंद्र रहा है। परन्तु खाना-खिलाना व पहलवानी की इलाहाबादी परंपरा अपने आप में एक बेमिसाल आदत थी, जो यहां की एक विशिष्टता मानी जाती है। पुराने लोग अपने समय को याद करते हुए अपनी बुजुर्गियत भूलकर रोमानियत का अहसास करने लगते हैं। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक