बंटी ने अपने दोस्त चुन्नू को बताया, ‘हम लोग इस बार दशहरे की छुट्टियां बिताने अपने दादाजी के गांव रतनूपुर गए थे। वहां दशहरे का बहुत बड़ा मेला लगता है। दादाजी हमें मेला घुमाने ले गए थे। लेकिन यार चुन्नू, तुमसे क्या बताऊं! अगर तुम भी मेरे साथ होते न, तो तुम्हारी भी डर के मारे नानी याद आ जाती।’
चुन्नू ने चौंकते हुए पूछा, ‘अरे यार! ऐसा क्या देख लिया था तुमने मेले में?’
बंटी ने उस दृश्य को याद करते हुए कहा, ‘यार! मेले में जो आदमी रावण बना हुआ था न, वह इतना डरावना लग रहा था कि कुछ पूछो मत। उसे देखते ही मैं बुरी तरह डर गया। दादाजी मेरे साथ न होते तो मैं डर के मारे वहीं बेहोश होकर गिर जाता।
मैंने तो डर कर दादाजी की अंगुली बहुत जोर से पकड़ ली और उनके पीछे छिप गया। दादाजी ने आव देखा न ताव और उस रावण को अपनी कड़क और रोबदार आवाज में डांटते हुए कहा, रावण! तुम्हारी इतनी हिम्मत कि मेरे सामने मेरे पोते को डरा दिया? चलो, मेरे पोते से माफी मांगो, नहीं तो आज तुम्हारी खैर नहीं!’
‘दादाजी की बात सुनकर मैं भी उस रावण के सामने तनकर खड़ा हो गया। डरावने रावण की सारी हेकड़ी निकल गई थी। वह दोनों कान पकड़ कर बोला कि मुझे माफ कर दो बेटा। अब मैं तुम्हें ही नहीं, इस पूरे मेले में किसी भी बच्चे को नहीं डराऊंगा।
मैंने दादाजी की तरफ देखा, जैसे उनसे कह रहा हूं कि चलो दादाजी, अब इस बेचारे रावण को माफ कर दीजिए।’
दादाजी का रौब और बंटी का डर
‘वैसे भी चुन्नू, मेरे दादाजी अपनी जवानी में पहलवान थे। उन्होंने कई नामी पहलवानों को पटखनी देकर धूल चटाई थी। इसलिए रतनूपुर गांव में उनकी बड़ी इज्जत है।
शायद उनकी इज्जत और रौब की वजह से ही उस रावण ने मुझसे बकायदा माफी मांगी थी। हालांकि उस बेचारे रावण की कोई गलती थी ही नहीं। उसने मुझे डराया तक नहीं था। मैं ही उसे देखकर डर गया था!’
चुन्नू हंस पड़ा।
बंटी भी हंसते हुए आगे बोला, ‘रावण के माफी मांगने के बाद दादाजी मुझे मेले में उस तरफ ले गए, जहां गरमा-गरम जलेबियों और खिलौनों की दुकानें लगी थीं। हमने खूब मजे से कुरकुरी जलेबियां खाईं। फिर दादाजी ने जलेबी के पैसे दिए और मुझे खिलौनों की दुकान से कई सारे खिलौने भी दिलाए।
इसके बाद दादाजी ने पूछा, ‘बंटी, तुम्हें मेले में और कुछ खाना या लेना है तो बताओ।’ मैंने कहा, नहीं दादाजी, अब मुझे न कुछ खाना है और न कुछ लेना। दादाजी बोले कि तो अब घर चलें। अंधेरा काफी हो गया है।
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‘दादाजी सही कह रहे थे। सचमुच बहुत अंधेरा हो गया था। मेले की चहल-पहल धीरे-धीरे कम हो रही थी। मैंने दादाजी की अंगुली पकड़ ली। रास्ते भर दादाजी मुझे बड़े प्यार से समझाते रहे कि हमें किसी भी बात से इतनी जल्दी डरना या घबराना नहीं चाहिए। सबसे पहले परिस्थिति को समझना चाहिए और फिर धैर्य और बहादुरी के साथ उसका सामना करना चाहिए।
जिस रावण को देखकर तुम इतना डर गए थे, वह कोई सचमुच का रावण थोड़े ही था। वह तो नकली रावण था। वह पिछले अठारह वर्षों से दशहरे के मेले में रावण बनता आ रहा है। असल में वह इतना अट्टहास करने वाला आदमी नहीं, बल्कि अपने ही गांव का सीधा-सादा आदमी गौरी शंकर है।’
रावण के पीछे छिपी असली कहानी
‘दादाजी ने जैसे ही गौरी शंकर का नाम लिया, मैं बोल पड़ा कि वही गौरी शंकर, जिनसे आपने मुझे परसों मिलवाया था? धत्त तेरी की! वे बेचारे तो कितने सीधे-सादे हैं। मैं नाहक ही उन्हें मेले में असली रावण समझकर डर गया था। लेकिन दादाजी, मेरा यकीन मानिए, अगर सचमुच असली रावण भी होता तो वह उतना असली नहीं लगता, जितने असली गौरी शंकर दादा रावण के रूप में लग रहे थे! मैं तो उन्हें उस रूप में पहचान ही नहीं पाया।’
‘दादाजी ने हंसते हुए कहा कि कोई बात नहीं बेटा। गौरी शंकर बहुत बढ़िया कलाकार है। अगर उसके घर की परिस्थितियां थोड़ी अच्छी होतीं और उसे सही सहारा मिलता तो आज मेले में रावण बनने वाला यही गौरी शंकर किसी हिंदी सिनेमा में बड़ा और चर्चित अभिनेता होता।
लेकिन आज हर साल कितने लोग सिर्फ इसलिए दूर-दूर से इस दशहरे के मेले में आते हैं कि वे उस मशहूर कलाकार को एक बार रावण के रूप में देख सकें। उसी की वजह से इस मेले की पहचान बनी हुई है।
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घर पहुंचते ही दादी ने कहा कि चलो बंटी, हमने तुम्हारा बिस्तर कमरे में लगा दिया है। मैंने कहा कि नहीं दादी! जब तक मैं गांव में हूं तब तक मैं दादाजी के पास ही सोऊंगा। दादाजी ने मुझे बड़े प्यार से अपने पास सुला लिया। उनके पास लेटते ही मुझे बहुत जल्दी नींद आ गई।’
दादाजी की यादों में खो गया बंटी
‘चुन्नू, जब तक मैं गांव में रहा, रोज दादाजी के पास ही सोता था। वे मुझे ढेर सारी अच्छी-अच्छी और प्यारी-प्यारी कहानियां सुनाते थे। जब से इस बार हम गांव में दशहरे की छुट्टियां बिताकर लौटे हैं, तब से मेरा मन न शहर में लग रहा है, न स्कूल की पढ़ाई में। काश! ऐसा होता कि हर महीने दशहरा आता और मैं हर महीने दादाजी के साथ दशहरे का मेला देखने गांव जा पाता।
तभी स्कूल में भोजनावकाश खत्म होने की घंटी बज उठी। बंटी और चुन्नू ने अपना-अपना टिफिन समेटा और कक्षा की ओर चल पड़े। बंटी के चेहरे पर अब भी वही मुस्कान थी, जो उसे दादाजी की याद आते ही आ जाती थी।
