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कविता: मुस्कुराता हुआ लक्षद्वीप

पढ़ें डॉ. सांत्वना श्रीकांत की कविता मुस्कुराता हुआ लक्षद्वीप।

प्रतीकात्मक फोटो (फाइल)

सदियों पहले
अरब सागर में जन्मे तुम,
फिर भी अविचल मगर
कितने चंचल हो लक्षद्वीप।
इतनी खामोशाी से
किसका करते हो इंतजार?
मैं ढूंढती रही तुम्हें
कावारत्ती के खूबसूरत द्वीप पर,
आगाती से लेकर वंगारम
तक तुम्हारी सुंदरता देखी
और फिर-
मिनिकाय भी गई,
जहां तुम और सुंदर होते गए,
मुस्कुराती, उछलती लहरों में
पढ़ती रही तुम्हें कई बार।
हवा में झूमते नारियल के
अनगिनत पेड़ों से
लोरियां सुनते हुए तुम
हर जगह मचलते,
चहकते हुए उमंग से भरे
किसी बच्चे की तरह मिले।
ओह! लक्षद्वीप,
देखो न-
मैं बादलों पर बैठ कर
चली आई हूं यहां,
प्रेम को पल्लवित करने।
तुम्हारी सुनहरी रेतों का
लिबास ओढ़ कर
बैठी हूं किनारे,
तुम्हारे नीले रंग को
अपनी हथेलियों में भर
खुद का शृंगार किया है।
तुम कितने निर्मल हो,
मेरी पलकों पर
तुम्हारी चांदनी रेत
झिलमिला रही है,
अनंत रातों से
वह सोई ही नहीं,
अपने प्यारे लक्षद्वीप को
देखने के लिए।
मैंने तुम्हारे अतीत के
सभी अध्यायों को
बदल दिया है
सुनहरे वर्तमान में।
उन जख्मों के निशान भी
मिटा दिए हैं मैंने
जो तुम्हें मिले थे
इतिहास के कालखंड में।
ओह! लक्षद्वीप
देखो मुझे-
तुम्हारे सभी द्वीप
जगमगा रहे हैं
मोतियों की तरह
गले की माला बन के।
तुम्हारे समंदर की
नीली-हरी जलराशि
मेरे आभूषणों में जड़ित
रत्नों में उफन कर
छू लेती है मुझे।
तुम कहलाते हो
‘लाखो द्वीप’ लेकिन
करोड़ों में लोकप्रिय,
आसमान से उतर कर
देवता भी करते तुमसे प्यार।
कोरल द्वीप पर ढूंढते रहे
सभी अपनी खुशियां,
लेकिन नौका में बैठी मैं
तुम्हें ही तलाशती रही,
ये सोच कर कि
बांहें पसार कर
हृदय से लगा लोगे,
तब मैं तितली बन कर
उड़ जाऊंगी और
रच दूंगी इंद्रधनुष।
या फिर बन कर जलपरी,
तुम्हारी लहरों में खो जाऊंगी
हमेशा-हमेशा के लिए।
ओह! लक्षद्वीप,
मैं कोई और नहीं,
तुम्हारी ही प्रकृति हूं
रहती सदा तुम में।
सूरज की रश्मियों से
जगमगाती सोने जैसी
तुम्हारी धरा पर,
कूदती-फांदतीं नीली लहरों पर
अठखेलियां करती हुई,
नारियल के पेड़ों के नीचे
बुनती रहती हूं-
प्रेम का शाश्वत संगीत।
क्या सुन रहे हो लक्षद्वीप?
देखो मैं बना रही हूं
तुम्हारा प्रिय व्यंजन पुट्टू
नारियल से ही,
केले के पत्तों पर परोस कर
समर्पित करूंगी तुम्हें।
सफेद सीपियों में तुम
अपना प्यार संजो कर
जैसे सबको देते हो,
कभी मुझे भी देना…….लक्षद्वीप।

– डॉ. सांत्वना श्रीकांत

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