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किताबें मिलीं: ‘रेत समाधि’, ‘दंतक्षेत्र’ और ‘फिर… और फिर’

बस्तर संभाग का सर्वाधिक चर्चित जिला दंतेवाड़ा, मुख्य रूप से दंडामि माफियाओं की भूमि, जिसकी सदियों से पहचान गौर सींग मुकुट तथा नृत्य रहे हैं, जिस क्षेत्र को ऐसे ही अनेक सकारात्मक कारणों से चर्चा में होना चाहिए था आज सभी संदर्भों पर नक्सलवाद की विभीषिका आरोपित हो गई है।

Author June 24, 2018 4:16 AM
राजीव रंजन प्रसाद कहते हैं कि लाल-आतंकवाद के इस मिथक को तोड़ना, साथ ही दंतेवाड़ा के सदियों के संघर्ष को आज के परिदृश्य में विवेचित करना आवश्यक था, इसलिए मैंने ‘दंतक्षेत्र’ लिखने का प्रयास किया है।

रेत समाधि

‘रेत-समाधि’ हर साधारण औरत में छिपी एक असाधारण स्त्री की महागाथा तो है ही, संयुक्त परिवार की तत्कालीन स्थिति, देश के हालात और सामान्य मानवीय नियति का विलक्षण चित्रण भी है। और है एक अमर प्रेम प्रसंग और रोजी जैसा अविस्मरणीय चरित्र।
कथा लेखन की एक नई छटा है इस उपन्यास में। इसकी कथा, इसका कालक्रम, इसकी संवेदना, इसका कहन, सब अपने निराले अंदाज में चलते हैं। हमारी चिर-परिचित हदों-सरहदों को नकारते लांघते। जाना-पहचाना भी बिल्कुल अनोखा और नया है यहां। इसका संसार परिचित भी है और जादुई भी, दोनों के अंतर को मिटाता। काल भी यहां अपनी निरंतरता में आता है। हर होना विगत के होनों को समेटे रहता है, और हर क्षण सुषुप्त सदियां। मसलन, वाघा बार्डर पर हर शाम होने वाले आक्रामक हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी राष्ट्रवादी प्रदर्शन में ध्वनित होते हैं ‘कत्लेआम के माजी से लौटे स्वर’, और संयुक्त परिवार के रोजमर्रा में सिमटे रहते हैं काल के लंबे साए।

और सरहदें भी हैं जिन्हें लांघ कर यह कृति अनूठी बन जाती है, जैसे स्त्री और पुरुष, युवक और बूढ़ा, तन, मन, प्यार और द्वेष, सोना और जागना, संयुक्त और एकल परिवार, हिंदुस्तान और पाकिस्तान, मानव और अन्य जीव-जंतु (अकारण नहीं कि यह कहानी कई बार तितली या कौवे या तीतर या सड़क या पुश्तैनी दरवाजे की आवाज में बयान होती है) या गद्य और काव्य : ‘धम्म से आंसू गिरते हैं जैसे पत्थर। बरसात की बूंद।’

रेत-समाधि: गीतांजलि श्री, राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 795 रुपए।

दंतक्षेत्र

बस्तर संभाग का सर्वाधिक चर्चित जिला दंतेवाड़ा, मुख्य रूप से दंडामि माफियाओं की भूमि, जिसकी सदियों से पहचान गौर सींग मुकुट तथा नृत्य रहे हैं, जिस क्षेत्र को ऐसे ही अनेक सकारात्मक कारणों से चर्चा में होना चाहिए था आज सभी संदर्भों पर नक्सलवाद की विभीषिका आरोपित हो गई है। पिछले दशकों में लाल-आतंकवाद की विभीषिका ने इस अंचल के प्रति भय का भाव उत्पन्न किया है। यह मान लिया गया है कि नक्सली ही दंतेवाड़ा के शासक हैं और सरकार यहां अनुपस्थित है। इस भ्रम को आगे बढ़ाने में कतिपय स्वयंभू समाजसेवियों और स्वघोषित आंदोलनकारियों की बड़ी भूमिका है।

राजीव रंजन प्रसाद कहते हैं कि लाल-आतंकवाद के इस मिथक को तोड़ना, साथ ही दंतेवाड़ा के सदियों के संघर्ष को आज के परिदृश्य में विवेचित करना आवश्यक था, इसलिए मैंने ‘दंतक्षेत्र’ लिखने का प्रयास किया है। प्रशासनिक बाध्यताओं और नक्सलवाद से बेहतर तरीके से लड़ने के दृष्टिगत दक्षिण बस्तर के दंतेवाड़ा जिला का आकार धीरे-धीरे छोटा होता रहा है, किंतु इससे क्षेत्र की महत्ता लेश-मात्र भी नहीं सिमटती। मेरा प्रयास है कि चार अलग-अलग विमर्श के आयामों में इस पुस्तक का प्रस्तुतिकरण हो, जिससे दंतेवाड़ा ‘कैसा था’ से ‘क्या हो गया है’ का संपूर्ण विमर्श प्रस्तुत हो सके।

दंतक्षेत्र- दंतेवाड़ा: थोड़ा जाना थोड़ा अनजाना: राजीव रंजन प्रसाद, यश पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, 1/ 10753, सुभाष पार्क, नवीन शाहदरा, दिल्ली; 500 रुपए।

फिर… और फिर

विजया अक्सर सोचती है कि सारी उम्र दीदी मम्मी से नाराज क्यों रही? क्या छुट्टन चाचा से मम्मी का सच में कोई रिश्ता था या वह सब दीदी की बीमार सोच की तस्वीरें थीं या फिर जान-बूझ कर दीदी बहुत सोचा-समझा झूठ बोल रही थीं? छुट्टन चाचा पर इतना बड़ा आरोप लगा कर क्या दीदी ने जाते-जाते मम्मी से अपना प्रतिशोध लिया था? छुट्टन चाचा से अगर उनका रिश्ता था, तो भी अक्सर मन में आता है कि पति से उपेक्षित रह कर किसी ‘परपुरुष’ के आकर्षण में बंध जाना क्या सच में उतना बड़ा अपराध था कि उसके लिए उनको कभी माफ ही न किया जाता? पर अब कुछ भी सोचते रहने से कोई फायदा नहीं है। मम्मी अब इस दुनिया में नहीं हैं।

क्या दीदी की तरह ही उन्होंने भी आत्महत्या की थी? पता नहीं!पर यह कहानी तो उनकी नहीं, विजया की अपनी कहानी है। उसकी जिंदगी में शेखर, प्रताप और अब इंद्रनील का आना। जो कुछ हुआ वह नहीं भी तो हो सकता था। तब उसकी यह कहानी कितनी अलग होती। क्या सब कुछ नियतिबद्ध ही था- स्थितियां चाहे जो भी होतीं, जो कुछ हुआ उसे होना ही था। पता नहीं! और अब फिर… इस तरह के अनेक सवालों से टकराती इस उपन्यास की मुख्य कथा कहानी-दर-कहानी, निरंतर आगे बढ़ती चलती है। ढेर स्त्री प्रश्नों को खोलती और उनके जवाब तलाशने पर विवश करती है।

फिर… और फिर : सुमति सक्सेना लाल, सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 400 रुपए।

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