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सबरंग विश्लेषण: दोहराव पर दांव

फिल्म ‘तलवार’ न सिर्फ देश-विदेश में सराही गई बल्कि उसे पारिवारिक दर्शकों का भी भरपूर साथ मिला जबकि मनीष गुप्ता की ‘रहस्य’ कब आई और कब चली गई, भनक तक नहीं लग पाई।

Author Published on: November 9, 2018 4:35 AM
फिल्म ‘तलवार’ का एक दृश्य।

श्रीशचंद्र मिश्र

फिल्म ‘तलवार’ न सिर्फ देश-विदेश में सराही गई बल्कि उसे पारिवारिक दर्शकों का भी भरपूर साथ मिला जबकि मनीष गुप्ता की ‘रहस्य’ कब आई और कब चली गई, भनक तक नहीं लग पाई। यह तो ‘तलवार’ की सफलता का असर था कि ‘रहस्य’ का टीवी पर प्रसारण हो गया वरना रिलीज होते वक्त तो फिल्म ने बाक्स आफिस पर पानी भी नहीं मांगा था। दोनों फिल्मों की यह तुलना इसलिए है क्योंकि दोनों ही फिल्में काफी समय चर्चित रहीं और अभी भी अनसुलझे आरुषि-हेमराज हत्याकांड पर आधारित थीं। दोनों ही फिल्मों में उस हत्याकांड की टूटी कड़ियों को जोड़कर उन सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की गई, बेचैन करने वाले हैं। दोनों फिल्मों ने काल्पनिक नामों का सहारा लिया लेकिन पूरा घटनाक्रम वही था जो सात साल पहले नोएडा के जलवायु विहार में हुआ था। लेकिन ‘तलवार’ ने देखने वालों को झझकोर कर रख दिया जबकि उससे पहले आई ‘रहस्य’ कोई खास असर नहीं छोड़ पाई। कहानी कहने के अंदाज और मीडिया से मिले समर्थन को ‘तलवार’ के छा जाने की वजह माना जा सकता है। साथ ही ‘तलवार’ ने यह धारणा तो तोड़ी ही कि एक बार इस्तेमाल हो चुके विषय को दोबारा भुनाना जोखिम भरा हो सकता है। हालिया फिल्म ‘इत्तफाक’ की नाकामी ने एक तरह से इसकी चेतावनी दे दी है।

हिंदी फिल्मों में नकल की परिपाटी काफी पुरानी रही है। कुछ दृश्यों और स्थितियों को दोहराने को तो खैर नकल न मानकर फार्मूला माना जाता है और उन्हें बार-बार दोहराने को हर निर्माता अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानता है। उसका कोई कॉपीराइट नहीं होता। किसी फिल्म का मूल विषय या उसमें इस्तेमाल की गई घटनाएं लोगों को पसंद आ जाती हैं तो उसे दोहराने की होड़ लग जाती है लेकिन ऐसा कम ही होता है जब दोहराव मूल फिल्म से ज्यादा सफल साबित हो पाए। दोहरी भूमिका का एक समय ऐसा चलन शुरू हो गया था कि हर छोटा बड़ा कलाकार दो रूपों में फिल्म में दिख जाता था। इसकी शुरुआत तो पहले ही हो गई थी लेकिन उसे ‘राम और श्याम’ में दिलीप कुमार ने हिट बनाया। उन्हीं स्थितियों में महेश कुमार (राजा और रंक), हेमा मालिनी (सीता और गीता), श्रीदेवी (चालबाज), जीतेंद्र (जैसे को तैसा), अनिल कपूर (किशन कन्हैया), जैकी श्राफ (दिल ही तो है) पर प्रयोग हुए। अभिनेत्रियों ने तो फिर भी थोड़ी बहुत बात संभाल ली लेकिन अभिनेता लगभग नाकाम रहे। एक ही शक्ल के दो बच्चों का बिखरे परिवार को एक करने का जो फार्मूला ‘दो कलियां’ में हिट हो गया वह बाद की किसी और फिल्म में रंग नहीं जमा पाया।

सिर्फ प्रसंग या घटनाएं ही नहीं, फिल्म की मूल विषयवस्तु को उड़ाने में भी कभी कोई संकोच नहीं किया गया। ऋषिकेश मुखर्जी की ‘नमक हराम’ और प्रकाश झा की ‘चक्रव्यूह’ में यह फर्क समझा जा सकता है। दोनों की पृष्ठभूमि अलग थी लेकिन दो दोस्तों में तनाव हो जाने की वजह एक ही थी। ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों की नकल तो कई स्तर पर हुई। ‘गोलमाल’ में एक ही व्यक्ति के दो रूप रखने की ठिठोली रोहित शेट्टी की फिल्म ‘बोल बच्चन’ का हिस्सा बनी तो ‘चोर मचाए शोर’ में उसे दोहराने में डेविड धवन भी पीछे नहीं रहे। डेविड धवन ने ‘बावर्ची’ को ‘हीरो नंबर वन’ में दोहरा दिया। इसके अलावा सत्तर के दशक में बनी ‘आज की ताजा खबर’ की गढ़ी हुई उलझने को रोहित शेट्टी ने ‘गोलमाल’ का हिस्सा बना दिया। हर बार हावी रही मूल फिल्म ही। ‘दो फूल’ पर आधारित ‘आंखें’ में जरूर डेविड धवन कमाल दिखा गए।

इन दिनों तो निर्माता विदेशी फिल्म के रीमेक के अधिकार खरीद कर फिल्म बनाने लगे हैं। पहले तो कोई इसकी परवाह नहीं करता था। बस कोई विदेशी फिल्म जची नहीं कि उस पर हिंदी फिल्म बना डाली। यही वजह है कि हॉलीवुड की फिल्म ‘युअर्स माइंस एंड अवर्स’ पर दो फिल्में ‘खट्टा-मीठा’ और ‘हमारे-तुम्हारे’ बन गई और दोनों लगभग एक साथ ही रिलीज हुर्इं। ‘खट्टा-मीठा’ हास्य प्रधान होने की वजह से ज्यादा चल गई। बरसों बाद रोहित शेट्टी ने घुमा फिरा कर इसी विषय को गोलमाल सीरिज की अपनी एक फिल्म में इस्तेमाल कर लिया। ‘स्लीपिंग विथ एनीमी’ पर तो तीन फिल्में बन गर्इं लेकिन ‘अग्नि साक्षी’ पहले आने की वजह से सफल हो गई जबकि ‘दरार’ और ‘याराना’ नाकाम हो गर्इं। आखिर एक ही विषय को कोई बार-बार क्यों देखना चाहेगा?

कुछ फिल्मकारों ने अपनी ही सफल फिल्मों को दोबारा भुनाने की कोशिश की। महबूब खान ‘औरत’ को ‘मदर इंडिया’ के नाम से फिर बनाकर कामयाब हो गए लेकिन विजय भट्ट ‘रामराज्य’ को और केदार शर्मा ‘चित्रलेखा’ को दोबारा बनाकर मात खा गए। सूरज बड़जात्या ने अपनी ही प्रोडक्शन संस्था ‘राजश्री’ की फिल्म ‘नदिया के पार’ को ‘हम आपके हैं कौन’ में दोहराया लेकिन कलेवर नया था और प्रस्तुतिकरण में भव्यता थी। इसलिए उनका दांव सही पड़ गया। यही कोशिश जब उन्होंने ‘चितचोर’ को ‘मैं प्रेम की दीवानी हूं’ में बदलने की की तो ऐसा लुढ़के कि सालों तक कोई और फिल्म निर्देशित करने की हिम्मत नहीं जुटा सके। चेतन आनंद की ‘अफसर’ नए रूप में ‘साहिब बहादुर’ में फीकी रही। यही ‘टैक्सी ड्राइवर’ को ‘जानेमन’ के रूप में दोहराने से हुआ। अमिताभ बच्चन को स्टार बनाने वाली प्रकाश मेहरा की ‘जंजीर’ जब उनके बेटों ने फिर बनाई तो पूरी तरह उखड़ गए।असल में किसी विषय में नयापन हो तो वह दर्शकों को ज्यादा लुभाता है। लेकिन उसी को सफलता का एकमात्र आधार मानकर उसे दोहराने की कोशिश उतना असर नहीं छोड़ पाती।

कबीर खान के निर्देशन में बनी ‘बजरंगी भाईजान’ इस साल के पहले दस महीने में सबसे ज्यादा पैसा कमाने वाली फिल्म रही। लेकिन तीन हफ्ते बाद आई उन्हीं की ‘फैंटम’ कोई कमाल नहीं दिखा पाई। फर्क सलमान खान व सैफ अली खां की लोकप्रियता का नहीं था। गड़बड़ी विषय में हुई। ‘फैंटम’ का नायक घर में घुसकर आतंकवादी को मारने का काम करता है। यही अंदाज कुछ महीने पहले आई नीरज पांडेय की ‘बेबी’ में भी अपनाया गया था। वही वैश्विक आतंकवाद, वही दूसरे देश में जाकर वार करना। काफी कुछ एक जैसा हो तो पहली फिल्म देख चुके लोगों को दूसरी फिल्म लुभा ही नहीं सकती। 2012 में कबीर खान ने ‘न्यूयार्क’ में अमेरिका में रह रहे मुसलमानों के प्रति बढ़ते अविश्वास और उससे उनके हिंसक होने की भावना को उभारा। दो साल बाद रेसिल डिसिल्वा इसी विषय को लेकर ‘कुरबान’ में आए। शहीद भगत सिंह पर बनी और एक ही दिन रिलीज हुई दोनों फिल्में नहीं चल पार्इं। इसी तरह चटगांव (बांग्लादेश) में हुए विद्रोह पर आशुतोष गोवरीकर की ‘खेले हम जी जान से’ और अनुराग कश्यप की ‘चटगांव की कहानियां’ भी सफलता नहीं पा सकी। इन दोनों मामलों में विषय की समानता उतना बड़ा मुद्दा नहीं रहा जितना यह कि वे बेहद नीरस तरीके से बनाई गई थीं।

एक ही विषय को दोहराने की प्रवृत्ति आम रही है। इसका सिलसिला पुराना है। कभी-कभी यह दांव चल भी जाता है। दो फिल्मों के मामले में ऐसा ही हुआ। सलीम-अनारकली की प्रेमकथा पर आधारित के आसिफ की फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ अभी लिखी ही जा रही थी कि नंदलाल जसवंत लाल के निर्देशन में बनी ‘अनारकली’ रिलीज भी हो गई। वह सुपरहिट हुई। ‘मुगल-ए-आजम’ जब आई तो उसने भी सफलता के नए रिकार्ड कायम कर दिए। वजह शायद यह रही कि ‘मुगल-ए-आजम’ ‘अनारकली’ के सात साल बाद आई। लेकिन आस्था के नाम पर अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाली प्रवृत्ति पर एक साल से भी कम समय के अंतर से बनी ‘ओएमजी-ओह मॉय गॉड’ व ‘पीके’ सफल हो गई। असल में मूल विषय दोहराने में कोई गड़बड़ी नहीं है, उस विषय को अगर नई कल्पनाशीलता के साथ उभारा जाए तो उसका असर होता ही है। ज्यादातर फिल्मों में यही नहीं हो पाता।

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