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विज्ञान और जीवन: अमरता की खोज

अमरता की संभावना ने एक ओर उत्कट उत्तेजना, तो दूसरी ओर धर्म, दर्शन और नीतिशास्त्र जैसे कई क्षेत्रों में व्याकुलता भी पैदा कर दी है। कारण कि इन क्षेत्रों की अब तक की आधारभूत माने जाने वाली सरंचनाएं या तो ध्वस्त हो जाएंगी या फिर उनमें आमूलचूल उथल-पुथल होगी।

अमरता देवताओं का विशेषाधिकार है और मानव जाति का महानतम स्वप्न। महाभारत में अश्वत्थामा या लोक महाकाव्य ‘आल्हा’ में आल्हा की अमरता के किस्से मिलते हैं।

पिछले कुछ दशक में विज्ञान के क्षेत्र में बहुत तेजी से विकास हुआ है। इसके चलते जीवन में सुविधा के बहुत सारे संरजाम जमा हो गए हैं। कई मामलों में विज्ञान ने प्रकृति को चुनौती भी दी है। यहां तक कि असंभव मानी जाने वाली अमरता यानी मृत्यु पर विजय भी संभव होती दीख रही है। पर जितनी तेजी से जीवन में सुविधाएं बढ़ी हैं, उतनी ही तेजी से मूल्यों का क्षरण भी हुआ है। सांस्कृतिक विघटन बढ़ा है। मनुष्य की संवेदना कुंद हुई है। इस तरह विज्ञान के चलते आई आधुनिकता को नए सिरे से प्रश्नांकित किया जाने लगा है। इस बार की चर्चा इसी पर। – संपादक

अमरता देवताओं का विशेषाधिकार है और मानव जाति का महानतम स्वप्न। महाभारत में अश्वत्थामा या लोक महाकाव्य ‘आल्हा’ में आल्हा की अमरता के किस्से मिलते हैं। जवानी के झरने के किस्से मिलते हैं, जिसका पानी पीने से बूढ़ा व्यक्ति जवान हो जाता था। पर तथ्य है कि प्राणी योनि में जन्मे किसी को भी अभी तक मौत ने नहीं बख्शा है। पर आधुनिक विज्ञान की शोध परियोजनाओं की मानें तो 2045 तक अमरता का स्वप्न साकार हो जाएगा। कंप्यूटर वैज्ञानिक रेमंड कुर्तज्वेल और ब्रितानी वैज्ञानिक औब्रे द ग्रे ने ‘सिंगुलैरिटी’ परियोजना पर काम शुरू किया और कहा है कि सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो 2045 तक मनुष्य के मौत जैसी वस्तु नहीं रहेगी और ऐसा होने पर मनुष्य की एकवचनता की स्थिति बनेगी।

यह संभव कैसे होगा? इसका उत्तर दर्शन और आधुनिक विज्ञान में मिलता है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। परिवर्तन में वस्तु अपने मूल स्वरूप और स्थान से दूर जाती है और वह जितनी ही दूर जाती है उतना ही उसमें ‘डीजनरेशन’ होता है। प्लेटो के चिंतन में यह बात ‘ड्रिफ्ट’ के विचार के रूप में आती है। मानव शरीर के बारे में भी यह बात लागू होती है। मानव शरीर कोशिकाओं से बना है। कोशिकाएं बनती-मरती रहती हैं। उनके स्वास्थ्य पर मनुष्य का स्वास्थ्य निर्भर करता है। जन्म से बुढ़ापे तक कोशिकाओं के जन्म और मौत का खेल चलता रहता है और मानव शरीर इस खेल का मैदान होता है। कोशिकाओं के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में कमी का नाम बुढ़ापा है, जो आखिरकार मौत का कारण बनता है। इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर अगर इसे रोका जा सके तो बुढ़ापे और मौत को टाला जा सकता है। ऐसा बारबार करने से चिर युवा रहा जा सकता है। चिर युवावस्था मौत को मात है, जिसे मौत की ‘मौत’ कहा जा सकता है।

पर सवाल है कि कोशिकाओं के ह्रास या मौत को रोका कैसे जाए? इस प्रक्रिया में सार्थक हस्तक्षेप के बगैर यह संभव नहीं है। चूंकि मानव-शरीर की रचना में डीएनए की बड़ी भूमिका होती है इसलिए डीएनए की प्रक्रिया में बदलाव जरूरी है। अब तक माना जाता था कि मानव डीएनए अपरिवर्तनशील है, पर कंप्यूटर विज्ञान, नैनो-टेक्नोलाजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में आई क्रांति ने यह संभव बना दिया है। कंप्यूटर की प्रोसेसिंग क्षमता आज इतनी तेज हो गई है कि न केवल डीएनए की डिकोडिंग की जा सकती है, बल्कि उसे पीछे भी किया जा सकता है। इसलिए अगर कोई व्यक्ति पैंसठ वर्ष का है और उसका डीएनए दस साल पीछे किया जाए तो वह पचपन का हो सकता है। व्यक्ति के अवयवों और उसकी कोशिकाओं के स्वास्थ्य का उसके युवा या बूढ़े होने से सीधा संबंध है। जितनी कोशिकाएं पुनरुत्पादित की जा सकेंगी उसी अनुपात में वह बुढ़ापे और परिणामस्वरूप मौत से दूर होता चला जाएगा। इससे अमरता न केवल संभव बनेगी, बल्कि मनुष्य के पास अमरता एक विकल्प के रूप में होगी।

‘सिंगुलैरिटी’ परियोजना के वैज्ञानिकों के अलावा दो और जेनेटिक इंजीनियरिंग वैज्ञानिक इस दिशा में काम कर रहे हैं। एक हैं वेनेजुएला के स्पेनिश परिवार में जन्मे जोस लूई कोर्डेलो और दूसरे हैं कैंब्रिज के गणित वैज्ञानिक डेविड वुड। दोनों ‘सिंबियन’ कंप्यूटर आॅपरेटिंग सिस्टम के संस्थापक हैं। अभी हाल में प्रकाशित अपनी किताब ‘द डेथ आॅफ डेथ’ में उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि अमरता वास्तविक है और वैज्ञानिक रूप से 2045 तक या उससे पहले भी संभव है। उनके अनुसार अमरता की चाभी नैनो टेक्नोलोजी में है, जिसके साथ अन्य नई जेनेटिक मैनिप्युलेशन तकनीकों का प्रयोग किया जा रहा है।

इसकी प्रक्रिया में बुरी जींस को स्वस्थ जींस में बदलना, मरी हुई कोशिकाओं को निकालना, क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की मरम्मत करना, स्टेम सेल्स के द्वारा उनका इलाज और थ्री-डी तकनीक द्वारा महत्त्वपूर्ण अंगों की प्रिंटिंग शामिल हैं। वे मानते हैं कि बुढ़ापा (‘एजिंग’) क्रोमोजोम में उपस्थित ‘टेलोमरेस’ के नाम से जानी जाने वाली डीएनए ‘टेल्स’ का परिणाम है। इसमें से रेड ब्लड सेल और सेक्स कोशिकाओं के अलावा हर सेल के तेईस जोड़े होते हैं। समय के साथ ‘टेलोमरेस’ छोटे होते चले जाते हैं और क्षतिग्रस्त भी। प्रदूषण, धूम्रपान या मदिरापान और गलत जीवन पद्धति के चलते यह प्रक्रिया और तेज हो जाती है और ‘एजिंग’ की भी। पर आज की अतिविकसित तकनीक की मदद से इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप करके उसे पीछे करते हुए ‘टेलोमरेस’ को लंबा किया जा सकता है और कोशिकाओं की मरम्मत या फिर उनके ‘रीजनरेशन’ से बुढ़ापे को रोका जा सकता है और मौत को भी।

विज्ञान की नजर में बुढ़ापा एक बीमारी है। कोर्डेलो और वुड का कहना है कि आज जरूरी है कि बुढ़ापे को ‘बीमारी’ घोषित किया जाए, ताकि इससे संबंधित शोध परियोजनाओं के लिए जरूरी वित्तीय व्यवस्था हो सके। उनके अनुसार इससे जापान या कोरिया जैसे देशों और उनकी नस्लों को बचाने में मदद मिलेगी। इन देशों में कम बच्चे पैदा करने की प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुए कहा जा रहा है, क्योंकि अगर ऐसा ही चलता रहा तो आने वाली लगभग दो सदी में पृथ्वी नामक उपग्रह पर कोई जापानी या कोरियाई नहीं बचेगा। पर अति-उच्च वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी के चलते मौत की ‘मौत’ के बाद वे बने रहेंगे।

अमरता के विकल्प की संभावना ने एक ओर उत्कट उत्तेजना, तो दूसरी ओर धर्म, दर्शन और नीतिशास्त्र जैसे कई क्षेत्रों में व्याकुलता भी पैदा कर दी है। कारण कि इन क्षेत्रों की अब तक की आधारभूत माने जाने वाली सरंचनाएं या तो ध्वस्त हो जाएंगी या फिर उनमें आमूलचूल उथल-पुथल होगी। धर्म और नैतिकता की दुनिया एक केंद्र (ईश्वर/ अच्छाई) और उससे संबंधित स्थिर संरचनाओं (दानव-दैत्य, स्वर्ग-नर्क, पुण्य-पाप, अच्छा-बुरा, नैतिक-अनैतिक आदि) पर टिकी हुई है। बीसवीं सदी के छठे दशक में उभरे उत्तर-सरंचनावाद के सिद्धांत ने केंद्र और संरचनाओं की विभावनाओं के सामने सवाल उठाए थे, पर उनके विसंरचित या ध्वस्त होने के बावजूद आज भी वे व्यवहार में हैं और इसी कारण धर्म और नैतिकता के ठेकेदारों का कारोबार चल रहा है।

अगर विज्ञान के कारण व्यक्ति की अमरता, एकवचनता या मौत की ‘मौत’ जैसी परियोजनाएं हकीकत बन जाती हैं, जिसकी पूरी संभावना है, तो इन धंधों का क्या होगा? धर्म की दुनिया ईश्वर की धुरी पर टिकी है जो सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और सर्वत्र है; सबकी सृष्टि करता है और मृत्यु निश्चित करता है। व्यक्ति की अमरता के बाद मौत ईश्वर की इच्छा या आज्ञा न होकर व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर होगी। ऐसे में मंदिर, मस्जिद और गिरजाघरों का क्या होगा? बहु-ईश्वरवादी धर्म का तो काम चल जाएगा, क्योंकि उसमें नए ईश्वर बनाने की जगह है और कुछ नहीं तो अमरता की प्रौद्योगिकी को ही ईश्वर की जगह दे देंगें। पर एकेश्वरवादी धर्म क्या करेंगें, यह सोचने की बात है।

इस परियोजना का विरोध भी कम नहीं है। सौंदर्य-प्रसाधन उत्पादक कंपनियां (जो उम्र ढकने का नाटक कर चिर-यौवनता का सपना दिखा कर अपना धंधा चलाती हैं), दवा उद्योग भी इसी तर्क के आधार पर पनपता है। इस परियोजना की सफलता से उनके हितों को नुकसान हो सकता है। अमरता की परियोजना की राह में परंपरागत सोच और वैसी ही कानून-व्यवस्था भी रोड़े अटका रही है। केवल कोलंबिया में इसे गैर-कानूनी नहीं माना गया है, इसलिए अमेरिका और इंग्लैंड के वैज्ञानिक वहीं पर मानव प्रयोग कर पा रहें हैं; और निश्चित समय-सीमा और अपेक्षानुसार वे सफल हो रहे हैं। शुरू में प्रौद्योगिकी आधारित यह परियोजना महंगी होगी, पर जैसे-जैसे ज्यादा लोग इसका उपयोग करेंगे और प्रौद्योगिकी का विकास होगा, अमरता का विकल्प सस्ता और सुलभ होता जाएगा। संभव है कि इंटरनेट कैफे की तरह ‘सेल रीजनरेशन कैफे’ खुलें और लोग फीस भर कर उसका लाभ उठाएं।

इस परियोजना की सफलता के साथ तथाकथित नैतिकता की दुनिया में भी उथल-पुथल आएगी। कुछ लोग इसे जीवन की प्राकृतिक प्रक्रिया में अनैतिक हस्तक्षेप मान कर विरोध करेंगे। चूंकि यह परियोजना अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी पर निर्भर होगी, इसलिए इसके लिए काफी ऊंची कीमत अदा करनी पड़ेगी। जरूरी रकम गरीबों या मध्यवर्ग के वश की बात नहीं होगी। इसलिए तस्कर, भ्रष्ट नेता, नौकरशाह और मूल्यहीन उद्योगपति ही इसका लाभ उठा पाएंगे। पहले अमरता सत्कार्यों या पुण्य से मिलती थी, पर अब वह पैसे से मिलेगी, जिसके लिए साधन की शुद्धता जरूरी नहीं होगी। उत्तर-संरचनावाद ने नैतिकता और मूल्यों को सापेक्ष बनाया था, पर अब वे अपने संदर्भ-बिंदु के अभाव में अर्थहीन होकर खो जाएंगे।

विडंबना यह है कि अमरता भार भी बन सकती है। स्वर्ग में अमरता का राज है पर वहां अमरता की कीमत चुकानी पड़ती है। संस्कृत में व्यंग्य में कहा गया है कि इंद्र देवताओं का राजा तो है, पर उसके नसीब में छाछ नहीं है, क्योंकि स्वर्ग में हर चीज अमर है, इसलिए दूध का दही बन नहीं सकता तो इंद्र को छाछ कहां से मिले। ग्रीक मिथक में सिबिल को वरदान में अमरता मिली थी, पर जब उससे पूछा गया तो बोली कि वह मौत चाहती है, क्योंकि वह जीवन से उकता गई है।

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