तमिलनाडु की राजनीति में तमिलगा वेट्री कड़गम (TVK) के नेता जोसेफ विजय से पहले तीन बड़े नाम आए। रजनीकांत, कमल हासन और कैप्टन विजयकांत। तीनों राजनीति में अलग-अलग कारणों से विफल रहे।

रजनीकांत की पार्टी नहीं बनी

दिसंबर 2020 में रजनीकांत ने बड़ी घोषणा की। अपने रजनी मक्कल मंद्रम को राजनीतिक पार्टी में बदलेंगे और साल 2021 के सभी 234 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। लेकिन चुनाव से महज कुछ हफ्ते पहले जनवरी 2021 में किडनी की समस्या और कोविड के खतरे का हवाला देकर पीछे हट गए। पार्टी कभी औपचारिक रूप से पंजीकृत नहीं हुई, एक भी चुनाव नहीं लड़ा गया। रजनीकांत ने सिनेमा को नहीं छोड़ा और राजनीति में पूरी प्रतिबद्धता नहीं दिखाई। मतदाता उन पर भरोसा नहीं कर सके। करोड़ों प्रशंसक निराश हुए।

कमल हासन : शहरी सपना, ग्रामीण जमीन नहीं

कमल हासन ने 21 फरवरी 2018 को मक्कल नीधि मैयम (एमएनएम) बनाई। एमएनएम ने साल साल 2019 में लोकसभा और साल 2021 के विधानसभा चुनावों में भागीदारी की। लेकिन पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी। पार्टी का वोट मुख्यत: शहरी इलाकों तक सिमट गया। सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब कमल हासन खुद कोयंबटूर दक्षिण से भाजपा की वनाती श्रीनिवासन से मात्र 1,728 मतों से हार गए। साल 2024 तक एमएनएम व्यावहारिक रूप से समाप्त हो गई और कमल हासन द्रमुक के समर्थन से राज्यसभा सांसद बन गए। उन्होंने भी सिनेमा और राजनीति एक साथ चलाने की कोशिश की।

विजयकांत : जल्दी उभरे, जल्दी खो दी पहचान

एमजीआर और जयललिता के बाद तमिलनाडु में राजनीति में छाप छोड़ने वाले एकमात्र अभिनेता थे। उनकी डीएमडीके ने साल 2006 के पहले ही चुनाव में 8.33 फीसद वोट पाए और द्रमुक को अल्पमत सरकार बनाने पर मजबूर किया। साल 2011 में वे विपक्ष के नेता बने। यह उनका शिखर था, लेकिन सार्वजनिक मंचों पर अस्थिर व्यवहार, शराब पीने के आरोप और बिगड़ते स्वास्थ्य के बाद साल 2016 में पार्टी का वोट शेयर आठ फीसद से गिरकर मात्र 2.4 फीसद रह गया। दिसंबर 2023 में उनका निधन हो गया।

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बालीवुड के सितारों का राजनीतिक इतिहास चमकदार नहीं रहा है। अमिताभ बच्चन साल 1984 में इलाहाबाद से लोकसभा चुनाव जीते। लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच कार्यकाल पूरा भी नहीं किया और खुद कहा, ‘यह खेल मुझसे बड़ा है, मैं इसे नहीं संभाल सकता।’ धर्मेंद्र को पता ही नहीं था कि वे राजनीति में क्यों आए। संसद में वे शायद ही बोले। गोविंदा ने पांच साल के कार्यकाल में संसद में मात्र दो मिनट का भाषण दिया। उनकी उपस्थिति 15 फीसद से भी कम थी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक