सुंदरबन में बहुत सारे बंदरों के परिवार रहते थे। मंकू भी अपने परिवार के साथ रहता था। मंकू के मम्मी-पापा और उसके सारे रिश्तेदार उसे बहुत प्यार करते थे। ज्यादा प्यार-दुलार के चक्कर में मंकू थोड़ा शरारती भी हो गया था। अपने से बड़ों की कोई बात सुनता ही नहीं था। कोई समझाता तो एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देता था। मंकू जैसे-जैसे बड़ा हो रहा था, वैसे-वैसे उसकी शरारतें भी बढ़ती जा रही थीं। कभी-कभी वह अपने दोस्तों के साथ मिलकर शरारतों की अति कर देता था।

सुंदरबन में बहुत सारे इलाके थे, जिसमें अलग-अलग बंदर परिवार रहते थे। मंकू भी अपने परिवार के साथ एक आम के बगीचे में रहता था। सबका इलाका बंटा हुआ था। सब अपने इलाके की अच्छे से देखभाल करते थे। किसी बाहरी की घुसपैठ बर्दाश्त नहीं करते थे, और न ही अपने पेड़ों के फल खाने देते थे, क्योंकि पेड़ों केफल ही उनका मुख्य भोजन था। मंकू के इलाके में भी आम के बौर खूब लगे हुए थे।

परिवार के सारे लोग प्रसन्न थे कि इस साल खाने की भरपूर मात्रा रहेगी। लेकिन मंकू खूब शरारत करता था। वह आम की छोटी-छोटी कैरियों को ही तोड़कर खाता और गिरा देता था। जितना खाता था, उससे दस गुना ज्यादा नुकसान करता था।

मंकू के मम्मी-पापा हमेशा समझाते थे, बेटा तुम्हें जितना खाना है उतना ही फल तोड़ना चाहिए क्योंकि यह सीमित है, और यह सभी का भोजन है। एक बार भोजन समाप्त होने के बाद फिर भोजन मिलने में बहुत ही कठिनाई होती है। इसलिए फिजूल का नुकसान नहीं करना चाहिए।

शैतान मंकू कहां सुनने वाला था। वह अपने दोस्तों के साथ मिलकर दिनभर उपद्रव करता था, और बहुत सारे फलों का नुकसान कर देता था। बहुत डांट-डपट के बाद भी मंकू नहीं सुधरा, जिसका नतीजा यह हुआ कि अन्य फलों के पेड़ों पर फल आने से पहले ही आम के पेड़ों पर फल समाप्त हो गए। परिवार के सामने पेट भरने की समस्या आ खड़ी हुई। सबको बहुत थोड़ी-थोड़ी मात्रा में ही खाने को फल मिल रहे थे। मंकू का तो पेट ही नहीं भर पा रहा था।

उसके पेट में बार-बार भूख से मरोड़ उठती थी। जब बगीचे में फल पूरी तरह खत्म हो गए, तो भूखे मरने की नौबत आ गई। तब पूरे परिवार ने मिलकर निर्णय लिया कि रिश्तेदारों के बगीचे में चला जाए। उनसे थोड़ा-बहुत फल भोजन के लिए मांगा जाए। भूखे मरने से अच्छा, सभी को यह निर्णय पसंद आया। लेकिन एक समस्या थी। बीच रास्ते में लकड़बग्घे की मांद थी। लकड़बग्घा बेहद ही खूंखार था। वह छोटे बच्चों को तो यूं ही चबा जाता था। बड़े तो किसी प्रकार लड़ कर अपनी जान बचा भी लेते थे। लेकिन बच्चे तो बिल्कुल ही सुरक्षित नहीं थे।

लेकिन रास्ता वही एक था। या तो भूखे मरें, या रास्ता पार करें। सब ने जोखिम उठाने का निर्णय लिया। भूखे पेट कितने दिन रहा जा सकता है, तो सब रिश्तेदारों के बगीचे की तरफ चल दिए। इधर लकड़बग्घा भी कई दिनों से भूख से बेहाल था। जब उसने अपनी तरफ बंदरों के झुंड को आते हुए देखा तो उसकी बांछें खिल उठीं। स्वादिष्ट भोजन का इंतजाम होता देख कर उसकी लार टपकने लगी।

लकड़बग्घा बेहद ही शातिर था। वह जानता था कि बड़े बंदर चालाक होते हैं। इसलिए आसानी से उसकी पकड़ में नहीं आएंगे। उसने अपना पूरा ध्यान बच्चों के ऊपर केंद्रित कर लिया। वह आंखें मूंद कर चुपचाप पड़ा रहा, ताकि किसी को शक ना हो, और सभी कोई उसके पास आ जाएं। उसके बाद वह आक्रमण करेगा। मंकू के मम्मी-पापा लकड़बग्घे की इस प्रवृत्ति से भली भांति परिचित थे। इसीलिए उन्होंने मंकू को बीच में रखा। उनका मकसद था कि यदि लकड़बग्घा आक्रमण करेगा तो मंकू को बचाया जा सके।

आंखें मूंद कर लेटे हुए लकड़बग्घे को महसूस हुआ कि मंकू उसके काफी पास आ गया है। वह अचानक से अपनी आंखें खोल कर उसके ऊपर झपट पड़ा। मंकू के मम्मी-पापा इस हमले के लिए पूरी तरह तैयार थे। वे दोनों ही उससे भिड़ गए। लकड़बग्घे की चाल कामयाब नहीं हो पाई। लेकिन, इस हाथापाई में मंकू के पापा को बहुत ज्यादा चोट लग गई।

मंकू बिल्कुल घबरा गया। डरावना लकड़बग्घा और उसकी लाल-लाल आंखों ने मंकू को भीतर से भयभीत कर दिया। वह डर के मारे अपनी मम्मी से चिपक गया। उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। उसे नहीं पता था कि लकड़बग्घा इतना खतरनाक होता है।

लेकिन उसके परिवार के अन्य सदस्यों ने एकजुटता से लकड़बग्घे से मुकाबला कर उसे भगा दिया। इसके बाद वे सब रिश्तेदार के बगीचे की तरफ जल्दी-जल्दी चल दिए। अपने पिता की चोट देख कर मंकू को बहुत ही पछतावा हो रहा था। यदि उसने अपने इलाके के फलों को नुकसान नहीं पहुंचाया होता तो अभी वहां पर खाने के लिए बहुत सारे फल रहते।

उसके परिवार को रिश्तेदारों के यहां जाना नहीं पड़ता, और न ही लकड़बग्घे से मुठभेड़ होती। इस हादसे के बाद मंकू भोजन की कीमत समझ चुका था। उसने कान पकड़ लिया कि आइंदा किसी भी फल-फूल के पेड़ को या किसी भी पेड़ को नुकसान नहीं पहुंचाएगा, ताकि सबको आसानी से भोजन मिलता रहे।