नन्हे-मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है? मुट्ठी में है तकदीर हमारी…फिल्म बूट पालिश और फिल्म के प्रस्तुतकर्ता राज कपूर। हिंदी फिल्मों का ‘शोमैन’ और दो बाल कलाकार। दो बाल कलाकारों के जरिए राज कपूर ने आजाद हुए नौजवान देश की समस्याओं को जैसे दिखाया था, वह हिंदी सिनेमा के इतिहास में दर्ज हो गया है। आजाद भारत की नींव जब रखी जा रही थी, उस वक्त देश का एक बड़ा तबका जीवन की बुनियादी समस्याओं के लिए संघर्ष कर रहा था।

फिल्म देश की एक बड़ी समस्या बाल भिक्षावृत्ति से संवाद करती है। फिल्म का संदेश यही है कि बच्चों की मुट्ठी भीख के लिए नहीं खुलनी चाहिए। नए आजाद भारत में हर क्षेत्र अपने तरीके से योगदान कर रहा था, जिसमें सिनेमा की भी प्रमुख भूमिका थी।

यह फिल्म 1954 में प्रदर्शित हुई थी और इसने सर्वश्रेष्ठ सिनेमा का ‘फिल्म फेयर’ पुरस्कार जीता था। फिल्म की कहानी दो अनाथ बच्चों भोला (रतन कुमार) और बेलू (बेबी नाज) की है। इनके पिता को काला पानी की सजा होती है और हैजे से मां की मृत्यु हो जाती है। सेवा समिति का सदस्य दोनों बच्चों को उनकी चाची के घर छोड़ जाता है। चाची दोनों बच्चों को भीख मांगने के लिए मजबूर करती है।

दोनों बच्चों को शुरू से ही इस बात का अहसास रहता है कि भीख मांगना मानवीय गरिमा के खिलाफ है। दोनों बच्चे ट्रेन में ही एक बूट पालिश करने वाले व्यक्ति से आकर्षित होते हैं, जो अपनी मेहनत से पैसे कमाता है। भोला और बेलू को पड़ोस में रहने वाले जान चाचा का प्यार मिलता है। जान चाचा खुद जरायम के पेशे में रह चुके हैं, इसलिए वो समझते हैं कि इन बच्चों को इस दुनिया से निकल कर मेहनत और संघर्ष से अपना पेट भरना चाहिए।

वो बच्चों को समझाते हैं कि उनके दो हाथ भीख मांगने के लिए नहीं बल्कि काम करने के लिए हैं। दो हाथों की बदौलत अपनी तकदीर खुद लिखी जा सकती है। इसके बाद भोला और बेलू प्रण करते हैं कि वे कभी भीख नहीं मांगेंगे। उन्हें बूट पालिश में ही अपना भविष्य दिखने लगता है। एक दिन भोला एक भविष्य बताने वाले के पास पहुंचता है। वह भोला का भविष्य बताते हुए कहता है कि तू पूरी जिंदगी जूतियां रगड़ेगा। भविष्यवक्ता के इस व्यंग्य को भोलू सकारात्मकता में लेता है और खुशी से नाचते हुए कहता है, ‘वाह सच पैसे वसूल हो गए। मैं भीख नहीं मांगूंगा। जिंदगी भर मेहनत करूंगा।’

दोनों भाई-बहन पैसे बचा कर पालिश की डिब्बी खरीदते हैं। लेकिन किसी भी काम में प्रशिक्षण की दरकार होती है और उन्हें बूट पालिश में बहुत दिक्कत होती है। फिर आता है मुंबई का बरसात का मौसम जब कोई भी जूते पालिश नहीं करवाता है। एक घटनाक्रम में बेलू, भोला से बिछड़ जाती है और उसे एक अमीर परिवार गोद ले लेता है। फिल्म में भीख के खिलाफ दोनों बच्चों का संघर्ष दर्शकों को अति भावुक कर देता है। फिल्म का सुखद अंत संघर्ष की जीत का प्रतीक है।