मीरगंज की रात किसी घड़ी की सुई देखकर नहीं उतरती। वह धीरे-धीरे आती है। पहले चौक की दुकानों पर रोशनी गाढ़ी होती है। फिर सर्राफा बाजार के शटर आधे झुकने लगते हैं। खोया मंडी में दिनभर की आवाजाही के बाद तौल-कांटे समेटे जाते हैं। कहीं आखिरी गिलौरियां बन रही होती हैं, कहीं दुकानदार दिनभर की कमाई गिन रहा होता है। घी, चांदी, तंबाकू, पान और मसालों की मिली-जुली गंध पुरानी गलियों में ऐसे तैरती रहती है, जैसे किसी पुराने संदूक से बीते दिनों की महक बाहर निकल आई हो।
शाम का धुंधलका गहराता है तो हवेलीनुमा मकानों की दीवारें और बूढ़ी दिखाई देने लगती हैं। लकड़ी की चौखटों पर वक्त की उंगलियों के निशान साफ पढ़े जा सकते हैं। कहीं उखड़ा हुआ पलस्तर है, कहीं जालीदार खिड़कियाँ हैं, जिनके पीछे हलचल तो महसूस होती है, मगर चेहरों की पहचान नहीं हो पाती।
धीरे-धीरे गली का मिजाज बदलने लगता है। दिन की थकान उतरती है और रात अपनी जगह बनाने लगती है। किसी खिड़की के पीछे से हंसी का एक टुकड़ा बाहर आ गिरता है। किसी पुराने रेडियो से कोई भूला-बिसरा गीत हवा में घुल जाता है। ऊपर बालकनियों में कुछ परछाइयां दिखाई देने लगती हैं और नीचे गली से गुजरते लोगों के कदम अनायास धीमे पड़ जाते हैं।
ऐसा लगता है, मानो पुराना इलाहाबाद अपनी एक और कहानी सुनाने की तैयारी कर रहा हो।
और तभी शहर का वह हिस्सा जागता है, जिसके बारे में लोग दिन में कम और रात में ज्यादा सोचते हैं। ऊपर बालकनियों और खिड़कियों पर अक्सर जवान चेहरे दिखाई देते थे। काजल से सजी आंखें, संवरे हुए बाल और बनाव-सिंगार की पूरी सजधज के साथ वे राहगीरों को ऐसे देखतीं मानो हर गुजरता कदम उनके नसीब का कोई नया मोड़ लेकर आया हो। वहां आकर्षण भी एक हुनर था और रोजी-रोटी का जरिया भी।
निगाहों का पहरा और अंजान बने रहने की रवायत
उनकी नजर हर वक्त राहगीरों पर रहती है। कोई आंखों से इशारा करती है, कोई पल्लू संभालते हुए रेलिंग पर झुक जाती है, कोई बस खड़ी रहती है – जैसे इंतजार ही उसका पेशा हो। नीचे गली से गुजरते आदमी तेज कदमों से चलते हैं, मगर उनकी निगाहें अक्सर ऊपर उठ जाती हैं। यह एक अजीब-सा खेल था। देखने और न देखने का। पहचानने और अनजान बने रहने का। मानो यह शहर की एक रवायत बन गया हो। ऐसा लगता था कि इन पुरानी हवेलियों की दीवारें भी कोई पुराना राज अपने सीने में दबाए बैठी हैं।
यह मीरगंज है। प्रयागराज का वह मोहल्ला, जिसका नाम लेते ही पुराने शहर के लोगों की आंखों में एक अजीब-सी चमक उतर आती है। जैसे किसी ने अचानक यादों का कोई पुराना संदूक खोल दिया हो। चेहरे पर हल्की मुस्कान भी तैरती है और शब्दों में एक संकोच भी घुल जाता है। क्योंकि मीरगंज उन जगहों में से नहीं है, जिनके बारे में लोग बेझिझक बात करते हैं।
इस मोहल्ले की अपनी एक किस्म की तकदीर रही है। इसे हमेशा दो नजरों से देखा गया। एक नजर ने इसे बदनाम गलियों का नाम दिया, दूसरी ने इसे शहर की रौनक का हिस्सा माना। बरसों से ये दोनों कहानियां साथ-साथ चलती रही हैं। सच शायद इन्हीं के बीच कहीं अपनी जगह बनाए खड़ा है।
मीरगंज का जिक्र आते ही लोग अकसर किसी एक नतीजे पर पहुंच जाना चाहते हैं। कोई इसे सिर्फ देह के कारोबार की बस्ती मान लेता है। कोई इसे तवायफों, ठुमरी और बीती हुई महफिलों की आखिरी पनाहगाह बताने लगता है। लेकिन मीरगंज न तो सिर्फ उतना है और न ही केवल इतना।
दरअसल, यह उस शहर का एक ऐसा पन्ना है, जिसे पढ़ते समय जल्दबाजी नहीं की जा सकती। उस शहर का, जिसने अदालतों की बहसें सुनी हैं, विश्वविद्यालय की हलचल देखी है, राजनीति के उतार-चढ़ाव महसूस किए हैं और साहित्य की अनगिनत चर्चाओं को अपने भीतर संजोया है। मगर उसी शहर ने उन गलियों को भी हमेशा अपने साथ रखा, जिनका जिक्र खुले चौक में कम हुआ, लेकिन जिनकी मौजूदगी को कभी पूरी तरह नकारा भी नहीं जा सका। मीरगंज उन्हीं गलियों की सबसे चर्चित दास्तान है।
सुबह की आहट से रात की हलचल तक का गवाह
पुराने इलाहाबाद में चौक सिर्फ एक बाजार नहीं था। वह शहर की धड़कन था। सुबह की पहली आहट से लेकर रात की आखिरी हलचल तक शहर की रगों में जो कुछ बहता था, उसकी गूंज चौक तक जरूर पहुंचती थी। व्यापार की खबर हो, किसी नए अफसर की चर्चा हो, किसी बड़े मुकदमे की बात हो या किसी खानदान की उठापटक -सबकी आहट सबसे पहले यहीं सुनाई देती थी। चांदी के सौदागर, कपड़े के व्यापारी, हलवाइयों की दुकानें, पान की गुमटियां और पुराने मकानों की चौखटों पर बैठी निगाहें – सब मिलकर चौक को चौक बनाती थीं।
मीरगंज उसी चौक की एक ऐसी गली थी, जो शहर के जिस्म में छिपी किसी नस की तरह धड़कती रहती थी। दिन में वहां कारोबार का वही परिचित चेहरा दिखाई देता था, जिसे हर कोई देखता था। लेकिन शाम ढलते-ढलते जैसे उस गली का मिजाज बदलने लगता था। दुकानों की रौनक धीरे-धीरे दूसरी तरह की हलचल को जगह देने लगती थी और रात अपने साथ एक ऐसी दुनिया लेकर आती थी, जिसके बारे में लोग खुलकर कम, दबे स्वर में ज़्यादा बात करते थे।
पुराने शहर के लोग आज भी कहते हैं कि इलाहाबाद को समझना हो तो सिर्फ उसकी बड़ी इमारतों को मत देखिए। न अदालतें अकेले शहर को समझा सकती हैं, न विश्वविद्यालय और न ही सरकारी दफ्तर। शहर की असली कहानी उसकी गलियों में बसी होती है। उन लोगों में, जिनके नाम इतिहास की किताबों में नहीं लिखे जाते, लेकिन जिनके बिना किसी शहर का इतिहास पूरा भी नहीं होता।
मीरगंज ऐसी ही कहानियों का एक खुला हुआ पन्ना था। इस पन्ने पर सिर्फ बदनामी नहीं लिखी थी। इसमें संगीत भी था, इंतजार भी था, रौनक भी थी और उदासी भी। यही वजह है कि तवायफों की दुनिया को केवल एक नजर से समझना हमेशा मुश्किल रहा है। समाज ने उन्हें चाहा भी, उनसे दूरी भी बनाई। उनकी महफिलों में बैठकर दाद भी दी और सार्वजनिक जीवन में उनसे परहेज भी किया।
लेकिन इस विरोधाभास के बावजूद एक सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता। उत्तर भारत के संगीत और अदब की कई परंपराएं लंबे समय तक इन्हीं औरतों की बदौलत जिंदा रहीं। ठुमरी, दादरा, गजल और नृत्य की कई धाराएं उन्हीं कोठों से निकलकर दूर-दूर तक पहुंचीं। लखनऊ, बनारस और इलाहाबाद जैसे शहरों में तवायफ सिर्फ एक पेशे की पहचान नहीं थीं; वे उस सांस्कृतिक संसार का हिस्सा थीं, जहां सुर, शायरी, तहजीब और जिंदगी एक-दूसरे में घुली-मिली रहती थीं।
प्रयागराज के ‘संगम तीरे’ स्तंभ में अन्य फीचर लेखों को पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
लेकिन मीरगंज को सिर्फ़ सुरों की बस्ती समझ लेना भी भूल होगी और उसे केवल देह के बाजार तक सीमित कर देना भी। सच्चाई इन दोनों के बीच कहीं सांस लेती है। यहां हर कोठे से ठुमरी की तान नहीं उठती थी और न ही हर चौखट पर कोई जानकी बाई बैठी मिलती थी। मगर यह भी उतना ही सच है कि इन गलियों की पूरी दुनिया सिर्फ जिस्मानी सौदों की दुनिया नहीं थी।
यही मीरगंज का सबसे बड़ा विरोधाभास था। एक कमरे में कोई राग की तालीम ले रहा होता, तो दूसरे में जिंदगी अपनी सबसे सख्त शक्ल में खड़ी मिलती। कहीं हंसी की आवाजें थीं, कहीं लंबा सन्नाटा। कहीं शोहरत के ख्वाब पलते थे, तो कहीं गुमनामी उम्र भर का मुकद्दर बन जाती थी। एक ही गली में रौनक भी रहती थी और उदासी भी। और जब मीरगंज की बात चलती है तो एक नाम अपने आप हवा में तैरने लगता है – जानकी बाई इलाहाबादी।
पुराने संगीत प्रेमी उन्हें आज भी “छप्पन छुरी” के नाम से याद करते हैं। उनके बारे में जितनी बातें दस्तावेजों में दर्ज हैं, उतनी ही किस्सों और लोक स्मृतियों में भी बसी हुई हैं। कहा जाता है कि जवानी के दिनों में उन पर चाकू से हमला हुआ था और उसी घटना ने आगे चलकर उन्हें “छप्पन छुरी” का नाम दे दिया। इस कहानी में कितना इतिहास है और कितना लोकविश्वास, यह अलग बहस का विषय हो सकता है। मगर इसमें कोई दो राय नहीं कि अपने दौर में जानकी बाई का नाम उत्तर भारत की सबसे चर्चित गायिकाओं में लिया जाता था।
वह ऐसा समय था जब आवाज को दूर तक पहुंचाने के साधन बहुत कम थे। न रेडियो हर घर में था, न सिनेमा ने लोगों की कल्पना पर पूरी तरह कब्जा किया था। ऐसे दौर में किसी गायिका की आवाज का शहरों, कस्बों और रियासतों की सीमाएं पार कर जाना अपने आप में बड़ी बात थी।
ग्रामोफोन ने उस चमत्कार को संभव किया। मोम के रिकॉर्ड पर दर्ज एक आवाज पहली बार अपने गायक या गायिका से अलग होकर यात्रा करने लगी। और उस नई दुनिया के सबसे चमकदार नामों में जानकी बाई भी थीं।
पुराने अखबारों और संस्मरणों में उनके रिकॉर्डों की लोकप्रियता के कई उल्लेख मिलते हैं। कहा जाता है कि नए रिकॉर्ड आने की खबर भर से लोगों में उत्सुकता फैल जाती थी। यह वह दौर था जब सिर्फ अभिनेता ही नहीं, आवाजें भी सितारा बनती थीं।
लेकिन जानकी बाई की कहानी सिर्फ कामयाबी की कहानी नहीं है। वह उस समाज का आईना भी है, जो किसी स्त्री की कला पर मुग्ध हो सकता है, उसकी गायकी पर दाद दे सकता है, मगर उसके जीवन को उसी सम्मान से देखने में हिचकता है।
यही उलझन, यही दोहरापन और यही विरोधाभास मीरगंज की पूरी कहानी में बार-बार दिखाई देता है। शायद इसी वजह से मीरगंज को सिर्फ इतिहास की घटना की तरह नहीं पढ़ा जा सकता। उसे इंसानी जिंदगियों की तरह पढ़ना पड़ता है – जहां सच कभी एक रंग का नहीं होता।
इतिहास उन्हीं को याद रखता है जिनके हिस्से में शोहरत आती है
मगर मीरगंज की कहानी सिर्फ जानकी बाई की कहानी नहीं है। इतिहास अक्सर उन्हीं चेहरों को याद रखता है जिनके हिस्से में शोहरत आती है, लेकिन इन गलियों में ऐसी अनगिनत औरतें भी रहीं जिनके नाम किसी दस्तावेज में दर्ज नहीं हुए। न उनकी तस्वीरें बचीं, न उनके किस्से। वे बस शहर की धुंधली स्मृतियों में कहीं बसी रह गईं। शायद मीरगंज की असली कहानी उन्हीं गुमनाम जिंदगियों में छिपी है, जिनके बिना इस मोहल्ले का इतिहास अधूरा है।
कहते हैं, पुराने इलाहाबाद में कुछ लोग ऐसे भी थे जो दिन के उजाले में इस इलाके का नाम लेने से हिचकते थे, लेकिन रात ढलते ही उनके कदम अनायास इसी तरफ मुड़ जाते थे। शहर की जबान कुछ और कहती थी और उसके दिल की ख्वाहिशें कुछ और। दोनों के बीच जो फासला था, वह शायद सबसे साफ मीरगंज की गलियों में दिखाई देता था।
यह सिर्फ इलाहाबाद की कहानी नहीं थी। लगभग हर बड़े शहर में ऐसी कोई जगह रही है जिसे समाज ने पूरी तरह अपनाया भी नहीं और पूरी तरह ठुकराया भी नहीं। मीरगंज भी उसी मानवीय और सामाजिक विरोधाभास का हिस्सा था, मगर उसकी पहचान में संगीत, अदब और महफिलों की एक अलग परंपरा भी शामिल थी। कोलकाता का सोनागाछी हो, मुंबई का कमाठीपुरा हो या दिल्ली की जी.बी. रोड – हर पुराने शहर ऐसी जगह की मौजूदगी मिल जाएगी।
लेकिन मीरगंज का रंग कुछ और था। उसकी पहचान में सिर्फ देह का बाजार शामिल नहीं था। उसकी परछाइयों में ठुमरी की तान भी थी, गजल की गूंज भी थी और उन महफिलों की याद भी, जिनकी रौशनी बहुत पहले बुझ चुकी है। शायद यही वजह है कि मीरगंज को सिर्फ रेडलाइट एरिया कह देना उसकी पूरी कहानी के साथ नाइंसाफी होगी।
मीरगंज की पहचान को किसी एक शब्द में समेटना मुश्किल है। यहां बदनामी की कहानियां भी थीं और संगीत की गूंज भी। कुछ लोगों को यहां शोहरत मिली, बहुत-से लोग गुमनामी में खो गए। यही विरोधाभास मीरगंज को शहर के इतिहास में एक अलग जगह देता है।
शहरों का इतिहास अक्सर बड़े नामों से लिखा जाता है। राजा, रईस, नेता, लेखक और न्यायाधीश उसके पन्नों पर जगह बना लेते हैं। मगर किसी शहर की रूह सिर्फ उनसे नहीं बनती। वह उन गलियों से भी बनती है जहां आम लोग अपनी छोटी-छोटी खुशियों, दुखों, उम्मीदों और मजबूरियों के साथ जीते हैं।
मीरगंज ऐसी ही एक गली नहीं था, बल्कि अपने आप में एक पूरा संसार था। मीरगंज अपने भीतर कई तरह की जिंदगियां समेटे हुए था। यहां आने वालों की वजहें अलग-अलग थीं और यहां रहने वालों की कहानियां भी। कुछ के पास कला और पहचान थी, कुछ के हिस्से में सिर्फ हालात आए। इसी विविधता ने इस मोहल्ले को एक साधारण गली से कहीं अधिक बना दिया था।
वक्त का फेर: जहां बदलाव एक झटके में नहीं, धीरे-धीरे उतरा
फिर वक्त बदला। और जब वक्त बदलता है, तो सिर्फ लोग नहीं बदलते, पूरी दुनिया बदल जाती है। ग्रामोफोन आया। रेडियो आया। सिनेमा आया। फिर टेलीविजन ने घरों के भीतर अपनी जगह बना ली। और उसके बाद मोबाइल फोन ने दुनिया को हथेली पर समेट दिया। मनोरंजन के साधन बदल गए। संगीत के ठिकाने बदल गए। लोगों की पसंद और जिंदगी के तौर-तरीके बदल गए। मगर मीरगंज जैसी जगहों पर वक्त कभी एक ही झटके में नहीं बदलता। वह धीरे-धीरे उतरता है। कुछ चीजों को अपने साथ बहा ले जाता है, कुछ को वहीं छोड़ देता है और कुछ का चेहरा बदल देता है।
जो महफिलें कभी रात भर जगी रहती थीं, उनकी रौनक धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगी। जिन आवाजों पर कभी लोग दाद दिया करते थे, वे नए मंचों और नए जमानों की तरफ चली गईं। मगर मीरगंज की कहानी वहीं खत्म नहीं हुई। उसकी गलियों ने बस एक नया रूप धारण कर लिया। आज जब कोई पहली बार मीरगंज में आता है तो उसे शायद उसकी पुरानी परतें दिखाई नहीं देतीं। उसे वर्तमान दिखता है – वैसा जैसा वह उसकी आंखों के सामने मौजूद है। लेकिन शहरों का अतीत इतनी आसानी से नहीं मरता। वह कहीं न कहीं बचा रह जाता है।
कभी किसी पुरानी हवेली की उखड़ती दीवार में। कभी किसी जर्जर बालकनी में। कभी किसी बुज़ुर्ग की याद में। कभी किसी पुराने रिकॉर्ड की खड़खड़ाती आवाज में। और कभी किसी ऐसे नाम में, जिसे इतिहास ने भुला दिया हो, मगर शहर ने नहीं।
मीरगंज को समझना दरअसल प्रयागराज के उस इतिहास को समझना है, जिसके बारे में खुलकर कम बात की जाती है। यह सिर्फ एक मोहल्ले की कहानी नहीं, बल्कि उन लोगों, आवाजों और स्मृतियों की कहानी है जो शहर का हिस्सा तो रहे, मगर उसकी आधिकारिक पहचान का हिस्सा कभी नहीं बन सके।
आज मीरगंज की गलियों में चलते हुए पुरानी महफिलों की रौनक दिखाई नहीं देती, लेकिन उनकी गूंज अब भी महसूस की जा सकती है। शायद यही वजह है कि मीरगंज आज भी सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि शहर की सामूहिक स्मृति का एक जीवित हिस्सा है।
शाम ढलने के बाद अगर आप चौक की तरफ से मीरगंज की ओर निकलें तो आज भी कुछ पुरानी खिड़कियां, थकी हुई बालकनियां और वक्त की धूल से ढके दरवाजे दिखाई देंगे। इन्हें देखते हुए महसूस होता है कि मीरगंज सिर्फ एक मोहल्ला नहीं, बल्कि उस शहर का आईना है जिसने हमेशा अपने लिए दो चेहरे संभालकर रखे – एक दिन का और दूसरा रात का।
शायद इसी वजह से मीरगंज की कहानी आज भी खत्म नहीं हुई। वह अब भी उन पुरानी दीवारों और खामोश गलियों के बीच कहीं सांस ले रही है, ठीक वैसे ही जैसे किसी बहुत पुराने गीत की आखिरी गूंज महफिल खत्म हो जाने के बाद भी देर तक हवा में तैरती रहती है।
यह भी पढ़ें: इरशाद! यह प्रयागराज है जनाब, जहां कभी शहर ‘वाह-वाह’ में बसता था और शायरी में सांस लेता था
सर्दियों की एक रात। चौक से लेकर सिविल लाइंस तक रिक्शों की घंटियां कुछ ज्यादा बज रही हैं। चाय की भाप हवा में घुल रही है। कहीं दरी बिछी है, कहीं सफेद चादरों से सजा मंच है। सामने बैठे लोग किसी शायर का इंतजार कर रहे हैं। जैसे ही मंच से एक गजल खत्म होती है, भीड़ से आवाज उठती है – “वाह-वाह!” और फिर – “मुकर्रर अर्ज है!” शायर मुस्कुराता है और वही शेर दोबारा पढ़ता है। उस क्षण लगता है कि पूरा शहर शब्दों के जादू में डूब गया है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
