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लास्ट कोच: एक अनकही प्रेम कहानी

रास्ते में आ रहे सभी मेट्रो स्टेशनों के बाहर वीरानी छाई है। प्रवेश द्वार बंद कर दिए गए हैं। वहां कबूतर मंडरा रहे हैं। स्टेशन की घड़ी चल रही है। सभी पैनल ऑन हैं। प्लेटफार्म पर उदासी पसरी है। अमूमन ऐसा रात बारह बजे के बाद ही दिखता था। अब दिन में ही वहां से गुजरते हुए लोग देख रहे हैं। ...उधर, सड़कों पर दूर-दूर तक कोई नहीं दिखाई दे रहा। चंद सरकारी गाड़ियों और डाक तथा पार्सल वैन देख कर थोड़ी जीवंतता का अहसास होता है। कोरोना-काल में लेखक और पत्रकार संजय स्वतंत्र की लास्ट कोच शृंखला में पढ़िए नई कहानी।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

‘कहां हैं आप…?’ कॉल रिसीव करते ही बरस है पड़ी अपराजिता, ‘न कोई कॉल, न कोई खैर-खबर? मेरे लिए तो कभी फुर्सत ही नहीं रही आपको? और ये क्या, आपका तो लिखना-पढ़ना ही बंद हो गया इन दिनों। ऐसा क्यों?’ नीलाभ गुमसुम सुनता रहा। उसे बोलने तक का वह मौका नहीं दे रही। उसका गुस्सा शांत होने पर नीलाभ ने कहा- इन दिनों अपने मुख्य कार्यकारी अधिकारी का लिखा पढ़ रहा हूं। इस पर अपराजिता ने कहा, ‘हां बहुत बढ़िया लिख रहे हैं आजकल, पर आपने लिखना क्यों बंद कर दिया।’ ‘…देख रही हो न, इन दिनों क्या हाल है। आधे लोग घर से काम कर रहे हैं तो आधे लोग न्यूजरूम में डटे हैं’ नीलाभ ने जवाब दिया।

‘तो क्या आप अब भी आफिस जा रहे हैं? आपको अपनी परवाह नहीं? घर से भी तो काम कर सकते थे’ अपराजिता ने चिंता जताते हुए कहा। ‘…घर से कोई कितना काम कर सकता है, यह तुम्हें पता है न? इसलिए चला जाता हूं’, नीलाभ ने कहा तो अपराजिता ने फिर खिंचाई की, ‘तब तो आप देर रात ही लौटते होंगे। न खाने की चिंता न सेहत की फिक्र। अच्छा ठहरिए। मुझे आइएएस बन जाने दीजिए। आपको लेकर दूर चली जाऊंगी। मैंने तय कर लिया है मिजोरम, मणिपर और नगालैंड वाला नार्थ ईस्ट कैडर लूंगी। और वहीं अपने आउट हाउस में रखूंगी। और आपको लॉकडाउन कर दूंगी। फिर वहीं लिखिएगा आराम से। आपके लिए पृथकवास जरूरी है। और गरीबों की सेवा हम लोग करेंगे।’ वह भावुक हो गई है। ‘….पागल हो गई है यह लड़की? कलेक्टर का रुआब उस पर हरदम छाया रहता है…’ नीलाभ ने मन ही मन सोचा।

‘अरे, अच्छा याद दिलाया। तुम्हारा यूपीएससी इंटरव्यू कैसा गया?’ उसने पूछा तो अपराजिता ने जवाब दिया, ‘थोड़ा कम्पलिकेटेड था। मगर मैंने इंटरव्यू बोर्ड को सेटिसफाई कर दिया। और यह साबित करने की कोशिश की कि मैं बेहतर कैंडिटेट हूं।’ ‘…तो इसका मतलब सिविल सर्विस के लिए सेलेक्ट हो जाओगी’, नीलाभ ने कहा। इस पर अपराजिता का जवाब था, ‘देखिए क्या होता है। मगर कांफिडेंट हूं। फिर आपकी दुआएं भी तो साथ हैं। आपने पिता, भाई, और मित्र तीनों का धर्म निभाते हुए साथ दिया है। मेरे सखा है आप। मैं कुछ बन जाऊं तो आप हमेशा मेरे साथ रहेंगे। बहुत कर ली नौकरी। अब मेरी बारी…।’

… फ्लैट के नीचे चैनल की गाड़ी आकर खड़ी हो गई है। नीलाभ ने घड़ी की ओर देखा। साढ़े बारह बज रहे हैं। अब चलना चाहिए। ….नीलाभ ने पूछा, ‘तो अपराजिता ड्यूटी ज्वाइन करोगी या सीधे डीएम का पदभार संभालोगी ट्रेनिंग के बाद।’ उसने कहा, ‘आप जैसा कहिए। मैं तो सोच रही कि आराम कर लूं। बहुत थक गई हूं। और इस महामारी ने भी डरा दिया है। सुनिए आप भी छुट्टी ले लीजिए। मेरे पास आ जाइए। आपके कंधे पर सिर रख कर सोना चाहती हूं।’ नीलाभ ने उसे समझाते हुए कहा, ‘तुम सच में पागल हो गई हो। अभी सोने का वक्त नहीं। इन दिनों काम बढ़ गया है। मैं खुद साथियों को छुट्टी देने की हालत में नहीं हूं। और मैं छुट्टी लेकर बैठ जाऊं। ऐसे कैसे चलेगा। तुम तो चैनल में काम करती रही हो। तुम्हें सब सिस्टम पता है न?’ ‘अच्छा तो जाइए आप। रात में बात करती हूं आपसे’, अपराजिता ने निराश होते हुए कहा।

… नीलाभ फ्लैट को बंद कर सीढ़ियों से उतरने लगा है। ड्राइवर ने आगे बढ़ कर उसका बैग हाथ में ले लिया है। इस बीच नीलाभ ने दोनों हाथ में दास्ताने पहन लिए हैं। मास्क भी लगा लिया है। वह पीछे की सीट पर बैठ गया है। देर रात जगने की वजह से अभी तक थकान उतरी नहीं है। मगर सफर में पढ़ना तो जैसे उसकी आदत है। उसने बैग से अपना प्रिय अखबार निकाल लिया है। गाड़ी चल पड़ी है। रास्ते में कितना सन्नाटा है! भरी दोपहरी में कोई नहीं दिख रहा। एक तरफ सख्ती और दूसरी तरफ मौत का खौफ। सड़क पर जगह-जगह पुलिस अवरोधक। पुलिसकर्मी डाक्टरों, मीडियाकर्मियों और अन्य जरूरी सेवाओं से जुड़े लोगों की जांच कर उनकी गाड़ी जाने दे रहे हैं। नीलाभ ने कुछ देर के लिए आंखें बंद कर ली हैं। गाड़ी कब रुकी और कब रफ्तार के साथ चली, इस पर उसने ध्यान नहीं दिया है।

गर्मी बढ़ गई है। चालक ने एसी आॅन कर दिया है। …नीलाभ ने अखबार के पहले पेज पर नजर दौड़ाई है। सभी खबरें नाउम्मीद कर रही हैं। क्या हम सकारात्मक खबरों से अखबार नहीं निकाल सकते? क्या कोई ऐसा चैनल नहीं हो सकता जो सुबह से शाम तक दिलखुश खबरें चलाए। नीलाभ ने यह सोचते हुए सभी पन्ने पलट दिए हैं। सातवें पेज पर उसकी नजर कुनैन कथा पर ठहर गई है। सर का आलेख है। चीन खुद तो संकट से उबर गया मगर उसने अमेरिका, यूरोप और एशिया की अर्थव्यवस्था को हिला कर रख दिया है। क्या होगा इस दुनिया का। नौकरियां जाएंगी। गरीबों का जीना मुहाल हो जाएगा। मध्यवर्ग एक पायदान और नीचे चला जाएगा। सचमुच यह पूरी दुनिया के लिए कुनैन कथा है। गंभीर विषय है। अमेरिका की दादागीरी का पोस्टमॉर्टम करके रख दिया है सर ने। आलेख पढ़ते हुए नीलाभ खो गया है।

वैश्विक संकट की डेली रिपोर्ट डरा रही है। अमेरिका, इटली और स्पेन की खबरों से दिल बैठा जा रहा है। वो जो इस दुनिया को अलविदा कह रहे हैं, उनके बारे में सोच कर ही आंखें नम हो रही हैं। …सड़कों पर दूर-दूर तक कोई नहीं दिखाई दे रहा। चंद सरकारी गाड़ियों और डाक तथा पार्सल वैन देख कर थोड़ी जीवंतता का अहसास होता है। पुलिसकर्मियों को धूप से बचाने के लिए सड़क के किनारे सफेद तंबू तान दिए गए हैं। कॉलोनियों में कुछ न मिलने पर भूखे-प्यासे कुत्ते मुख्य सड़क पर भटकते दिख रहे हैं। फ्लाइओवर पर गलती से चला आया सांड़ बदहवासी में निवृत्त हो रहा है। तपती सड़क गीली हो गई है। उसके बगल से नीलाभ की कार गुजर गई है।

रास्ते में आ रहे सभी मेट्रो स्टेशनों के बाहर वीरानी छाई है। प्रवेश द्वार बंद कर दिए गए हैं। वहां कबूतर मंडरा रहे हैं। स्टेशन की घड़ी चल रही है। सभी पैनल आॅन हैं। प्लेटफार्म पर उदासी पसरी है। अमूमन ऐसा रात बारह बजे के बाद ही दिखता था। अब दिन में ही वहां से गुजरते हुए लोग देख रहे हैं। उफ ये कैसा दौर है।

तभी मोबाइल के मैसेज टोन ने नीलाभ का ध्यान खींच लिया है। यह अपराजिता का संदेश है-आफिस पहुंच गए आप? नीलाभ ने जवाब दिया, नहीं। दुनिया भर की खबरों को पढ़ते हुए दिल बैठा जा रहा है। अपराजिता का जवाब आया- आप मुझे खुद हौसला देते हैं। आज आपको क्या हो गया? तबीयत ठीक है न? ‘…कुछ नहीं। खबरों से मन उचट गया है। यूरोप और अमेरिका से आ रही खबरें डरा रही हैं’, नीलाभ ने जवाब दिया। इस पर अपरा ने स्माइली भेजते हुए लिखा- तो खबरें देखना बंद कीजिए। और आ जाइए मेरे पास। नीलाभ ने नाराज होते हुए लिखा- कैसी बात करती हो एक पत्रकार होकर। खबरें नहीं देखूंगा तो कैसे होगा काम। ‘अरे, आप तो नाराज हो गए’, अपराजिता का जवाब आया।

इसके बाद उसने ने कोई संदेश नहीं भेजा है। गाड़ी चली जा रही है। चालक गोपाल खामोश है। उसने भी मास्क लगा रखा है। क्या बात करें। दिन-रात ड्यूटी करके बेहाल है बेचारा। नीलाभ ने पूछा, ‘गोपाल सुबह नाश्ता कर लिया था तुमने? उसने सिर हिला कर हां में जवाब दे दिया है। आवश्यक सेवाओं की गाड़ियां चला रहे चालकों की सुध किसे है? कार दिल्ली-नोएडा सीमा पर पृथक लेन में पहुंच गई है। तभी अपराजिता का मैसेज मोबाइल के स्क्रीन पर चमक उठा है- आप गीत सुन रहे हैं गाड़ी में? सुनिए मूड ठीक रहेगा। मैं कुछ लिंक भेजती हूं। गीत सुनने से उदासी दूर हो जाती है।

नीलाभ ने कोई जवाब नहीं दिया। गाड़ी गोल चक्कर की ओर बढ़ चली है। अब अपराजिता अपनी एंकर वाली ड्रेस के साथ कान्हा की मूर्ति लिए प्रकट हो गई है वाट्सऐप पर। नीचे लिखा है- राधे-राधे… कैसी दिख रही हूं मैं? नीलाभ मुस्कुरा पड़ा उसकी मासूमियत पर। डीएम बनने का खवाब देखने वाली यह लड़की आज भी बच्ची की तरह हरकतें करती है। कब क्या करेगी कुछ पता नहीं। और वही हुआ कुछ देर में। कुछ देर में फिर उसका मैसेज- परितोष का बेस्ट सेलर काव्य संग्रह पढ़ रही हूं। पढ़ेंगे आप। ‘…अब ये क्या है? भेज दो पंक्तियां। पढ़ लूंगा’, नीलाभ ने जवाब दिया। अपराजिता मैसेज टाइप कर रही है-

पहला चुंबन वो नहीं
जो गाल गीले कर जाए
पहला चंबन वो है जो
सपने नीले कर जाए
पहला चुंबन वो नहीं
जिसके खयाल से दिल डर जाए
पहला चुंबन वो है
जिसे याद करो
और आंखें भर जाए
(* मन पतंग दिल डोर)

ये कहां पढ़ी तुमने? हैरत में पड़ गए नीलाभ ने पूछा। अपराजिता का जवाब- काव्य संग्रह मन पतंग दिल डोर में ये पंक्तियां हैं? ‘….तुमको यही अच्छी लगी? एक काम करो। तुम क्वॉरंटाइन में चली जाओ। मैं पृथकवास में जा रहा हूं। दफ्तर आ गया है। तुम्हारी बातों में पड़ा रहा तो काम नहीं कर पाऊंगा। बहुत सताती हो तुम।’ गुस्से वाली इमोजी के साथ नीलाभ ने झूठमूठ में डांटा। इस पर अपराजिता में धड़कते दिल वाली इमोजी भेज कर अपने भावों को व्यक्त कर दिया है। मगर नीलाभ के पास फुर्सत नहीं उसकी अनकही बातों को बूझने की। वह तो दिल में है। वहीं है समंदर सा प्रेम। वहीं डूबना है, वहीं मर जाना है। क्या रखा है इस जीने में जहां रोज मौत डरा रही हो…।

चैनल के गेट के पास कार खड़ी हो गई है। गार्ड ने दरवाजा खोल दिया है। दूसरे गार्ड ने सेनिटाइजर की बोतल आगे बढ़ा दी है। तीसरा गार्ड थर्मल स्क्रीनर गन से तापीय परीक्षण कर रहा है। बुखार नहीं है। उसने कहा-साहब सब ठीक है। …नीलाभ के कदम न्यूजरूम की ओर बढ़ चले हैं। केबिन में टेबल पर खाली टिफिन पड़ा है। कितने दिन हो गए मिठाई खाए। अपराजिता की मीठी अनकही बातें उसकी कजरारी आंखों में ही उमड़ती रहीं। क्योंकि कुछ रिश्तों में शब्द मौन होते हैं। वे समय से परे होते हैं, इसलिए रूहानी हो जाते हैं। अनकही प्रेम कहानी भी ऐसी ही होती है। वह बादलों पर विश्राम करती है और हवाओं में तैरती है।

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