प्रयागराज सिर्फ नक्शे पर दर्ज एक शहर नहीं, बल्कि तहजीब का वह दरिया है जिसकी धार में रंग, राग और रूह की मिठास एक साथ बहती है। फाल्गुन की हवा जब लोकनाथ और चौक की गलियों से होकर गुजरती थी, तो उसमें टेसू के फूलों की भीनी-भीनी खुशबू, ढोलक की थाप और “होली है!” की गूंज शामिल हो जाती थी। यह वह दौर था जब होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि दिलों की दस्तक, अदब की अदायगी और इल्म-ओ-अदब की महफिलों का जश्न हुआ करती थी।
बड़े-बड़े कड़ाहों और ड्रमों में टेसू के फूल भिगोए जाते थे
पुराने शहर का दिल यानी लोकनाथ। यहां होली का मतलब था मिलन, मुस्कान और मोहब्बत। साठ के दशक में लोकनाथ चौराहे के पास पूर्व विधायक कल्याण चंद्र मोहिले ‘छुन्नन गुरु’ का तख्त सजता था। रात भर बड़े-बड़े कड़ाहों और ड्रमों में टेसू के फूल भिगोए जाते, ताकि सुबह तक पानी में गाढ़ा लाल रंग उतर आए। न कोई रासायनिक रंग, न किसी से रंजिश; बस अपनापन और आदाब। सुबह-सुबह होलियारों की टोली घरों के दरवाजे पर दस्तक देती—“भइया, होली है!”—और भीतर से ठहाकों की बरसात शुरू हो जाती। ढोलक, मंजीरा, बीन—सब मिलकर एक ऐसी समा बांधते कि गली-कूचे रंगों से सराबोर हो उठते।
कहते हैं, इसी तख्त पर कभी-कभी पंडित जवाहर लाल नेहरू भी आ जाया करते थे। सादगी और शराफत से भरी उनकी मौजूदगी होली की रौनक बढ़ा देती। वहीं कवि-हृदय डॉ. हरिवंश राय बच्चन का आना तो जैसे फागुन की बयार को और मदमस्त कर देता। बच्चन जी की आवाज में जब फाग गूंजता, तो रंगों से भी ज्यादा शब्दों की पिचकारी चलती। भांग सिलौटी पर पीसी जाती, ठंडई में घुलती, और तख्त पर बैठे बुज़ुर्गों के चरण छूकर आशीर्वाद लेने के बाद रंग खेलने का सिलसिला शुरू होता। होलिका दहन की रात से ही गुलाल उड़ने लगता, और अगले दो दिनों तक लोकनाथ-चौक की गलियां सतरंगी चादर ओढ़े रहतीं।
महादेवी वर्मा के घर में जुटते थे निराला, फिराक गोरखपुरी, धर्मवीर
यह वह प्रयाग था जहां होली सिर्फ शोर नहीं, शायरी भी थी। अशोक नगर स्थित आवास पर महादेवी वर्मा की होली किसी राग-रंग की महफिल से कम न होती। वे सबकी “दीदी” थीं—साहित्यकारों की संरक्षक, स्नेह की मूर्ति। रंग खेलने से पहले वे राई-नोन से सबकी नजर उतारतीं, जैसे होली के हुड़दंग में भी संस्कार की एक महीन डोर बंधी हो। वहां सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत, फिराक गोरखपुरी, धर्मवीर भारती, उपेन्द्रनाथ अश्क, अमरकांत, राही मासूम रजा, अमृत राय जैसे नामी कवि जुटते। ढोलक की थाप पर काव्यपाठ होता, गीत-गजलों का सिलसिला चलता, और ठहाकों के बीच साहित्य की गंभीर बातें भी रंगों की तरह उड़तीं। निराला की अल्हड़ता, बच्चन की मधुरता और महादेवी की करुणा — तीनों मिलकर एक ऐसी फाग रचते, जिसमें शब्द भी भीगते और श्रोता भी।

चौक की गलियों में होली का मिजाज अलग था। वहां अपनापन ठेठ अंदाज में छलकता। गले मिलते, गुलाल लगाते, और कभी-कभी शरारत में कपड़े खींचकर उछाल देते। हालांकि पुरनिये बताते हैं कि कपड़ा-फाड़ होली का चलन बाद के वर्षों में बढ़ा; पहले ऐसा नहीं था। पहले तो कपड़ों से ज्यादा दिलों के फासले फाड़े जाते थे। कोई किसी से शिकवा-शिकायत हो, तो रंग लगाकर मिटा दी जाती। बिजली के तारों पर टंगे रंगीन कपड़े आज की पहचान हैं, पर तब की पहचान थी — गले मिलकर “भइया, बुरा न मानो होली है” कहना और सचमुच बुरा न मानना।
दारागंज में होली का एक अनोखा रंग था — दमकल युद्ध। पं. धर्मराज पांडेय और नटेश शास्त्री ने इसकी शुरुआत की। किले में आग बुझाने वाली दमकल को बैलगाड़ी से लाकर रंगों की बारिश की जाती। चौधरी महादेव प्रसाद, राकेट साबुन वाले, बाबू राम रस्तोगी, पं. रामअवतार पांडेय, बचई महाराज, भोलानाथ चकहा जैसे लोगों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। यह रंगों की जंग नहीं, जश्न था — जहां पानी की फुहारों में दोस्ती की ठंडक छिपी होती।
कटरा मोहल्ले की होली भी कम दिलचस्प न थी। 1930 के दशक में अंग्रेजी हुकूमत के साये में बैलगाड़ी पर होलियारों की बारात निकलती। बड़े-बड़े ड्रमों में रंग घोला जाता, घोड़े पर दूल्हा बैठता और पीतल की पिचकारियों से रंगों की बौछार होती। 1970 तक यह बारात निकलती रही। रास्ते भर स्वागत-अभिनंदन, गले मिलना, और एकता का पैगाम — होली वहां मजहब और जाति की दीवारें तोड़ देती।
इलाहाबाद की होली में राजनीति, साहित्य और लोकजीवन एक ही रंग में रच-बस जाते थे। विश्वविद्यालय की गलियों से लेकर सिविल लाइंस के कॉफी हाउस तक फाग की चर्चा चलती। छात्र-छात्राएं, अध्यापक, कवि, नेता — सब एक ही कतार में खड़े। कोई बड़ा-छोटा नहीं, बस रंग का रिश्ता। नेहरू जी का सादा कुरता, बच्चन जी की खिलखिलाहट, निराला की बेबाकी और महादेवी की ममता — इन सबने मिलकर होली को एक सांस्कृतिक महाकाव्य बना दिया।

आज जब लोकनाथ और चौक की होली में कपड़े तारों पर टंगे दिखते हैं, तो पुराने लोग मुस्कुरा कर कहते हैं — “हमारी होली में कपड़े नहीं, अहंकार फटते थे।” तब टेसू का रंग गाढ़ा होता था, पर दिलों में नफरत की कोई मिलावट नहीं। भांग की ठंडई में मस्ती थी, मगर मर्यादा भी। होली के बहाने चरण स्पर्श, आशीर्वाद और अदब का लेन-देन होता। कोई घर ऐसा नहीं जहां टोली न पहुंचे; कोई दिल ऐसा नहीं जो रंग से अछूता रहे।
इलाहाबाद की ठेठ होली दरअसल एक रिवायत थी — जिसमें फाग सिर्फ गाया नहीं जाता, जिया जाता था। लोकनाथ के तख्त से लेकर महादेवी के आंगन तक, चौक की गलियों से दारागंज की दमकल तक — हर जगह एक ही पैगाम था: मोहब्बत का रंग सबसे गाढ़ा है। और जब बच्चन जी की आवाज में फाग उठता या निराला की मुस्कान में शरारत झलकती, तो लगता जैसे पूरा शहर एक विशाल कवि-हृदय बन गया हो।
आज भी अगर फाल्गुन की शाम को लोकनाथ की ओर निकल जाइए, तो हवा में कहीं-न-कहीं उस पुराने दौर की आहट मिल जाएगी। ढोलक की थाप में नेहरू की सादगी, गुलाल की उड़ान में बच्चन की कविता, और हर गले मिलने में महादेवी की ममता महसूस होगी। यही इलाहाबाद है — जहां होली रंगों से नहीं, रिश्तों से खेली जाती थी; जहां फाग में फिक्र भी थी और फुर्सत भी; और जहां हर साल फाल्गुन यह याद दिलाता है कि मोहब्बत का रंग कभी फीका नहीं पड़ता।
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संगम तीरे, जहां गंगा-यमुना और अदृश्य सरस्वती का मिलन होता है, वहीं शब्दों का भी एक अद्भुत संगम सदियों से बहता आया है। इलाहाबाद सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि एक जीवित साहित्यिक व्यवहार है—जहां बातचीत भी कविता की तरह होती है, बहसें उपन्यास की भूमिका बन जाती हैं और चाय की मेज पर बैठे लोग इतिहास रच देते हैं। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
