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द लास्ट कोच: सुनो अपराजिता…

उसकी बातें कानों में संगीत घोल देती हैं। वह बांध तोड़ कर नदियों की तरह बहने लगती है नीलाभ के रोम रोम में। ... अपराजिता ने कहा, यहां लगातार क्लास से थक जाती हूं इन दिनों। कितनी टफ ट्रेनिंग है आइएएस बनने की। नीलाभ ने कहा, मेहनत का फल मीठा होता है। इस पर अपराजिता ने कहा, इंतजार में प्रेम का फल भी मीठा होता है। मगर वो तो मिला ही नहीं मुझे। सुनिए न धरती की पहली प्रेम कहानी सुनाने वाले थे आप। अभी वो ही सुना दीजिए। ... लेखक पत्रकार संजय स्वतंत्र अपनी द लास्ट कोच शृंखला में बता रहे हैं धरती की पहली प्रेम कहानी।

प्रतीकात्मक तस्वीर। (Illustration: Subrata Dhar)

नीलाभ सो गए क्या? अपराजिता ने मैसेज किया। मैसेज टोन के बावजूद उसकी नींद नहीं टूटी है।
कहीं कहीं करता होगा वो मेरा इंतजार, जिसकी तमन्ना में फिरती हूं बेकरार…अरमां है कोई पास आए, इन हाथों में वो हाथ आए, फिर ख्वाबों की घटा छाए, बरसाए खुमार…। उसने यह गीत खुद गाकर रिकार्ड किया और वाट्सऐप पर भेज दिया था। मगर देर से उठने की आदत जान वह लाल बहादुर शास्त्री एकेडमी के क्लासरूम सेशन के लिए चली गई। अपराजिता अभी चार महीने की बेसिक ट्रेनिंग पर थी। नीलाभ के लिए वह एक मैसेज छोड़ गई- उठते ही दो गिलास पानी पीजिए और चाय के साथ दो बिस्कुट जरूर खा लीजिएगा। आप अकसर खाली पेट रहते हैं। यह अच्छी बात नहीं।

अलार्म क्लॉक की ट्रिन-ट्रिन की आवाज से नीलाभ की नींद टूटी। दस बज रहे हैं। वाट्सऐप पर जरूरी संदेश देखने के बाद वह अपराजिता का ऑडियो मैसेज सुनने लगा। उसने अपने मीठे स्वर से सुबह को हमेशा की तरह खुशनुमा बना दिया है। तुझको संभालूं ये मेरा जिम्मा, मैं हूं तो क्या है जाने तमन्ना…सचमुच रोमानी तबीयत की मल्लिका थी वो। चाहे कितने तनाव हो वह मुस्कुरा देती या गुनगुना कर मन का बोझ हल्का कर देती- जाइए आप कहां जाएंगे, ये नजर लौट के फिर आएंगी। … अबूझे और अनाम रिश्ते को मन के किसी कोने में वह बुनती रहती। इस धरती पर न जाने कितनी प्रेम कहानियां कही और सुनी गईं।  कुछ खामोश दम तोड़ गईं तो कुछ दिलों में बरसों तक सहेजी गई।

नीलाभ जब तक तरोताजा हुआ, तब तक गिल्लू उसके लिए बादाम का दूध, सिंके हुए दो ब्रेड, उबले हुए दो अंडे और अंगूर का रस टेबल पर रख गया। आठ-दस अखबारों की सुर्खियां देखने के दौरान बॉस का फोन आ गया। उन्होंने कहा, आज जरा जल्दी आ जाना। शाम को जल्दी निकलना है। नीलाभ ने घड़ी देखी। बारह बज रहे हैं। वह जल्दी जल्दी तैयार हुआ और ट्रैफिक जाम से बचने के लिए कैब से मेट्रो स्टेशन निकल गया। दोपहर के डेढ़ बज रहे हैं।

55-55 मिनट की कई क्लास के बाद अपराजिता को ब्रेक मिल गया होगा, मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियां चढ़ते हुए नीलाभ ने सोचा। लास्ट कोच में सवार होते समय ही मोबाइल की स्क्रीन चमक उठी-अपराजिता कॉलिंग। उसने कहा, हेलो, आफिस निकल गए क्या? हां जरा जल्दी में हूं। मेट्रो में हूं। उसने कहा, हमेशा की तरह लास्ट कोच में? नीलाभ ने जवाब दिया, हां सबसे पीछे रहो मगर सबसे आगे जाने का जज्बा बनाए रखो। अपराजिता ने कहा, जी, आपकी यही प्रेरणा और यही हौसला काम आया। आज मैं जहां हूं इसका श्रेय आपको हैं। नहीं अपरा, ये तुम्हारी मेहनत का फल है, वह बोला। जरूर, मगर आप संघर्ष के हर दौर में हमेशा साथ खड़े रहे। यही तो आपका स्नेह है। अपराजिता ने भावुक होते हुए कहा। … बातों बातों में कुछ स्टेशन निकल गए। उद्घोषणा हो रही है, अगला स्टेशन मॉडल टाउन है। दरवाजे बायीं ओर खुलेंगे।

उसकी बातें कानों में संगीत घोल देती है। वह बांध तोड़ कर नदियों की तरह बहने लगती है नीलाभ के रोम रोम में। … अपराजिता ने कहा, यहां लगातार क्लास कर के थक जाती हूं इन दिनों। कितनी टफ ट्रेनिंग है आईएएस बनने की। नीलाभ ने कहा, मेहनत का फल मीठा होता है। इस पर अपराजिता ने कहा, इंतजार में प्रेम का फल भी मीठा होता है। मगर वो तो मिला नहीं मुझे। सुनिए न धरती की पहली प्रेम कहानी सुनाने वाले थे आप। अभी वही सुना दीजिए न। थोड़ी थकान मिट जाएगी। थोड़ा सुकून मिल जाएगा। यह सुन कर नीलाभ ने मन ही मन कहा, हम में इतना फासला है कि तुम्हें कैसे कहूं आई लव यू मेरे दोस्त। अच्छा चलो सुनो। ध्यान से सुनना।

अपराजिता मगन होकर सुनने लगी, … बचपन में हम सभी गुड्डे-गुड़ियों का खेल खेलते हैं। उसकी शादी भी रचा देते हैं। ईश्वर ने भी कभी खेला एक बार। उस समय धरती बंजर थी। आसमान में अंधकार छाया था। तब ईश्वर ने सूरज और चांद बनाया। धरती पर फल और फूल वाले पौधे उगाए। जाने कहां से आए भौंरे मंडराने लगे। तितलियां नाचने लगीं। झिंगुर गाने लगे। पक्षियों के कलरव और कोयल की कूक से चहक उठा जीवन। नदियों-झीलों और समंदर ने नए संसार के लिए स्थिरता, प्रवाह और गंभीरता की एक नई तस्वीर रच दी।
……..लेकिन सृष्टि अब भी अधूरी थी। तब ईश्वर ने धरा से एक मुट्ठी धूल उठाई और फूंक दिया हवा में। सामने पुरुष था- सृष्टि का पहला मानव। मगर सूरज और चांद फिर भी गुमसुम रहे। तारों ने भी टिमटिमाने से इनकार कर दिया। नदियां शांत रहीं। समंदर में नहीं उठी कोई लहर। प्रकृति भी मानो मुंह फेरे बैठे रही। तब ईश्वर ने पुरुष के दो बूंद आंसू लेकर नारी की रचना की।

यह था धरती पर पहला युगल। दोनों ने एक दूसरे  को देखा। संवाद के लिए कोई शब्द नहीं। तब आंखों से दिल की जुबां को पहली बार किसी पुरुष ने पढ़ा होगा। यह नारी और पुरुष के बीच पहली दोस्ती थी। एक दूसरे के साहचर्य और सहयोग की पहली अटूट संधि। तब मैं और तुम की जगह हम ही रहा होगा, उन दोनों के बीच। … ओह कितनी सुंदर कहानी है। नीलाभ आई प्राउड ऑफ यू। क्या स्टोरी है। यू आर अमेजिंग।
… फिर क्या हुआ बोलिए न। अपरा ने उत्सुक होकर पूछा। नीलाभ ने एक चुप्पी के बाद कहा, सुनो। संसार को जीवंत बनाने के लिए इन दोनों की रचना की गई थी। अंधकार छंटने लगा था। चांद निकल आया था। उसकी दूधिया रोशनी में वह सफेद परी लग रही थी और पुरुष देवदूत। दोनों एक दूसरे को मुग्ध होकर देखते रहे। आंखों से ही होता रहा संवाद। पुरुष पहली बार नारी की गोद में सिर रख कर सोया। रूह से मुलाकातों का सिलसिला चल निकला। वे एकाकार होने लगे। एक रात निर्लज्ज चांद मुस्कुराता हुआ गुम हो गया। …. हाऊ स्वीट लव स्टोरी। एक ऐसी रात मुझे भी दो न, जो कभी भी खत्म न हो। रात भर बात करती रहूं बस। अपरा ने इसरार किया और फिर कहा, आगे भी तो बोलो न। नीलाभ ने कहा, बीच में ऐसे टोकोगी तो कैसे बढ़ेगी कहानी।

और फिर एक दिन सूरज उन्हें जगाने आ गया- उठो-उठो…नए जीवन की शुरुआत करो। एक दूसरे में खोना नहीं, साथ आगे बढ़ना ही जीवन है। इसके साथ ही चारों ओर लालिमा फैल गई सूरज की। धरती की वो पहली लड़की लाल परी लग रही थी। उसने लज्जा के मारे पलकें झुका लीं। फिर शुरू हुई स्त्री-पुरुष की गृहस्थी की जद्दोजहद। उन्होंने बनाया अपना पहला घर। उस समय प्रकृति ही नारी की पहली सहेली थी। उसके साथ रह कर वह जीना सीख गई थी। एक दिन जंगल से फल लेकर लौटी तो बेसुध होकर गिर पड़ी। पुरुष ने उसे गोद में उठा लिया। नारी ने अपनी पलकें मूंद ली थीं। वह अपने भीतर कुछ देख रही थी-तन्मयता से। यह कह कर नीलाभ खामोश हो गया। इस बीच कई मेट्रो स्टेशन निकल चुके हैं। उद्घोषणा हो रही है-अगला स्टेशन सिविल लाइंस है। दरवाजे बायीं ओर खुलेंगे। अपराजिता ने चुप्पी तोड़ी, आगे क्या हुआ नीलाभ…?

तो उस शाम हमेशा की तरह सूरज दूर पहाड़ों के पीछे गुम हो गया। धुंधलका छाने लगा था। पुरुष उसकी पान-पत्र सी हथेलियों को सहलाता रहा, देर तक। उसके लबों को बेइंतिहा चूमने वाले होंठ इस बार उसके ललाट का मृदुल स्पर्श कर रहे थे। मगर यह क्या? वह उससे दूर धरा पर जा लेटी। पुरुष चकित था कि आज इसे क्या हो गया? अंधकार और गहराया तो वह रोने लगी। कहीं-कुछ चुभ रहा था। असह्य वेदना से उसका रक्तिम आभायुक्त सौंदर्य पीला पड़ रहा था।
वह रो रही थी और धरती का पहला मानव असहाय था। कोई मदद न कर पाने की ग्लानि उसे बेचैन किए जा रही थी। आखिरकार उसने अपने नियंता को याद किया। उन्हीं से मदद की गुहार लगाई।
कुछ देर बाद ही नारी की रुलाई थम गई। वह हांफ रही थी-लगातार। उसने पुकारा- ओ मेरे मित्र, मेरे सखा। यह देखो…..! प्रार्थना कर रहे पुरुष ने आंखें खोलीं। पास जाकर देखा तो क्षण भर के लिए चकित रह गया। उसने उसका सिर अपनी गोद में रख लिया। … नीलाभ फिर खामोश हो गया तो अपरा ने टोका, कहानी पूरी कीजिए नीलाभ।

तभी पहाड़ियों से सूरज फिर मुस्कुराता हुआ निकला। लालिमायुक्त उजास में नारी का चेहरा कमल की तरह खिल उठा। पुरुष ने पाया कि उसकी सहचर ने उसी के छोटे से कोमल प्रतिरूप को अपने अंक में जतन से छुपा रखा है। तब धरती के प्रथम पुरुष ने ईश्वर से पहला सवाल किया- ब्रह्मांड के रचयिता यह क्या है? यह क्या है, जिसकी सृष्टि आपने नहीं की। इस पर ईश्वर का जवाब था- यह रचना तुम्हारी है और अब यह सृष्टि भी तुम्हारी। इस संसार में जो भी रूह में उतरेगा, वही मनुष्यता की सृष्टि करेगा। वही मानवीयता का संचार करेगा…… और वही परिवार-समाज और विश्व का भी नवनिर्माण करेगा।

ईश्वर कह रहे थे धरती के प्रथम पुरुष से- मेरा काम खत्म हुआ। अब तुम होगे इस धरती के नियंता। प्रकृति के रखवाले। यह नारी उसी का हिस्सा है और तुम उसके सहचर। तुम्हारे आंसुओं से इसे रचा है मैंने। इसलिए वह न तुमसे अलग है और न तुम उससे। तुम दोनों का एक दूसरे के बिना कोई वजूद नहीं। इसलिए इसकी आंखों से कभी आंसू मत आने देना नहीं तो तुम बह जाओगे।

ईश्वर लौट चुके थे। धरती के प्रथम शिशु के पास लेटी नारी ने पलकें मूंद लीं। फिर एक पल बाद देखा कि पुरुष जंगल की ओर जा रहा है। उसने पूछा- कहां जा रहे हो तुम मुझे छोड़ कर। पुरुष ने उसे देख मुस्कुराते हुए जवाब दिया तुम्हारे लिए कुछ फल लाने। नीलाभ ने कहा, कैसी लगी कहानी? इस पर अपराजिता ने कहा, बहुत सुंदर, बहुत सुंदर प्रेम कहानी। …अच्छा मैं अब क्लास जा रही हूं। टाइम हो गया। फिर बात करूंगी। … अरे, अरे ये तो पूछो कि फल लाने जाते उस पुरुष ने नारी के लिए मन ही मन पहली कविता कैसी रची होगी? नीलाभ ने कहा। अपरा ने हंसते हुए कहा, मझे पता है यह कविता उस प्रथम पुरुष के लिए आपने ही रची होगी। वाट्सऐप पर भेज दीजिएगा। पढ़ लूंगी। उधर उद्घोषणा हो रही है, ….अगला स्टेशन चांदनी चौक है। दरवाजे दायीं ओर खुलेंगे।

नीलाभ ने सोचा उस पुरुष के दिल में अपनी प्रिया के लिए कैसी भावना उमड़ी होगी? सुनो अपराजिता, आई लव यू। … फिर वह लिखता चला गया यह मान कर कि इसे वह जरूर पढ़ेगी और देर तक मुस्कुराती रहेगी-जीवन की इस रणभूूमि से
कहीं नहीं जा रहा
तुम्हें छोड़ कर।
मैं बनूंगा तुम्हारा सारथी,
धरती के अंतिम छोड़ तक
ले जाउंगा तुम्हें,
वहीं से शुरू करना युद्ध
एक नई सभ्यता के लिए।
पोंछना आंसू उन गरीबों के
जिन्हें मिले रोटी और
दो पल का सुकून,
बोना सद्भाव के बीज
हर नकारात्मक मनुष्य में,
बोना प्रेम का भी बीज
हर स्त्री और पुरुष में।
जब गढ़ोगी तुम
रिश्तों की नई परिभाषा
तभी रच सकोगी
एक सुंदर दुनिया….।

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