मां ने कल से छोटे भाई को दुकान खुलवाने की जिद लगा रखी थी। परिवार में उसके खुद के बच्चे होते हुए भी मां के डर से वह अपने बीवी-बच्चों से भी बात नहीं कर पाता था। पूरे संयुक्त परिवार की जिम्मेदारी उसने अपने ऊपर ले रखी थी। उसकी बीवी को मामूली पैसे भी खर्च करने का अधिकार नहीं था। इस वजह से पत्नी घुटती थी और अपने घरवालों से ही सारा खर्च लेती थी। पत्नी समझती थी कि उसके ऊपर उसके भाई-बहनों की जिम्मेदारी है। बावजूद इसके उसे बहुत बुरा लगता था क्योंकि उसकी छोटी से छोटी इच्छा भी कभी पूरी नहीं हो पाती थी।
बेचारा मोहन मन-मसोसकर रह जाता और पत्नी के आगे उसकी नजरें भी झुकती थीं। लेकिन खुद को मजबूत दिखाने के चक्कर में वह कभी-कभी अपनी पत्नी को भी डांट देता था।
ऐसा नहीं था कि मोहन के पास नौकरी नहीं थी या उसके पिता के पास नौकरी नहीं थी। उसके पिता एक संस्थान में चपरासी थे और वो खुद अच्छी सरकारी नौकरी कर रहा था। पर परिवार बहुत बड़ा था और जिम्मेदारियां भी बहुत ज्यादा थीं।
दो बहनों की शादी हो चुकी थी और एक बहन की करनी थी। दोनों भाइयों को काम-धंधे पर लगाना था क्योंकि दोनों ही बेरोजगार थे और कुछ नहीं करते थे।
घर की बहू की हालत
इतने बड़े घर का काम उसकी बीवी ही अकेले करती थी। फिर भी बेचारी डांट खाती रहती और ताने सुनती रहती। मां कभी भी इस घर में उसकी पत्नी की सत्ता नहीं चाहती थी क्योंकि वह सोचती थी कि अगर इसकी पत्नी के हाथ में सत्ता चली जाएगी तो उनके खुद के बच्चों का क्या होगा।
हालांकि उसकी पत्नी बहुत अच्छी महिला थी और वह सारी बात समझती थी। बावजूद इसके उसकी मां उसकी पत्नी पर विश्वास नहीं करती थी।
तालाब किनारे दिखी दूसरी दुनिया
परेशान मोहन घर से बाहर निकलकर एक तालाब के किनारे जाकर बैठ जाता है। थोड़ी देर मछलियों को दाना खिलाता है और फिर बाहर खड़े चाट-समोसे की दुकानों पर नजर डालता है तो हंसते-खिलखिलाते लोगों पर उसकी नजर पड़ती है।
कुछ परिवारों पर और कुछ बिलकुल नए-नवेले शादीशुदा जोड़ों पर उसकी नजर पड़ती है तो उसे लगता है कि ऐसी खुशी तो उसने शायद ही कभी अपनी जिंदगी में जी हो। उसे अपनी जिंदगी नीरस लगने लगती है।
ईमानदारी की परीक्षा
वह घर आने को होता है तो उसके मोबाइल पर घंटी बजती है और वो फोन उठाता है। मोहन अच्छी पोस्ट पर था। फोन एक कंपनी के मालिक का था जो उससे टेंडर पास करने की पेशकश करता है।
वह उस आदमी को जवाब देता है, ‘सर, टेंडर तो जो नियम है, उसके तहत ही पास होगा और जब टेंडर पास होगा, तब सभी कंपनियों को सूचित कर दिया जाएगा।’
वो आदमी सीधे तौर पर उसे दस लाख देने की पेशकश करता है तो वह घबरा जाता है। मोहन एक ईमानदार आदमी था। घबराया हुआ मोहन फोन पर मना कर देता है और जल्दी से घर आ जाता है।
मां की जिद और मोहन का द्वंद्व
वह घर आकर चुपचाप बैठ जाता है। उसकी मां का वही आलाप शुरू हो जाता है कि छोटे वाले राजू को दुकान खुलवानी है। एक बार तो मोहन का दिल करता है कि वह दस लाख का प्रस्ताव मान ले और इन सब को इनके जीवन की सुरक्षा दे दे। लेकिन उसके मन का ईमानदार आदमी यह सब करने को कतई राजी नहीं होता है।
उधर पत्नी की निराश आंखों से भी वह घबरा रहा था। उसे लग रहा था कि अब उसकी पत्नी कभी भी इस रिश्ते को लेकर हार मान सकती है।
मिठाई के डिब्बे में पैसे
इतने में एक बड़ी गाड़ी उसके घर के बाहर रुकती है और वह बाहर देखने जाता है। उसी कंपनी का मालिक सामने खड़ा होता है, जिसने उसे दस लाख देने की पेशकश की थी।
अंधेरे में भी उसका चेहरा वह पहचान सकता था। वह आदमी थोड़ा नजदीक आया और फटाफट एक मिठाई का डिब्बा मोहन के हाथ में देकर चला गया। वह कुछ बोलता इससे पहले आदमी अपनी गाड़ी में बैठ कर चला गया। मोहन ने मिठाई का डिब्बा खोला तो उसमें बहुत सारे पैसे थे।
रात भर की उलझन
पैसे देखकर मोहन हड़बड़ा गया और अपने आसपास देखा कि कहीं कोई देख तो नहीं रहा। वह घर के अंदर आ गया और सोच में पड़ गया। उसकी मां ने उसके अंदर आने पर पूछा कि क्या हुआ लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया। उसकी पत्नी तो किसी के सामने कुछ बोलती भी नहीं थी, इसलिए चाहकर भी कुछ नहीं बोल पाई।
उसके हाथ-पैर सुन्न पड़ चुके थे और दूसरी तरफ उसे मां और बीवी का चेहरा याद आ रहा था, जिन्हें उससे बहुत ज्यादा उम्मीद थी। रात भर वह इसी उलझन में रहा कि उसे पैसे रखने चाहिए कि नहीं।
पिता की सीख
सुबह जब उसके पिता नौकरी पर जाने को तैयार हुए तो उन्होंने उससे बोला, ‘मैं समझ रहा था कि कल तुम्हारी क्या स्थिति थी। मैंने सब देखा। मैं और तुम एक ही मिट्टी के बने हैं।
मेरी तो यही सलाह है कि तुम किसी की चाहत पूरी करने के लिए अपनी ईमानदारी को कभी मत खोना वरना तुम अपने आप को खो बैठोगे। अपनी जिम्मेदारियां पूरी करो लेकिन अपने खुद के परिवार का भी ध्यान रखो, बाकी तुम खुद समझदार हो।’
मोहन को यह बात पूरी तरह समझ में आ चुकी थी कि यह पैसा उसके लिए नहीं है और न ही वह गलत काम कर सकता है।
ईमानदारी की जीत
उसने जाकर कंपनी के मालिक को पैसे वापस दे दिए। कंपनी का मालिक उसकी ईमानदारी को देखकर हैरान रह गया। उसने बोला, ‘मैंने आज तक जिसको भी पैसे दिए हैं, उसने पैसे लिए हैं और मेरा काम भी किया है।
लेकिन मैं पहला ऐसा आदमी देख रहा हूं, जिसे इतने सारे पैसे देखकर भी लालच नहीं आया है। तुम वाकई काबिले तारीफ हो। मुझसे कभी कोई काम हो तो मुझे बताना। तुम्हारे जैसे ईमानदार लोग कम ही मिलते हैं।’
मोहन ने बदला अपना रवैया
मोहन उन्हें नमस्कार करके घर की तरफ लौट आता है और आफिस जाने की तैयारी करता है। उसकी मां वही बात दोहराती है। इस बार वह बड़ी हिम्मत करता है और बोलता है, ‘मां अगर हमारे पास दुकान खुलवाने के पैसे नहीं हैं तो इसका मतलब यह थोड़े न है कि ये हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाएगा। इससे कहो कि कहीं जाए और काम खोजे।’
मां अवाक रह जाती है क्योंकि आज तक मोहन ने उन्हें इस तरह से जवाब नहीं दिया था।
परिवार के लिए वक्त
फिर वह अपनी पत्नी की तरफ मुखातिब होकर बोलता है, ‘शाम को बच्चों को तैयार कर देना, हम लोग उन्हें लेकर घूमने जाएंगे। और हां मां, अपनी पसंद का रंग बता देना, आज तुम्हारी बहू तुम्हारे लिए साड़ी खरीदकर लाएगी।’
उसकी पत्नी उसमें आए इस बदलाव को देखकर चकित रह जाती है। मां समझ जाती है कि परिवार के नाम पर उसे दबाना अब ठीक नहीं होगा। वह कुछ नहीं बोलती है।
रिश्तों का असली अर्थ
आज उसी तालाब के किनारे वो भी अपने परिवार के साथ खड़ा था और सभी लोगों की तरह अपने परिवार के साथ वक्त बिता रहा था। उसे समझ में आ चुका था कि जीवन का सिर्फ एक ही पक्ष नहीं होता, दूसरे भी पक्ष होते हैं और सभी पक्षों पर ध्यान देना जरूरी होता है।
