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कविता: सलीब ढोता मनुष्य, उन दिनों मां और मेरे लिए कविता

पढ़ें सांत्वना श्रीकांत की लघु कविताएं।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

डॉ. सांत्वना श्रीकांत

सलीब ढोता मनुष्य

मारे जाते हैं सपने
बची रह जाती है
परंपरा।
वध होता है
जिजीविषा का
ढोती रहती हैं सभ्यताएं
यह दुख।
सदियों तक
सलीब ढोता है मनुष्य।
……….
रात ताकती रहती है
दु:ख को,
और दु:ख रात को
भयावह सन्नाटे के साथ
रख के एक दूसरे के
कांधे पर सर।

उन दिनों मां

मां के पास कुछ नहीं था
पिता को याद
करने के अलावा,
मेरे देखने के तरीके को
बड़ी ऐहतियात से देख
थोड़ी देर में कह उठती,
बिल्कुल ऐसे ही
तुम्हारे पिता भी
देखा करते थे।
पिता की कमी में
दिन-प्रतिदिन
कम होती मां,
अब मेरे लिए पिता
बन जाना चाहती थी,
मुझमें अपना सहचर
ढूंढ़ने लगी थी,
उन दिनों द्वंद्व में थी मां…….
क्योंकि मां के पास
कुछ भी तो नहीं था
उन दिनों।

मेरे लिए कविता
जब समाप्त हो जाएगी,
तब तुम्हें मेरी चीखें
सुनाई देंगी
सन्नाटे में गूंजती हुर्इं।
दरअसल, कविता
सोखती रहती है
मेरे दुख और आंसू।
…………

मैंने पीठ टेक दी है
समय की तरफ
हथेलियों को धरा है सपाट,
तुम मेरी हथेलियों पर
अपना हाथ रख,
और गले लग कर
सोख लेना मेरे दुख।

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