ताज़ा खबर
 

द लास्ट कोच: ऐ दिल-ए-आवारा चल…

नीलाभ को एक संत की बात याद आ रही है। उन्हें किसी आयोजन में सुना था। वे कह रहे थे, आपके चेहरे की प्रसन्नता कभी जानी नहीं चाहिए।

प्रतीकात्मक तस्वीर। (Illustration: Subrata Dhar)

दिल्ली के लोगों के चेहरे पर इन दिनों उदासी की परतें कुछ ज्यादा ही दिखती हैं। ये आसानी से उतरेगी नहीं जब तक कि लोग खुश होने के बहाने नहीं तलाशेंगे। महीनों तक पूरी दुनिया ने सांसों की डोर बचाने के लिए जद्दोजहद करते लोगों को देखा है। क्या अमीर और क्या गरीब, सब ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए भटकते रहे। अपनी देह का दान तक कर देने वालों की धरती पर असहाय लोगों से उनकी जान की कीमत वसूली गई। न जाने कितने देश बेबसी के दौर से आज भी गुजर रहे हैं। वे अपने नागरिकों को बचा नहीं पा रहे। उस दिन संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बता रहे थे कि हमने अपनी आंखों के सामने लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया है…। अखबार की सुर्खियों पर एक नजर डालने के बाद नीलाभ का मन उचाट हो गया है।

गिल्लू ने चाय और नाश्ता लगा दिया है। मगर कुछ भी खाने का मन नहीं कर रहा। चाय कड़वी लग रही है। अनामिका की पान-पत्र सी वो हथेलियां नीलाभ की आंखों के आगे तैर गई, जिससे वह उसके लिए कभी कॉफी बना देती थी। उसकी अंगूठी में जड़ा हीरा झिलमिला उठा है। ऐसा लग रहा है कि जैसे एक पल ठहर गया हो उसके इंद्रधनुषी रंग में। चाय अब मीठी लगने लगी है। हजारों किलोमीटर दूर बैठी अनामिका की याद ही कुछ ऐसी है। वह हमेशा कहती है, मुश्किल दौर से पार पाने के लिए हमेशा खुश रहिए। अपनी पसंद के पुराने गीत गुनगुनाइए। कुछ देर के लिए शरारती बच्चे बन जाइए। … सच ही है, मगर यह बात मैं क्यों भूल जाता हूं, नीलाभ ने सोचा।

उसे याद आया कि इसी कोरोना काल में न्यूजीलैंड के मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी जिम्मी नीशाम ने कहा था कि चीजों के मजाकिया पक्ष पर ध्यान केंद्रित करने से उसे महामारी जैसी परिस्थितियों से पार पाने में मदद मिलती है। यह भी कि हम जिस खेल को खेलते हैं और जैसा मेरा करिअर है, उसमें कई उतार-चढ़ाव है, ऐसे में आपको उसका अच्छा और मजेदार पक्ष देखना चाहिए। नहीं तो आप अंधकार के गर्त में चले जाएंगे। जिम्मी ने यह भी कहा, मैं मुश्किल हालात में जीने का आदी हूं। और उनमें से यह भी एक है। ये सभी चीजें आखिर में गुजर जाती हैं। इसलिए हमें मुस्कुराते और हंसते हुए रहना चाहिए। जब हम इन परिस्थितियों से बाहर निकलेंगे तब हम सभी अच्छी स्थिति में होंगे।

… तो जिम्मी ने कितनी अच्छी बात कही। इस दौर से निकल जाएंगे। अगर हम हंसते-मुस्कुराते हुए इसे पार कर जाएं। क्या हम सचमुच मुस्कुराना भूल गए हैं? हम क्यों नहीं छोटी बातों पर हंसते। हम क्यों जीवन भर छोटी-छोटी समस्या पर रोते रहते हैं।

…तभी गिल्लू सामने आकर बैठ गया। बोला, दादा आप क्या सोच रहे हैं इतनी देर से। नाश्ता तो कर लीजिए। फिर सोचते रहिएगा देर तक। इसके बाद वह अपनी बीमार बीबी का दुखड़ा लेकर बैठ गया। हर रोज वही रोना। नीलाभ ने उसे समझाया, ठीक हो जाएगी वह। रोज यही रोना लेकर बैठ जाता है। कभी हंस भी लिया कर। नीलाभ ने उसे डांटा। उसे अभी चार्ली चैप्लिन का एक प्रसंग याद आ रहा है। वे किसी कार्यक्रम में कोई चुटकला सुना रहे थे। पहली बार जब सुनाया तो काफी लोग हंसे। दूसरी बार वही चुटकला सुनाया तो थोड़े कम लोग हंसे। तीसरी बार सुनाया तो लोग हंसे ही नहीं। तब चार्ली ने सभागार में मौजूद लोगों से कहा, आपने एक बात देखी। जब मैंने पहली बार जोक सुनाया तो आप हंसे। दूसरी बार सुनाया तो आप में से बहुत कम लोग हंसे। तीसरी बार में आप हंसे ही नहीं। जब आप एक ही जोक पर हंस नहीं सकते तो एक ही समस्या पर आप बार-बार रोते क्यों हो। खुश रहने की आदत क्यों नहीं डालते?

आज हर आदमी दुखी है। इसकी वजह समझ में आती है। स्कूल बंद हैं। बच्चे ठीक से पढ़ नहीं रहे। परीक्षाएं नहीं हो रहीं। मां-बाप अलग परेशान हैं। कई लोग वर्क फ्राम होम हैं। उनकी अपनी परेशानियां हैं। जब दफ्तर जाते थे तब भी रोना रोते थे। आज घर से काम कर रहे हैं, फिर भी दुखी हैं। यानी दुखी रहना हमारी आदत हो गई है। हम इस आदत से कभी नहीं उबरते। नीलाभ को एक संत की बात याद आ रही है। उन्हें किसी आयोजन में सुना था। वे कह रहे थे, आपके चेहरे की प्रसन्नता कभी जानी नहीं चाहिए। क्योंकि परमात्मा प्रसन्न लोगों से मिलता है। उदास और मायूस चेहरे उसे अच्छे नहीं लगते। इसलिए अपने चेहरे की प्रसन्नता कभी गंवाइए मत। सदा प्रसन्न रहिए। अकारण प्रसन्न रहिए। आपको इतना दे दिया उसने। हर आदमी को उसकी औकात से ज्यादा उसकी झोली में डाल दिया है, फिर भी शिकायत है आपको? फिर भी धन्यवाद नहीं है? फिर भी प्रसन्न नहीं है आदमी? थोड़ा आप साधना करते-करते मुस्कुराना सीखें।

चार्ली चैप्लिन कहते थे, अभागा है वह दिन जिस दिन आप खुल कर हंसे नहीं। आप एक बच्चे को देखिए। वह कितना मुस्कुराता रहता है। इतना सजग बच्चा है। मुस्कुराते हए वो गदगद रहता है। ऐसा क्यों है। … क्योंकि वह भीतर से चैतन्यता से भरा है। वह आपकी मुस्कुराट का जवाब मुस्कुरा कर देता है। और जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं। उम्र बढ़ती है। ज्ञान बढ़ता है। कचरा बढ़ता है। हम सारी मुस्कुराहटें भूल जाते हैं। न जाने हमारी मुस्कुराहट कहां चली जाती है। मुस्कुराहट चली जाती है तो हमारी प्रसन्नता भी चली जाती है। और अगर किसी को ज्ञान का दंभ हो जाए तो वह जिंदगी भर नहीं मुस्कुराता। … तो उस दिन बाबा जी कह रहे थे, मुस्कुराओ और प्रसन्न रहो। यह जीवन तुम्हें मिला है प्रसन्न रहने के लिए। जो भी है इस पल को जी लो।

आज नीलाभ को लगने लगा है कि उसे अब जीवन जीना चाहिए। उसे नया रंग भरना चाहिए। उसे अनामिका की याद आ रही है। उसने घड़ी की ओर देखा। हजारों किलोमीटर दूर देश में अब शाम ढल चुकी होगी। वह तमाम आपरेशन निपटाने के बाद क्लीनिक से लौट आई होगी। मित्र कहां हो तुम। मन ही मन नीलाभ ने उसे पुकारा। …और जैसे उसने दिल की बात सुन ली। मोबाइल फोन की घंटी बजने लगी है। स्क्रीन पर नाम लिखा आ रहा है- अनामिका कॉलिंग। कॉल रिसीव करते ही उधर से वह चहकते हुए बोली, ऐसा लगा आप याद कर रहे हैं। मेरा योग और ध्यान भंग कर दिया मिस्टर तपस्वी। अब मैं आपका ध्यान भंग कर दूंगी। आप आंखें बंद कीजिए तो…। क्या आप मुझे महसूस कर सकते हैं। मैं अपने स्वीमिंग पूल के पास बैठी आपको याद ही कर रही थी। … काश आप यहां आकर बांहों में भर लेते। नीलाभ ने खुद को संभालते हुए कहा, मैं दूर कहां हूं तुमसे। हर पल तुम्हारे ही पास हूं। तुम्हारी रूह में हूं।

यह सुन कर अनामिका बोली, रूह में आप पहले से बसे हैं। हर पल आपको खुद में महसूस करती हूं। जी करता हैं आपको देखती रहूं। बस देखती रहूं। घंटों बातें करती रहूं। रात खत्म हो जाए पर हमारी बातें खत्म न हों। और जब सुबह हो तो आपके साथ सोने जैसी रेत पर दौड़ जाऊं। समंदर के नीले जल में ले जाकर लिपट जाऊं। अब ये नहीं कहिए कि मैं कोई गलत बात कर रही हूं। आप अकसर टोक देते हैं। आई नीड यू। आई लव यू।

…. नीलाभ चुप रहा। उसे मुस्कुराते हुए महसूस कर रहा है। उसके बदन की संदली खुशबू और उसकी मदमाती आंच यहां तक आ रही है। उसकी उत्तेजक बातें कानों से घुलती हुई सांसों में उतर रही है। उसे तो खुश होना चाहिए। इस पल को जीना चाहिए। क्यों उसे नैतिक मूल्यों और बढ़ती उम्र का खयाल आता है। अनामिका को गले लगाने भर से भी क्यों संकोच होता है। मन हुलस कर क्यों नहीं गले लगा लेता उसे। क्यों नहीं उसके पास चले जाना चाहिए। मुझे किसने रोका है। वह तो कब से इंतजार कर रही है।

… उधर अनामिका स्वीमिंग पूल में उतर गई है। बदन पर सिर्फ नीलाभ की रूह लिपटी है। ऐसा वो अकसर महसूस करती है। उस पल को अकसर जी लेती है। तब योग से तराशी अपनी कमनीय काया से निकल कर वह सिर्फ रूह होती है। सिर्फ रूह। और हजारों किलोमीटर दूर होकर भी नीलाभ से लिपट जाती है। … तो वह फिर चली आई है। यहां नीलाभ का बदन दहक उठा है। वह चीख पड़ा, गिल्लू बाथरूम में कपड़े रख दे। आज बहुत गर्मी लग रही है। कुछ पलों बाद वह शॉवर के नीचे था। बदन पर ठंडे पानी की अनगिनत धार बह रही है। तन में जैसे आग लगी हो और वह बुझ नहीं रही। एक भांंप सी उठ रही है। एक स्त्री की रूह से लिपटा पुरुष पानी हो जाता है या फिर आग। उसे दहकते हुए या उसे बर्फ सा पिघलते हुए किसने देखा है?

आधा घंटा हो गया नीलाभ बाथरूम से निकला नहीं है। गिल्लू ने आवाज दी, साब क्या सारा पानी आज ही खत्म कर देंगे? कितनी देर हो गई। जल्दी निकलिए। लंच तैयार है। आफिस का टाइम हो गया ना साब। गिल्लू की आवाज सुन नीलाभ अपनी दुनिया में लौटा। अनामिका उसे अपना कमनीय स्पर्श देकर गुम हो चुकी है। वह तौलिए से बालों को रगड़ते हुए झटके से बाहर निकला। सामने गिल्लू ने देखा तो उसकी आंखें फटी रह गई- साब जी पजामा तो पहन लेते। नीलाभ कमरे की ओर दौड़ा। अरे आज क्या हो गया है मुझे…। क्या सुध-बुध खो बैठा हूं मैं।

लंच करते समय गिल्लू ने फिर पूछा साब जी आजकल बहुत सोचते रहते हो। खयालों में खोए रहते हो। इस पर नीलाभ ने कहा, कुछ नहीं गिल्लू। बस काम का दबाव बढ़ गया है इन दिनों। तू मेरी चिंता मत कर और टीवी ऑन कर। सुबह का बुलेटिन देख लूं। पता चल जाए कि दफ्तर में कौन क्या कर रहा है। … खबरें आ रही है- दिल्ली में फेज वाइज लॉकडाउन हटाया जा रहा है। लोगों की दिक्कतें देखते हुए मेट्रो आज से ही शुरू हो रही है। मगर आधी सवारियों के साथ। कुछ दुकानें भी खुलेंगी। गिल्लू जरा गोपाल को फोन कर दे कि आज लेने के लिए न आए। वह सेक्टर-16 स्टेशन के बाहर मिल ले। आज मेट्रो से ही जाने का मन है।

…. उधर स्वीमिंग पूल से निकल कर अनामिका ने सोने सी अपनी काया को निहारा। वह खुद पर मुग्ध हो उठी है। मुग्धा नायिका क्या ऐसी ही होती है? वह अपनी अदा से ही नहीं, अपनी देह पर भी इतराती है। अनामिका वहीं फ्रूट जूस लेकर बैठ गई है। धरती के लिए अपने प्रेम की लाली लेकर उगते सूर्य को वह देख रही है। उसके बंगले से कुछ ही दूर समंदर का जल लाल हो उठा है। … नायिका विरह में डूबी हो तो उसे खुद का भी ख्याल नहीं रहता। वह प्रेम अगन में नदी बन जाती है। वह अपने नायक को नेह से सराबोर कर देती है। मगर शीतल जल में खुद दहकती है। किसी के साथ कल्पना में भी बरसों जी लेती है। वह कहीं नहीं होती फिर भी वो अपने प्रिय के आसपास होती है। यही रूहानी प्यार है। ऐसे प्यार को कितने लोग जीते हैं?

मेट्रो स्टेशन के दरवाजे खोल दिए गए हैं। नियमों का पालन करते हुए यात्री प्लेटफार्म पर पहुंच रहे हैं। नीलाभ जब मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों पर पहुंचा तो ट्रेन आने की उद्घोषणा हो रही थी। अब कौन भाग कर पकड़े। आराम से जाऊंगा, उसने सोचा। सब कुछ शांत है। दिल्ली को फिर से दिलवाला बनने में अभी समय लगेगा। महामारी के डर से लोग कम ही निकल रहे हैं। सीढ़ियों से ऊपर पहुंचने पर देखा कि प्लेटफार्म पर गिनती के यात्री हैं। एक अजीब सन्नाटा है जिसे वहां मंडराते हुए कुछ कबूतर तोड़ रहे हैं।

हुडा सिटी सेंटर की मेट्रो आने की घोषणा हो रही है। स्टेशन की सबसे ऊंची मंजिल और अंतिम छोर पर ठंडी हवाएं नीलाभ के गालों को थपथपा अपना प्यार जता रही हैं। ठीक वैसे ही जैसे अनामिका कभी उसे हौले से थपथपा देती थी और मौका पाकर कानों को चूम लेती थी। वह इतनी क्यों याद आ रही है। क्या वो मुझे याद आ रही है बार बार? नीलाभ ने एक पल के लिए सोचा। … महीनों बाद धुली-पुछी चमचमाती मेट्रो हवा के एक झोंके के साथ प्लेटफार्म पर आ गई है। दरवाजे खुल रहे हैं। अंतिम कोच की ओर नीलाभ के कदम बढ़ चले हैं। कोच में शीतलता से भरी शांति है। गिनती के यात्री एक सीट छोड़ कर बैठे हैं। वह हमेशा की तरह कोने की सीट पर बैठ गया। तभी मोबाइल फोन का स्क्रीन चमक उठा-अनामिका कॉलिंग।

तुम सोई नहीं? नीलाभ ने पूछा। नाह…नींद नहीं आ रही है, अनामिका ने कहा, खिड़की से आती समंदर की लहरों की आवाज कहां सोने देती है। दिल में उठती लहरें गिनती रहती हूं। ….नीलाभ ने उसकी बात सुनते हुए आंखें मूंद ली हैं। उसका मन स्थिर है। इधर मेट्रो अपनी रफ्तार से भाग रही है। उसका मन भी सुरंग से दौड़ता हुआ अनामिका तक पहुंचने के लिए आतुर हो उठा है। सचमुच उसके पास जाने का मन करता है। मगर खयालों में ही। सच यह है कि जिंदगी की जड़ें यहीं पर हैं। इसे छोड़ने के नाम पर ही घबराहट होती है। क्या वह एंग्जाइटी डिसआॅडर का शिकार हो गया है? तुम क्यों नहीं चली आती यहां।

… क्या सोचने लगे आप? उसने खामोशी तोड़ी। कुछ नहीं, नीलाभ ने जवाब दिया। यार तुम आ जाओ न यहां। तुम आ जाओगी तो मेरे चेहरे पर फिर से मुस्कान लौट आएगी। धीरे से उसने कहा। … क्या करूंगी आकर। कितना करप्शन है वहां। अस्पताल खोलने का मन था। मगर इरादा छोड़ दिया। वहां तो हर आदमी को घूस चाहिए। सिस्टम में सारे वही लोग हैं। मरते हुए मरीजों के लिए भी लोग दवाइयों और आॅक्सीजन की कालाबाजारी कर रहे हैं। ये कैसी धरती हो गई है, जिस पर हम गर्व किया करते थे। देवियों की धरती पर स्त्रियों से अत्याचार? उफ ….. और वह बोलती रही।

नीलाभ ने पूछा, कब तक जागती रहोगी? उसने कहा, नींद नहीं आ रही तो क्या करूं। कल सिर्फ ओपीडी में मरीजों को देखना है। मैं सोती कहां हूं। इमरजंसी कॉल तो रात में भी आ जाती है। इसलिए नींद भी कहां आती है। जागती रहती हूं। कुछ पढ़ रही हूं। पूछिएगा कि नहीं कि क्या। अपनी आंखें बंद किए नीलाभ ने पूछा, क्या भला। उसने हंसते हुए कहा- कामसूत्र। … ये पढ़ कर क्या करोगी तुम, नीलाभ ने अचकचा कर पूछा तो वह बोली, कुछ नहीं, खुश रहने का यह भी एक बहाना है। बोलिए है कि नहीं? हर पुरुषार्थ को जी लेना चाहती हूं। अगर मोक्ष हमारी मंजिल है तो धर्म उसका मार्ग है। इस मार्ग पर चलते हुए अर्थ को हासिल किया है। … तो अर्थ के साथ काम भी तो पाथेय है। काम से मुक्ति कहां है? यूं कहूं कि इसी के बाद मोक्ष है तो गलत नहीं। हमारी परंपरा में इन चारों का समन्वय है। इन चारों को निभा कर ही मुक्ति मिलती है न नीलाभ।

वात्स्यायन को पढ़ कर दुनिया की कोई भी स्त्री तन-मन से संपूर्ण नारी बन जाती है। और पुरुष- एक कंपलिट मैन। ऐसा मैं अब सोचती हूं। अनामिका बोले जा रही है।
…किसी अहसास को अपनी कल्पना से जोड़ कर कोई स्त्री युगों तक किसी का इंतजार कर सकती है। उसकी याद में जी सकती है। मैं भी जीती हूं। अपने मन के आकाश में, जहां नीली आभा के साथ आप भी संग होते हैं। तब समंदर के पानी पर चलते हुए गलैक्सी तक की सैर कर आती हूं नीलाभ। अनामिका की बहकी-बहकी बातों में खोए हुइ मेट्रो के कई स्टेशन निकल गए हैं। जाने कितनी बार दरवाजे खुले और बंद हो गए। वह अमानिका की भावुकता भरी बातों में जीता रहा। नीलाभ उसकी बातें सुन कर चकरा गया। इतनी गूढ़ बातें कैसे सोचने लगी है अनामिका?

उसने पूछा, ये सब कब पढ़ लिया तुमने? … कॉलेज की पढ़ाई के समय ये सब बातें समझ नहीं आती थी। बरसों बाद जब दिल्ली से लौट रही थी तो वेद, पुराण और उपनिषद संबंधित साहित्य के साथ वात्स्यायन की पुस्तक भी ले आई थी। मगर पढ़ नहीं पाई। अब किसी रात नींद नहीं आती तो पढ़ लेती हूं। स्त्री-पुरुष संबंध और उसके मनोविज्ञान को समझने के लिए इससे बेहतर कोई पुस्तक नहीं। आप तो मुझ से बेहतर जानते हैं। एक पल रुक कर उसने पूछा। …. कहां इतनी फुर्सत इसे पढ़ने की। और मुझ में कितनी समझ है, ये तुम बेहतर जानती हो, नीलाभ ने जवाब दिया।

तो चले आइए मिल कर समझते हैं। मिल कर जीते हैं। बहुत कमा लिया। बहुत पढ़ लिया। मोनोटोनस लाइफ से थक गए। चलिए लोगों की सेवा में जुटते हैं। समाज को जागरूक करते हैं। हर एक पल को साथ जीते हैं, नीलाभ। वह बोले जा रही है। …नीलाभ के पास कोई जवाब नहीं। उसकी बात को काटना मुमकिन नहीं। मेट्रो कोच में उद्घोषणा हो रही है। अगला स्टेशन राजीव चौक है। दरवाजे दायीं ओर खुलेंगे। अनामिका ने कहा, आपका स्टेशन आ गया। मगर के जिंदगी के किस स्टेशन पर आप मिलेंगे। कब हम दोनों नया सफर शुरू करेंगे नीलाभ। सुनिए मैं साथ बैठ कर अपनी आंखों आगे उगते हुए सूर्य को देखना चाहती हूं। बिल्कुल पास से गुजरते हुए चांद को देखना चाहती हूं।

मेट्रो प्लेटफार्म पर पहुंच गई है। लास्ट कोच के दरवाजे खुल गए हैं। … अनामिका से उसने कहा, हम वो सब जरूर जियेंगे। तुम अपनी आंखों में चांद भर लेना और मैं अपनी आंखों में सूरज। नीलाभ को फिल्म डॉ विद्या की नायिका की याद आ रही है जिसे नायक एक साधारण महिला समझता था। उससे बात करने में भी हिचक होती थी। मगर वही विद्या एक दिन डाक्टर बनती है और दुर्घटना में घायल हुए नायक का आपरेशन कर उसकी जान बचाती है। अनामिका तुम अपनी विद्या के कारण डॉ विद्या से आगे चली गई हो। … प्लेटफार्म नंबर चार की ओर जाने के लिए सीढ़ियों पर चढ़ते समय नीलाभ के चेहरे पर मुस्कान तैर गई है। वह गुनगुना उठा-

ऐ दिल-ए-आवारा चल
फिर वहीं दोबारा चल
यार ने दीदार का वादा किया है।

क्या नीलाभ की अनामिका से दोबारा मुलाकात होगी? कौन जाने? आप ही बताइए।

अगर आप ‘द लास्ट कोच’ की बाकी कड़ियां पढ़ना चाहते हैं तो यहां क्लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 कव‍िता: भार तो केवल श्वासों का है
2 कविता: डरा हुआ आदमी
3 तंगदिल निकले सारे नायक
ये पढ़ा क्या?
X