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किताबें मिलींः ‘वाशिंदा @ तीसरी दुनिया’, ‘देह ही देश’, ‘उन्हीं में पलता रहा प्रेम’ और ‘भोर’

इस पुस्तक में क्रोएशिया प्रवास की घटनाएं और आख्यान हैं। इतिहास के प्रमुख नायक और नायिकाएं आपको इसमें कहीं नहीं मिलेंगे।

Author July 8, 2018 07:27 am
पंकज मित्र हिंदी के सर्वप्रिय कथाकारों में हैं, जिन्हें हमेशा ही पढ़ा जाता है। ग्रामीण और कस्बाई समाज की गहरी पड़ताल और सघन संवेदना तथा थोड़े व्यंग्य के साथ समाज के ठेठ देसी यथार्थ की अक्काशी करने वाले कथाकार के रूप में उन्होंने अपना एक विशेष स्थान बनाया है।

वाशिंदा @ तीसरी दुनिया

पंकज मित्र हिंदी के सर्वप्रिय कथाकारों में हैं, जिन्हें हमेशा ही पढ़ा जाता है। ग्रामीण और कस्बाई समाज की गहरी पड़ताल और सघन संवेदना तथा थोड़े व्यंग्य के साथ समाज के ठेठ देसी यथार्थ की अक्काशी करने वाले कथाकार के रूप में उन्होंने अपना एक विशेष स्थान बनाया है। इस संग्रह में शामिल कहानियां गांव-समाज में होने वाले नित नए बदलावों को रेखांकित करते हुए देश का एक नया कथा-वृत्तांत रचती हैं, जिसमें युवा पीढ़ी, उसकी उम्मीदें, निराशाएं, बदलते जीवन-मूल्य और चाकू के फल की तरह गांव की हवा में घुसता शहर कई तरह से उजागर हुआ है। ये कहानियां बताती हैं कि गांव या कहें वह भारतीय चेतना, जो एक भाव-धारा की तरह गांव से चल कर कस्बों और फिर शहरों तक में हमारी खास पहचान होती है, भूमंडलीय वास्तविकता के सामने जो रूप धारण करती है, वह एक अलग ही भाव-भूमि है। उसका संबंध न यूरोप-अमेरिका से जुड़ता है और न भारत की अपनी मिट्टी से। यह एक खतरनाक भूगोल है, जिसके समतल होने तक शायद हम बहुत कुछ गंवा दें। ‘फेसबुक मेन्स पार्लर’, ‘अधिग्रहण’ आदि कहानियां इस यथार्थ को बहुत कलात्मकता के साथ रेखांकित करती हैं।

देश के इस बदलते सामाजिक-सांस्कृतिक भूगोल में स्त्री फिर एक उम्मीद की तरह दिखती है, वह शायद इसलिए कि उसे अपना रास्ता बनाना है, ऐसा कोई रास्ता उसके पास था नहीं, जिसके खो जाने का भय उसे हो। ‘जलेबीबाई डॉट कॉम’ इस संदर्भ में पठनीय है। ‘मनेकि लबरा नाई की दास्तान’ अपने शिल्प और अपने मंतव्य दोनों में कथाकार की क्षमता को गहराई से रेखांकित करती है।

वाशिंदा @ तीसरी दुनिया : पंकज मित्र; राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 299 रुपए।

देह ही देश

इस पुस्तक में क्रोएशिया प्रवास की घटनाएं और आख्यान हैं। इतिहास के प्रमुख नायक और नायिकाएं आपको इसमें कहीं नहीं मिलेंगे। वे अनुपस्थित होकर भी उपस्थित हैं, उनकी जगह जो दीखते हैं वे हैं छोटी-छोटी घटनाएं, कहानियां, अनुभव, अपनी साधारणता में जीते हुए लोग, स्त्रियां और बच्चे जिनके आख्यान इस डायरी के केंद्र में हैं। 1992 से 1995 तक चले युद्ध और झड़पों में संयुक्त यूगोस्लाविया से विखंडित हुए सभी छोटे-छोटे देशों ने कुछ-न-कुछ खोया, आम नागरिक की शांति भंग हुई, नागरिक अधिकारों का हनन हुआ, बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ, लाखों लोग शरणार्थी बनने को विवश हुए। इस पूरे दौर में युद्ध की जघन्य हिंसा का शिकार बनीं स्त्रियां, क्योंकि उनकी देह ही शोषण की साइट थी। युद्ध में हिंसा, आगजनी, लूटपाट के अलावा स्त्री देह किस तरह शोषण की साइट के रूप में उभरती है जहां उसका समूचा व्यक्तित्व सिर्फ योनि में रिड्यूस हो जाता है, जिसको नोच-खसोट कर संचित घृणा का बदला लिया जा सकता है, कोख पर हमला बोला जा सकता है, उसे जबरन गर्भधारण के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, आदि।

यह सिर्फ डायरी नहीं, यात्रा भी है, बाहर से भीतर और देह से देश की, जो बताती है कि देह पर ही सारी लड़ाइयां लड़ी जाती हैं और सरहदें तय होती हैं। इस डायरी में पाठक ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता है, लगता है कोई तेज नश्तर उसके सीने पर रख दिया गया है और पृष्ठ-दर-पृष्ठ उसे भीतर उतारा जा रहा है। हिंदी में ऐसे लेखन और ऐसी यात्राओं का जितना स्वागत किया जाए, कम है। रक्तरंजित इस डायरी में जख्मी चिड़ियों के टूटे पंख हैं, तपती रेत पर तड़पती सुनहरी जिल्द वाली मछलियां हैं, कांच के मर्तबान में कैद तितलियां हैं। यूगोस्लाविया के विखंडन का इतना सच्चा बयान हिंदी में यह पहला है।

देह ही देश : गरिमा श्रीवास्तव; राजपाल एंड संज, 1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेड, दिल्ली; 285 रुपए।

उन्हीं में पलता रहा प्रेम

पूनम शुक्ला की कविताएं एक ओर जहां स्त्री विमर्श के दायरे को मजबूत करती हैं वहीं दूसरी ओर उसे विस्तार भी देती हैं। स्त्री के दुख और संघर्ष को ही नहीं, उसके अधिकार और ताकत को भी पहचानती हैं और उसे तर्क की ठोस भूमि पर निरूपित करती हैं। ऐसे में कविता के बयान बन जाने का खतरा बार-बार उपस्थित होता है। लेकिन भावात्मक लगाव और संवेदनात्मक स्पर्श से वे न सिर्फ ऐसे खतरों को टालने में सफल होती हैं, बल्कि कई बार कविता की नई जमीन तोड़ने का उद्यम भी करती दिखती हैं। स्त्री कविता की प्रचलित अवधारणा से अलग एक संवेदनशील और विवेकशील मनुष्य की तरह समय के बीहड़ में प्रवेश करती हैं और समाज की उन विषमताओं और विसंगतियों को देखने में भी सफल होती हैं, जिन्हें देखने के लिए एक वर्गदृष्टि आरोपित नहीं, बल्कि जीवनानुभव के विस्तार और उत्पीड़ित जनों के साथ संवेदनात्मक जुड़ाव से पैदा हुई दृष्टि है।

पूनम शुक्ला अपने समय के विमर्शों से प्रभावित तो हैं, लेकिन वे ज्ञान और सूचनाओं का उपयोग, उन्हें अफने जीवनानुभव में शामिल करने के उपरांत ही करती हैं। इसलिए वे पाठकों को चौंकाती नहीं, बल्कि बेचैन कर देती हैं। यह उनका दूसरा संग्रह है, लेकिन इसे एक नई शुरुआत की तरह देखा जाना चाहिए। पहले संग्रह में काव्याभ्यास वाली कविताएं अधिक थीं। उसके साथ इस संग्रह की कविताओं को देख कर लगता है कि यह विकास नहीं बल्कि छलांग है। एक बिलकुल अलग तरह के काव्यलोक में। जाहिर है अपना मुहावरा पाने के लिए उन्होंने कठिन रचनात्मक संघर्ष किया है, जिसकी झलक इन कविताओं में मिलती है।

उन्हीं में पलता रहा प्रेम : पूनम शुक्लाच आर्य प्रकाशन मंडल, 24/4855-56, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 200 रुपए।

भोर

गांव से शहर में आकर बस जाना आज विवशता है। जैसे-जैसे गांवों से रोजी-रोजगार के अवसर समाप्त होते जा रहे हैं, शहर अनिवार्य शरण्य बनता जा रहा है। मगर शहर में आकर, रोजी-रोजगार के अवसर उपलब्ध कर लेने के बाद भी गांव स्मृतियों में बसा रहता है। यह महज नॉस्टेल्जिया या विगत की स्मृति नहीं है, बल्कि उस गांव के प्रति अपने दाय को बार-बार याद करना भी है। उसकी प्रगति की चिंता और उसकी दशा सुधरने की इच्छा भी उसमें समाहित होती है। इसी इच्छा के वशीभूत बहुत सारे रचनाकार कहानी-कविता, चित्रों आदि के जरिए गांव को संजोने, सहेजने का प्रयास करते हैं। गंगेश गुंजन का कहानी संग्रह भोर भी उसी प्रयास की एक कड़ी है।

गंगेश गुंजन हिंदी और मैथिली के सुपरिचित रचनाकार हैं और उनकी रचनाओं में अपनी माटी की महक बसी होती है। इस संग्रह की कहानियां मिथिला अंचल के जीवन, वहां की दुश्वारियों, वहां की परंपराओं और गरीबी के चलते बुनियादी सुविधाएं भी न जुटा पाने की तकलीफें नुमाया हैं। इस संग्रह में कुल तेरह कहानियां संकलित हैं, पर वे मिथिला की संस्कृति को समझने का भरपूर समाजशास्त्रीय तत्त्व उपलब्ध कराती हैं। ‘भोर’ कहानी में मधुबनी के एक गांव के गरीब पिता की अपने होनहार बच्चे को शिक्षा की बेहतर सुविधाएं न उपलब्ध करा पाने की कसक है, तो वहां की भौगोलिक और यातनादायी सामाजिक स्थितियों का दस्तावेज भी इसमें मिलता है। इसी तरह सवारी, जड़ें, ब्राह्मणी, अगली बाजी, पिता के बाद, रिश्ते-रिश्ते, लालटेन आदि कहानियां आंचलिक स्वाद के साथ मिथिलांचल के गांवों की दशा का बखान करती हैं।

भोर : गंगेश गुंजन; क्रांतिपीठ प्रकाशन; 299 रुपए।

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