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कविताः वो स्त्री थी, जानती थी मेरे पुरुष होने का सच!

नीरज द्विवेदी की कविता

प्रतीकात्मक चित्र

नीरज द्विवेदी

प्रश्न, उत्तर और सत्य — तीन दुविधायें !!

(१)

स्त्री विमर्श पर
मेरे सारे तर्क,
सारा ज्ञान,
सारा पौरुष,
चुक जाता है
शब्द टूटने लगते हैं..
मैं, निरुत्तरित.. आवाक
तुम्हे देखने लगता हूँ…..
जब तुम बड़ी सहजता से पूछ लेती हो,
कि…
“मैं औरत हूँ,
पर…. मैं हूँ कौन ??

(२)

इतिहास मे
तुम्हारे साथ सबसे बड़ा छल तब हुआ,
जब समाज ने तुम्हे ‘देवी’ कहा…
मैं,
तुममे ढूंढ़ता रहा..
माँ, बहन
प्रेयसी, पत्नी, सखा,
और खुरचता रहा..
अपने अंदर की जमा पितृसत्ता को,
जोड़ता रहा.. हर रोज खुद को
कि,
तुम्हारी नज़रों मे
उठ सकूँ एक बार फिर
और
गिरा सकूँ उन दिवारों को
जो
तुम्हारे ‘देवी’ बनते ही
मंदिर के कैदखानों मे तब्दील हो गई थीं ।।।

(३)

प्रेम मे पड़ने से पहले का पुरुष
और, प्रेम मे पड़ने के बाद का पुरुष..
प्रेम मे पड़े पुरुष से.. भिन्न होता है !!

मैं पुरुष था,
नही समझ पाया स्त्री होने का मर्म..
वो स्त्री थी,
जानती थी..
मेरे पुरुष होने का सच !!

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