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कविता: तुम्हारी हथेलियों में सुगंध

पढ़ें संजय स्वतंत्र की कविता तुम्हारी हथेलियों में सुगंध

प्रतीकात्मक फोटो

प्रेम की खोज में निकला
तो मेरी प्रार्थनाओं में
मिल गई तुम।
शून्य में ढूंढता रहा तुम्हें
तो शब्द-साधना में
मिल गई तुम
जीवन के नए अर्थ लेकर।
मैं बादलों के पार
झांकता रहा तुम्हें
अपनी कविताओं में,
तो बारिश की बूंदों में
मिल गई तुम।
जब ध्यान में डूबा तो
सभी बंधनों से मुक्त
प्रेम के अंतिम शिखर पर
मिल गई तुम।
काम-क्रोध-लोभ में
जब भी उलझा तो
तृष्णाओं का जाल हटाती
मिल गई तुम।
युद्धरत जीवन समर में
चुनौतियों को ललकारती,
मन की प्रत्यंचा चढ़ा
कामनाओं को भस्म करती
मिल गई तुम।
द्वंद्व और द्वेष को
समाप्त करने उतरा
जब भी रणभूमि में,
तो मेरे गालों को थपथपाती
ठंडी हवाओं में
मिल गई तुम।
सत्य की खोज में निकला
तो निर्मल भावनाओं की
नदी में दीप जलाती
मिल गई तुम।
यह कहते हुए कि
जीवन-मरण के चक्र को
पार कर सको तो
बार-बार बिछड़ने के
शोक से मुक्त कर दूंगी तुम्हें।
फिर मैं मिलूंगी-
तुम्हारी प्रार्थनाओं में
बारिश की बूंदों में
शीतल ब्यार के साथ
फूलों की सुगंध लेकर
अपनी हथेलियों में।
मैं खोलूंगी तो
चूम लेना इसे
मुक्त हो जाना तुम
हमेशा के लिए।

– संजय स्वतंत्र

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