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किताबें मिलीं: ‘कलम के सेनापति’, ‘भोर के अंधेरे में’ और ‘भारतीय मुसलमान: इतिहास का संदर्भ’

परिचित पत्रकार और संपादक आलोक मेहता की पुस्तक ‘कलम के सेनापति’ भारतीय पत्रकारिता की भीतरी दुनिया का वह दर्पण है, जिसमें हम सन 1970 के बाद से अब तक की सबसे प्रामाणिक छवियां देख सकते हैं।

Author July 1, 2018 3:18 AM
परिचित पत्रकार और संपादक आलोक मेहता की पुस्तक ‘कलम के सेनापति’ भारतीय पत्रकारिता की भीतरी दुनिया का वह दर्पण है, जिसमें हम सन 1970 के बाद से अब तक की सबसे प्रामाणिक छवियां देख सकते हैं।

कलम के सेनापति

परिचित पत्रकार और संपादक आलोक मेहता की पुस्तक ‘कलम के सेनापति’ भारतीय पत्रकारिता की भीतरी दुनिया का वह दर्पण है, जिसमें हम सन 1970 के बाद से अब तक की सबसे प्रामाणिक छवियां देख सकते हैं। इसका कारण यह है कि आलोक मेहता स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की हिंदी-अंग्रेजी पत्रकारिता के बीच एक मजबूत पुल की तरह अनुभव रखते हैं। उनके पास जीवंत और अपनी आंखों देखे और भोगे ऐसे विलक्षण अनुभवों का खजाना है, जिसे पढ़ कर न सिर्फ नए तथ्यों से परिचित होने का मौका मिलता है, बल्कि कई बार हैरानी भी होती है।

आलोक मेहता को पत्रकारिता में करीब पचास साल हो गए। इस दौरान उनका कई नामचीन, साहसी और दूरद्रष्टा पत्रकारों-संपादकों से मिलना-जुलना, उनके साथ उठना-बैठना, अनुभवों को साझा करना, समस्याओं पर राय बनाना होता रहा। आलोक मेहता खुद कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं के संपादक रह चुके हैं और समाज और राजनीति के अनेक उतार-चढ़ावों का साक्षी रहे हैं। इसलिए इस किताब में उनके अनुभव बहुत पके हुए रूप में और गहरी अंतर्दृष्टि के साथ उतरे हैं। इस पुस्तक में कदम-कदम पर खतरे उठाने वाले एस. निहाल सिंह और शक्ति से शिखर तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वले कुलदीप नैयर के बारे में रोचक और अनुकरणीय वाकये हैं। निशानेबाज से निपटने की हिम्मत रखने वाले हिरणमय कार्लेकर, हर झंझावात के बाद एक नई कश्ती खेने वाले एचके दुआ और मालिक या श्रमजीवी पत्रकार बनने का अर्थ जीने वाले मामेन मैथ्यू के बारे में रोचक किस्से और अनुभव हैं कि कैसे इन लोगों ने एक नया इतिहास रचा।

जिम्मेदार पत्रकारिता को समझने वाले राजेंद्र माथुर, मीडिया को संचालित करने की समझ रखने वाले मनोहर श्याम जोशी, निर्भीकता को जीवन-मूल्य बना लेने वाले हरि जयसिंह तथा प्यार और नफरत के बीच एक मस्त ठिकाना देने वाले सईद नकवी से करीब से मिलना हो या नई राहों की तलाश करती मधु त्रेहन, निष्पक्षता की कीमत समझने वाले माधवदास नलपत और सरकारी खजाने में कलम की चाबी की जगह की परख रखने वाले संजय बारू को समझना, यह पुस्तक एक दोस्त की तरह बड़ी गरमजोशी से हर किसी से मिलवाती है।

यहां रुपहले परदे पर कलम की छाप छोड़ने वाले अरविंद कुमार से भी मुलाकात होती है, तो राजनीतिक लोगों से आत्मीय संबंध निर्वाह के बावजूद उन पर तेज-तर्रार लेखन करने वाले अच्युतानंद मिश्र, पत्रकारित की अपनी शान बरकरार रखने वाली शीला झुनझुनवाला, विनम्रता सहित निष्पक्ष साख के धनी विश्वनाथ सचदेव और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की नई चुनौती को समझने वाले राघव बहल से भी। व्यक्तियों पर संस्मरण लिखना जोखिम का काम है, पर आलोक मेहता ने उसकी परवाह करते हुए बड़े बेबाक अत्मीय ढंग से इस पुस्तक में अपने सहयात्री और वरिष्ठ जनों के व्यक्तित्व को ईमानदारी से उकेरा है तो पत्रकारिता के कोनों-अंतरों में भी पैनी नजर दौड़ाई है।

कलम के सेनापति : आलोक मेहता; सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 695 रुपए।

भोर के अंधेरे में

वस्था के खौफनाक मंजर को चीरता कवि श्यौराज सिंह बेचैन का पांचवां कविता संग्रह ‘भोर के अंधेरे में’ पढ़ना एक सुखद अहसास से भर जाना है। सामाजिक सरोकार से सराबोर ये कविताएं दलित दर्द का जिंदा इतिहास हैं। मानो इनके काव्य इतिहास ने यह मुनादी कर दी हो कि दलित इस देश के सेवक ही नहीं, बल्कि नैसर्गिक स्वामी भी हैं। ये कविताएं स्थितियों से पलायन नहीं करतीं, मुठभेड़ करती है। भारत की मूल निवासी दलित जनता की चित्तवृत्ति का जैसा आकलन इन कविताओं के द्वारा हुआ है वैसा अन्यत्र मिलना दुर्लभ है।

जिस बहिष्कृत भारत को अस्पृश्य बना कर सभ्यता से बाहर जंगल की ओर और गांव के बाहर खदेड़ दिया गया था, यों उसका अस्तित्व ही लुप्तप्राय हो गया था, वह कवि की कविता में आकर जीवंतता के साथ मुखरित हुआ है। यह विश्व साहित्य में लोकतांत्रिक चेतना की बड़ी घटना है। कवि ने लगातार नया रचा है, पर उसने अपने अतीत की डोर नहीं छोड़ी है। बहुमुखी असमानताओं से बेचैन कवि ‘भोर के अंधेरे में’ एक ऐसा शीर्षक देता है, जो रैदास के निर्वर्ण संप्रदाय, कबीर के निर्गुण और फुले, आंबेडकर के समातमूलक आधुनिकताबोध के बगैर संभव नहीं है।

कवि बड़ा सपना देखता है, जिसमें लोकतंत्र ही कविता में फूलता-फलता है। कवि को लगता है कि स्वराज रूपी भोर भी उसके लोगों के लिए नहीं है। खासकर दलित-वंचित के लिए भोर में भी अंधेरा है, आजादी में भी गुलामी है, यही श्योराज सिंह बेचैन के पूरे काव्य कर्म का निचोड़ है, सारतत्व है और यह कवि की समूची बेचैनी का सबब और केंद्रीय समस्या है। वह अस्पृश्यता रहित स्वतंत्रता का सपना देखता है।

भोर के अंधेरे में : श्यौराज सिंह बेचैन; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 395 रुपए।

भारतीय मुसलमान: इतिहास का संदर्भ

भारत और पाकिस्तान का विभाजन हमारे लिए हिंदू और मुसलमान का विभाजन नहीं था, पाकिस्तान के लिए भले यह हिंदू-मुसलमान का विभाजन था। बाद में पाकिस्तान के मेंटर बने मौलाना मौदूदी के लिए और उन जैसों के लिए बेशक यह हिंदू-मुसलमान का बंटवारा रहा हो, मगर भारत के लिए यह सह-अस्तित्व था, सहजीवन और मुसलिम कौम की कट्टरता का विभाजन था। मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी हमेशा हठीले अंदाज में चीख-चीख कर कह रहे थे कि मुसलमान किसी दूसरी कौम के साथ रह ही नहीं सकता। अल्लामा इकबाल ऐसा ही सोचते थे। मुसलिम कौम का एक बड़ा तबका बिल्कुल ऐसा ही सोचता था।

इस हठीली मुसलिम कौम की एकरेखीय सोच के समानांतर विकसित हुई सहजीवन शैलीवाली साझी संस्कृति की गंगा-जमुनी धारा भी बहती चली आ रही थी- हजारों साल वाली सोच। वह हठीली धारा के प्रतिपक्ष में अपने हिस्से का वारिस होने वाली थी। एक विशाल मुसलिम आबादी ने महान विरासत वाली साझी संस्कृति की सोच का चयन किया। पाकिस्तान ने सोचा, उसने हिंदू-मुसलमान का बंटवारा कर लिया। भारत ने कहा, यह तो साझी संस्कृति की सोच वाले मुसलमानों का बंटवारा हुआ। भारत-पाकिस्तान का विभाजन तात्त्विक और मूल्यगत स्तर पर मुसलमानों का मुसलमानों के बीच बंटवारा बन गया। इस तात्त्विक और मूल्यगत विभाजन ने पाकिस्तान को एकदम से बौना कर दिया। कायदे-आजम जिन्ना के मरते ही वह झीना आदर्श भी फट-फूट गया, जिसमें वे कहते थे कि हिंदू शासित धर्मनिरपेक्ष और साझी संस्कृति की विरासत वाला भारत एक ओर और मुसलिम शासित धर्मनिरपेक्ष साझी संस्कृति वाला पाकिस्तान दूसरी तरफ।

जिन्ना के जाते ही दशक भी न लगा, बल्कि उनके जीते-जी ही पाकिस्तान मौलाना अबुल आला मौदूदी वाली आकांक्षा के अनुरूप संकीर्णता में पूरी तरह ढल गया। एकरंगी, संकीर्ण और पिछड़ी सोच वाला पाकिस्तान। आज स्थिति सामने है। इसका मनोविश्लेषणात्मक अध्ययन इस पुस्तक में प्रस्तुत है। यह पुस्तक दो खंडों में विभक्त है।

भारतीय मुसलमान: इतिहास का संदर्भ (दो खंड) : कर्मेंदु शिशिर; भारतीय ज्ञानपीठ, 18, इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली; 700 रुपए (प्रति खंड)।

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