हाई स्कूल की परीक्षा पास थी। दीपू परीक्षा की तैयारी में रात का भोजन तक नहीं करता, सिर्फ एक गिलास गरम दूध पीता था, क्योंकि खाने के बाद बैठकर पढ़ना मुश्किल होता और नींद भी आने लगती। दीपू के पिताजी एक निर्धन किसान थे। जब पिताजी, दीपू के लिए किताबें नहीं खरीद सके थे तो अध्यापकों ने ही उसकी प्रतिभा को देखते हुए स्कूल के पुस्तकालय से पुस्तकों की व्यवस्था कर दी थी। विद्यालय को उससे ढेर सारी आशाएं थीं।
दीपू का पड़ोसी संदीप भी उसी कक्षा का विद्यार्थी था। उसके पिता बड़े व्यापारी थे। मां-पिता के आवश्यकता से अधिक लाड़-प्यार ने उसे भटका दिया था। घर से स्कूल के लिए वह निकलता तो जरूर, पर कभी सिनेमा देखने चला जाता, तो कभी दोस्तों के साथ सैर-सपाटे के लिए। जब संदीप, दीपू को पढ़ते हुए देखता तो मुंह बिचकाकर चिढ़ाता हुआ कहता, ‘ऐ किताबी कीड़े! तिलचट्टे-सा किताबें चाटते रहो, रट्टू तोते की तरह रटते रहो और लद्दू गधे की भांति रटे हुए अभ्यास दिमाग में लादकर ढोते रहो।
कहीं ऐसा न हो कि रटते-रटते तुम पागल हो जाओ और तुम्हें लेकर हमें रांची या आगरे की सैर करनी पड़े!’ दीपू बुरा मानने के बजाय बस हंस कर टाल देता। संदीप व्यंग्य-बाण चलाते हुए आगे बढ़ जाता था। आखिर परीक्षा का दिन भी आ ही धमका। सभी लड़के कापियां लिखते चले जा रहे थे। दीपू ने तो दो और कापियां ले ली थीं। संदीप की कलम दांतों के बीच दबी हुई थी। तभी अध्यापक ने मुस्कुराते हुए व्यंग्य किया था, ‘अपनी पतंगबाजी और सैर-सपाटे वाले संस्मरण ही क्यों नहीं लिख देते? और नहीं, तो फिल्मों से ही कुछ…।’
संदीप का चेहरा गुस्से से तमतमा गया था। मगर वह मन मसोसकर रह गया था। सभी विषयों की परीक्षा खत्म होने के बाद संदीप ने अपने पिता से ढेर सारे रुपए लिए और कापियों का पता लगाकर परीक्षकों के पास नंबर बढ़वाने के लिए निकल पड़ा। खूब पापड़ बेलने पड़े उसे। मगर मरता क्या न करता!
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एक माह बाद जब वह वापस लौटा तो दीपू ने जिज्ञासावश पूछा था, ‘क्यों संदीप, काम हो गया?’ ‘क्यों नहीं होगा? जेब में माल है, तो कमाल-ही-कमाल है!’ संदीप ने मुंह चिढ़ाकर जवाब दिया था, ‘चाहे लाख खून-पसीना बहाया है तुमने, मगर अच्छे अंक मुझे ही मिलेंगे, समझे?’ और वह कुलांचता हुआ अपने घर की ओर नौ-दो-ग्यारह हो गया था।
परीक्षा-परिणाम घोषित होने के दिन दीपू और संदीप एक साथ ही घर से निकले थे। अभी वे चौराहे तक पहुंचे ही थे कि कई लड़के दीपू को बधाइयां देने लगे। ‘अरे भई! तुम लोगों ने परिणाम भी देखा है या यों ही बधाई दिए जा रहे हो?’
संदीप ने कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए कहा। ‘बेटा दीपू!’ अचानक प्रिंसिपल साहब आ धमके और उन्होंने दीपू को गले से लगा लिया, ‘शाबाश बेटे! तुमने हमारे विद्यालय का नाम रोशन कर दिया। पूरे प्रांत में प्रथम आए हो तुम!’ ‘प्रणाम सर! सब आपका स्नेह और आशीर्वाद है, सर!’ दीपू ने उनके पैरों की ओर झुकते हुए कहा। संदीप मुंह लटकाए चुपचाप खड़ा रहा। उसे देख कर भी सबने अनदेखा कर दिया। सभी दीपू के इर्द-गिर्द ही जमा होते जा रहे थे। संदीप ईर्ष्या की आग में जल उठा। तभी कई फोटोग्राफर दौड़े हुए आए। फिर क्या था! दीपू की तस्वीरें फटाफट विभिन्न कोणों से खींची जाने लगीं। पत्रकार इंटरव्यू लेने लगे।
थोड़ी देर में ही एक कार आई और प्रिंसिपल साहब, दीपू को साथ लेकर उसमें जा बैठे। कार धूल उड़ाती हुई विद्यालय की ओर चल दी। संदीप बस टुकुर-टुकुर ताकता रहा। उसे अपने पिता की दौलत, इज्जत, रुतबा और लाड़-प्यार सभी बौने लगने लगे। तभी गणित के शिक्षक ने कहा, ‘संदीप, तुम तो इस साल लटक गए!’ संदीप को लगा, जैसे उसके गाल पर किसी ने एक जोरदार तमाचा जड़ दिया हो। तिलमिलाकर रह गया वह।
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‘सर! सभी परीक्षकों ने मुझे धोखा दिया है। रुपए भी ले लिए और नंबर भी नहीं बढ़ाया।’ संदीप रुआंसा होकर बोला। ‘नहीं संदीप! तुम्हें किसी ने धोखा नहीं दिया है। बबूल बोकर आम के फल की आशा रखना महज मूर्खता ही तो है। तुमने खुद अपने आपको धोखा दिया है।’ ‘सर! आपने ठीक कहा। अब तक अपने पैरों पर मैं स्वयं कुल्हाड़ी मारता आ रहा हूं।’ संदीप ने पूछा, ‘सर, क्या मैं दीपू नहीं बन सकता?’
‘दीपू? मगर दीपू तो एक निहायत गरीब किसान का बेटा है। तुम तो उसकी खिल्ली उड़ाया करते थे न! मुझे मालूम है कि तुमने उसे कई दफा पीटा भी था। फिर भी तुम…?’ ‘अपनी उन गलतियों और शैतानियों के लिए मैं बहुत शर्मिंदा हूं सर। आज मैंने देख लिया कि असली बड़प्पन और प्रतिष्ठा धन-दौलत के झूठे अहंकार में नहीं, वरन अपनी प्रतिभा को निखारने में है। मैं भी दीपू जैसा प्रतिभाशाली बनना चाहता हूं।’ संदीप ने अपने मन की असलियत जाहिर की।
‘बस, आज से ही अगले साल की तैयारी में जुट जाओ। हम सभी तुम्हारी मदद करेंगे। दीपू का भी तुम्हें हर संभव सहयोग मिलेगा। यह नाकामयाबी तुमको बहुत बड़ी कामयाबी दिलाएगी। सफलता पाने के लिए सिर्फ आत्मविश्वास, कड़ी मेहनत और लगन होनी चाहिए। एक बात और, अध्यापकों को सम्मान देना सीखो। उन्हें बदनाम करके तुम कुछ भी हासिल नहीं कर सकते।’ अध्यापक ने समझाया। ‘यह सबक मैं हरदम याद रखूंगा सर!’ संदीप टीचर के पैरों की ओर झुका, मगर उन्होंने उसे गले लगा लिया।
