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कविताएं: ‘बच्चे की जिद’, ‘संभव न्याय’, ‘मामूली इच्छा’ और ‘कटोरे में प्यास’

शंकरानंद की कविताएं

Author June 17, 2018 6:20 AM
दूर तक पानी खोजते पक्षी प्यास का भार उठाए थक गए

बच्चे की जिद

वे कहीं भी रहेंगे तो बोल देंगे
उनका होना छिप नहीं सकता किसी रहस्य की तरह
किसी जादू की तरह
या किसी भ्रम की तरह

वे इस पृथ्वी पर एक तारा हैं
या उगती हुई धूप, जो तमाम वर्जित जगहों पर
पड़ती है उसी अनुसार बराबर
वे पवित्र ओस हैं पारदर्शी
या किसी भी ऋतु में बारिश का पानी
या नरम हरी घास हैं वे
जिन्हें हर पाबंदी खल जाती है
वे एक पक्षी हैं, जिन्हें हर बंटवारे से इनकार है
और हर दीवार से घृणा

इस हिंसा द्वेष घृणा और युद्ध से भरी दुनिया में
अब जो आशा है उन्हीं से है केवल।

कटोरे में प्यास

दूर तक पानी खोजते पक्षी
प्यास का भार उठाए थक गए
उनके पंख जवाब दे चुके हैं
उनकी चोंच गरम हो चुकी है
और कंठ में फूट रहा है लावा

तब वे सोचते हैं कि उनका गुनाह क्या है
कि भरी दोपहर घूंट भर नहीं मिल रहा पानी
और दूर दूर तक धरती अछोर है
जिसे नापना है हर हाल उस एक बूंद के लिए
कहीं नहीं ठिकाना अब उम्मीद का
वे पक्षी चोंच उठाए खोज रहे हैं पानी की चमक
हद ये है कि जहां जहां कटोरी है
वहां वहां पानी नहीं प्यास है।

संभव न्याय

यह एक बंद हो चुका सिक्का है
या सूखता हुआ पेड़
या एक विलुप्त हो चुकी नदी है
या एक गड़रिया
जो किसी रात गुम हो गया अपनी भेड़ों के साथ

यह एक टूटा हुआ पहाड़ है
एक गिरता हुआ पंख
जो अब किसी काम का नहीं रहा
देह से अलग होने के बाद

यह घुन खाया हुआ बीज है
एक कुतरा हुआ दाना
या एक बच्चे की काट ली गई पतंग
जिसे गली के गुंडे लेकर दौड़ रहे हैं।

मामूली इच्छा

मैं कोई शासक नहीं
कि जिसकी दिव्य हों इच्छाएं
मैं कोई तानाशाह भी नहीं
जो करना चाहे मुट्ठी में दुनिया

मुझे तो किसी दोस्त से मिलना है केवल
या कोई तारा देखना
किसी नदी में डूबना है
या किसी पेड़ के नीचे दोपहर में सोना
कमरे की बंद खिड़की को खोलना है
या किसी बच्चे से बात करना
या लिखनी है किसी को चिट्ठी
और कहनी है मन की बात
कोई पका फल खाना है स्वाद से भरा
या घड़े का पानी पीना है ठंडा
या बैठना देर तक किसी के पास
और सुननी दुख की लंबी कथा।

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