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सौंदर्य का स्वेद बोध

साहित्य और चेतना को मुक्त होने की वकालत करती निराला की ये पंक्तियां शब्दों की दुनिया के कारीगरों से बहुत कुछ कहती हैं। इन बातों में सबसे जरूरी है सौंदर्यबोध की बात।

Author Updated: February 17, 2021 4:48 AM
Niralaसांकेतिक फोटो।

निराला का नाम लेते ही हमारे सामने आती है ‘तोड़ती पत्थर’ से लेकर ‘सरोज स्मृति’ तक की वे स्त्रियां, जहां वर्णन के नाम पर मानवीय संवेदना में पोर-पोर डूबी संवेदना है। वैसे सौंदर्य के बोध के लिहाज से तो निराला कितने गहरे और अपने समय से कितने आगे थे, इसके लिए बात ‘जुही की कली’ से शुरू करनी पड़ेगी, जिसमें महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे आचार्य संपादक को अनगढ़ता नजर आई थी। यह अलग बात है कि बाद में यही अनगढ़ता हिंदी कविता को कुछ यों गढ़ गई कि खुद में प्रतिमान बन गया।

दरअसल, निराला की रचनाओं में सौंदर्यबोध कोई वस्तुपरक चीज नहीं है। आखिर वो क्या है जो सुंदर है? ‘सब्जेक्टिव’, ‘आॅबजेक्टिव’ तो है ही, जो ‘पर्सपैक्टिव’ है उसमें कैसे फर्क आता है? सौंदर्यबोध आपके इतिहास बोध की भी परख बताता है। निराला का जो विकासात्मक सौंदर्यबोध है, उसमें समकाल को आगे के देशकाल से जोड़कर देखने का धैर्य भी है। अपनी इसी दृष्टि के बूते हिंदी का यह कवि सार्वदेशिकता और सार्वकालिकता की कसौटी पर खुद को खरा उतारता है।

‘जुही की कली’ से ‘तोड़ती पत्थर’ के बीच आपको लगेगा कि काव्यात्मक आस्वाद से लेकर चेतना और बोध के स्तर पर निराला सौंदर्य के उस सत्य को स्पर्श करना चाहते हैं, जहां और कुछ नहीं, बस भीतरी स्पंदन है। ‘जुही की कली’ में एक तरफ जहां वे सुंदरता के ‘सबजेक्टिव’ नजरिए के साथ सामने आते हैं, वहीं वे ‘तोड़ती पत्थर’ तक आते-आते उनका यह सौंदर्यबोध ‘सबजेक्टिव’ हो जाता है।

स्वेद और सौंदर्य को एक साथ देखने का जोखिम बड़ा था, पर उसके पीछे की मंशा इतनी साफ थी कि न तो शब्द मैले होते हैं और न ही भाव। दोनों के सौंदर्यबोध में नजरिए का फर्क है। पसीने में लथपथ को ‘ड्राइंग रूम ब्यूटी’ में बदलने की मांसल सोच से आज तक कला जगत मुक्त नहीं हुआ है। पर मुक्ति की इस राह पर निराला बहुत पहले निकल चुके थे। दिलचस्प है कि छायावाद की सौंदर्य दृष्टि को प्रसाद, पंत और महादेवी पहले ही उस ऊंचाई तक ला चुके होते हंै, जो आज भी अपनी मिसाल आप है।

प्रेम और प्रकृति के बीच खड़े होकर पंत कहते हैं-‘छोड़ द्रुमों की शीतल छाया/ तोड़ प्रकृति से भी माया/ बाले तेरे बाल जाल में मैं कैसे उलझा दूं लोचन।’ हिंदी में कला और अनुभूति के लिहाज से यह बड़ा प्रयोग था। पर यह प्रयोग अकेले कवि मन को ही नहीं बल्कि मनुष्य के सकल परिवेश को भी घेरे, इसके लिए निराला नया पर जरूरी जोखिम लेते हैं।

प्रकृति के आंगन से निकलकर वे मानवीय श्रम और उससे जुड़ी करुणा की दुनिया में दाखिल होते हैं. अपने वर्तमान से नैतिक मुठभेड़ करते हैं। ‘तोड़ती पत्थर’ में वे वही जोखिम उठाते हैं, जो जोखिम उन्होंने बेटी सरोज की स्मृति को शब्दप्राण से भरते हुए उठाया था। देह दोनों जगह है, पर मांसलता की थोड़ी भी खरोंच नहीं। उलटे सौंदर्य और करुणा के बीच का एक ऐसा रिश्ता, जिसमें शब्द और समाज दोनों के लिए मानवीय प्रतिष्ठा है। ‘कोई न छायादार/ पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार; / श्याम तन, भर बंधा यौवन,/ नत नयन, प्रिय-कर्म-रत मन,/ गुरु हथौड़ा हाथ,/ करती बार-बार प्रहार।’ साफ है कि देह तक जाते हुए शब्द न तो संदेह में बदलते हैं और न ही नजरिया कहीं तंग पड़ता है।

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