‘कुंदन’। अविनाश राय की भारी आवाज गूंजी। कुंदन रसोई में थी। हाथ पोछते हुए बाहर आई, ‘बोलिए।’ ‘यह पंखा पांच नंबर पर क्यों है? अभी तो मौसम में ठंडक है। तीन पर भी चल सकता है। पिछले दो महीनों का बिजली का बिल देखा है?’ कुंदन ने गहरी सांस ली और पंखे का रेगुलेटर घुमा दिया। सेवानिवृत्ति के बाद से यह रोज का काम था। कभी सब्जी में नमक ज्यादा होने की शिकायत, तो कभी धोबी ने कपड़ों पर ठीक से इस्त्री नहीं की, इसकी पंचायत। कुंदन को लगता कि क्या यह वही पुरुष है, जिसके साथ उसने पैंतीस साल बिताए हैं? या फिर कुर्सी से उतर जाने के बाद के इस आदमी को भीतर का खालीपन कचोट रहा है?
वह वापस रसोई में चली गई। उस दिन रविवार था। थोड़ी ही देर में उनकी बेटी कृतिका आने वाली थी। कृतिका दिल्ली में पत्रकार थी। उसके आने की खबर मात्र से कुंदन के चेहरे पर थोड़ी रौनक आ जाती थी। कृतिका यानी कुंदन की दबी हुई इच्छाओं का मुक्त आकाश। दोपहर में भोजन करते समय मेज पर अविनाश राय ने थाली में रखी रोटी की ओर देख कर कहा, ‘आज रोटी थोड़ी मोटी नहीं लग रही? या फिर कृतिका आ रही है, इसलिए जल्दबाजी में बना दी?’
कुंदन परोसते-परोसते रुक गई। उससे रहा नहीं गया। वह बोली, ‘रोज तो यही रोटी आपको ठीक लगती है, आज कृतिका आने वाली है, इसलिए आपको सब कुछ अलग लग रहा है। आपका मिजाज आफिस के साहब जैसा है। लेकिन अब यहां कोई चपरासी नहीं है। मैं हूं।’ अविनाश राय चौंक गए। कुंदन सामान्यत: उनके सामने जवाब नहीं देती थी।
उन्होंने कुंदन को तीखी नजर से देखा, लेकिन कुंदन नजर मिलाए बिना रसोई में चली गई। अंदर जाकर उसने आंखों के कोने पोछे। स्त्री का जीवन आखिर क्या है? बचपन में पिता की आज्ञा, जवानी में पति की आज्ञा और बुढ़ापे में किसकी? दरवाजे की घंटी बजी। कुंदन ने चेहरे पर मुस्कान ठीक की और दरवाजा खोला। कृतिका खड़ी थी। जींस और कुर्ते में सजी, कंधे पर लैपटाप बैग और हाथ में एक छोटा-सा रंगीन कागज में लिपटा तोहफा। बोली, ‘मम्मी।’
कृतिका उससे लिपट गई। उस स्पर्श में एक ऐसी गर्माहट थी, जो कुंदन को पिछले काफी समय से नहीं मिली थी। खाने के बाद सभी बैठक में बैठे थे। अविनाश राय कृतिका से राजनीति और देश की स्थिति के बारे में पूछ रहे थे, जैसे साक्षात्कार ले रहे हों। कृतिका ने बीच में ही बात काट दी और कुंदन की ओर मुड़ी, ‘मम्मी, तुम्हें याद है वह छोटी-सी कहानी लिखी थी? ओस की बूंद?
उस कालेज मैगजीन के लिए?’ कुंदन हंसी, ‘अरे पागल, वह तो एक जमाना बीत गया। अब कहां याद दिला रही है?’ ‘नहीं, मुझे याद दिलाना है। मैंने वह कहानी अपने एक संपादक मित्र को पढ़ाई थी। वे लोग एक नई कड़ी शुरू कर रहे हैं, गृहिणियों की कलम से और उन्हें तुम्हारी लेखन शैली बहुत पसंद आई है। अगले हफ्ते मुंबई में एक कार्यशाला है, जिसमें जाने-माने साहित्यकार आने वाले हैं। मैंने तुम्हारा नाम रजिस्टर करवा दिया है।’
बैठक में सन्नाटा छा गया। अविनाश राय ने चश्मा नाक से थोड़ा नीचे किया। फिर बोले, ‘कार्यशाला? मुंबई? इस उम्र में?’ अविनाश राय की आवाज व्यंग्यात्मक थी, ‘कुंदन, क्या तुम अब लेखिका बनोगी? घर का काम कौन करेगा? और तुम जानती हो न कुंदन, मुझे समय पर खाना और दवा चाहिए। इस उम्र में ऐसी भागदौड़ शरीर को नहीं पचेगी।’ कुंदन ने नजरें झुका ली। उसके भीतर एक उमंग जागी थी, लेकिन सालों से दबी मानसिकता ने उसे रोक रखा था। कृतिका ने पिता की ओर देख कर कहा, ‘पापा, आप रिटायर हुए हैं, मम्मी नहीं। वास्तव में मम्मी ने कभी छुट्टी ली ही नहीं। रविवार को भी नहीं और त्योहारों में भी नहीं। आपने पूरी जिंदगी आफिस में फाइलें संभालीं, मम्मी ने घर संभाला। अब जब आपके पास समय है तो आप घर क्यों नहीं संभाल सकते? दो दिन की तो बात है।’
‘यह सब बोलने में अच्छा लगता है कृतिका।’ अविनाश राय ने हाथ झटक दिया, ‘व्यवहार में यह सब नहीं चलता। वैसे भी कुंदन को अब इन सब में रुचि नहीं होगी। क्यों कुंदन?’ ‘मुझे जाना है।’ एक धीमी, लेकिन स्पष्ट आवाज आई। अविनाश राय और कृतिका दोनों चौंक गए। ‘मुझे मुंबई जाना है।’ कुंदन ने नजर उठाकर पति की आंखों में देखा। उन आंखों में अब डर नहीं था बल्कि एक दृढ़ निर्णय था। उसने कहा, ‘इस उम्र में मुझे खुद से मिलने का शौक जाग गया है।’ अविनाश राय स्तब्ध रह गए। कुंदन इतना लंबा और इतना स्पष्ट बोल सकती है, यह उनकी कल्पना से बाहर था। अविनाश राय ने बचाव की तरकीब आजमाई, ‘खाना।’ ‘आप बना लेना या टिफिन मंगवा लेना।’ वातावरण में एक भारी शांति छा गई। कृतिका की आंखों में मां के लिए गर्व था। उसने धीरे से कुंदन काहाथ दबाया।
रात में अविनाश राय सो नहीं सके। सोचने लगे, क्या सचमुच वे इतनी ज्यादा दखलंदाजी करने लगे थे? दफ्तर की सत्ता चली गई थी, इसलिए क्या वह घर पर सत्ता जमा रहे थे? अगले दिन सुबह कुंदन जल्दी उठी और तैयार हुई। बैठक में अविनाश राय बैठे हुए थे। कुंदन बैग लेकर बाहर आई। उसने कहा, ‘मैं निकल रही हूं। कृतिका मुझे स्टेशन छोड़ने आ रही है।’
अविनाश राय खड़े हुए। रसोई में गए और एक डिब्बा लेकर आए। कुंदन की ओर बढ़ाकर कहा, ‘ये थेपले हैं और सूखी सब्जी। सुबह जल्दी उठकर मैंने बना लिए थे। बाहर का खाओगी तो पित्त हो जाएगा।’ कुंदन क्षण भर के लिए ठिठक गई। अविनाश राय ने कहा ‘तुम्हारी कहानी वह ओस की बूंद मैंने भी पढ़ी थी। चोरी-छिपे। अच्छी थी। वहां जाकर दूसरी लिखना। मैं यहां सब संभाल लूंगा।’
कुंदन की आंखें नम हो गईं। लेकिन ये आंसू दुख के नहीं थे। दहलीज पार करने से पहले उसने पीछे मुड़कर देखा। यह घर अब उसे कैदखाना नहीं, बल्कि घर लग रहा था। कार में बैठने के बाद कृतिका ने पूछा, ‘मम्मी, पापा बदल गए न?’ कुंदन ने कहा, ‘इंसान नहीं बदलते कृतिका, सिर्फ दृष्टिकोण बदलता है। मैंने अपनी रेखा लंबी कर दी, इसलिए उनकी रेखा अपने आप छोटी हो गई। लेकिन कोई बात नहीं। अब हम समानांतर चल सकेंगे।’
