इतिहास का हाथ पकड़कर भविष्य का सफर तय किया है किताबों ने। साधारण-सी दिखने वाली पुरानी जिल्द और पीले पड़ गए पन्नों वाली किताब जिसमें समय की सीलन महक रही होती है, जब घर के किसी कोने से अनायास ही हमारे हाथों में पड़ जाती है, तो हम कितने ही बरस पीछे का सफर पलक झपकते तय कर लेते हैं। उन पन्नों के बीच में रखे वे सूखे फूल आज भी यादों की खुशबू से महक उठते हैं।

पत्थरों पर चिह्न बनकर उभरने और उकेरने से लेकर, पत्तों, हस्तलिखित पांडुलिपियों में ढलते हुए कागज पर स्याही से पहचान पाने और किताबों की मंजिल पाने तक शब्दों ने सदियों का दिलचस्प सफर तय किया है। आज भी समाज, सभ्यता और संस्कृति को जानने-समझने के लिए किताबें ही सबसे प्रामाणिक दस्तावेज मानी जाती हैं। किस्से-कहानियां, ज्ञान-विज्ञान, कला, संगीत, नृत्य, साहित्य, धर्म, राजनीति और न जाने कितनी ही सदियों के इतिहास की साक्षी रही हैं किताबें।

कहावत है कि किसी की भी गलती या बुराई हमेशा रेत पर लिखना और अच्छाई को पत्थर पर उकेरना, क्योंकि पहाड़ के पत्थर समय के भाल पर सदियों खड़े रहते हैं और आने वाली पीढ़ियों को संदेशे हमारे पूर्वजों ने पहाड़ों पर अपने चिह्न और लिखावट से ही छोड़े हैं। वहीं रेत स्मरण शक्ति में भूलने की गुंजाइश और जरूरत का प्रतीक बनी, ताकि कुछ भी अनुपयोगी जीवन की सरलता और तरलता को धीमा न कर दे। यानी शब्द और लिखावट के निशान जगजाहिर हैं। जब शब्दों को किताबों की गोद मिली, तो किताबों ने भी पुस्तकालयों के घर बसाए। पुस्तकों की समीक्षाएं हुईं।

पुस्तकालय का प्रकाश

भारत का सबसे बड़ा और पुराना पुस्तकालय ‘नेशनल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया’ कोलकाता में है, जिसकी स्थापना 1836 में कलकत्ता लाइब्रेरी के रूप में की गई थी। तमिलनाडु के तंजावुर में सरस्वती महल लाइब्रेरी देश का सबसे पुराना किताबघर है, जहां ताड़ के पत्तों की पांडुलिपियां संरक्षित हैं। सदियों से किताबों का स्थायी ठौर रहे हैं किताबघर। किसी भी देश की सभ्यता और संस्कृति का संरक्षण इन्हीं पुस्तकालयों के हवाले रहा है।

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शायद इसीलिए कहा गया है कि किसी सभ्यता और देश को मिटाना हो, तो वहां के पुस्तकालयों को तबाह कर दो। इतिहास गवाह है कि दुनियाभर के कई पुस्तकालय इसी सनक का शिकार हुए। एलेक्जेंड्रिया, जिसे तीन शताब्दी पूर्व प्लोटमी शासकों ने मिस्र की सांस्कृतिक धरोहर संजोने के लिए बनवाया था, कई बार सुलगा। इसमें हजारों की संख्या में पांडुलिपियां और लेख मौजूद थे। दुनियाभर के नामी लेखकों और उनके विभिन्न विषयों के लेखों की प्रति भी यहां रखी जाती थी।

ज्ञान के केंद्र

नालंदा मठ के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। गुप्त काल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग कहा जाता है। इस काल में कला, साहित्य, विज्ञान, गणित, वास्तुकला ने अभूतपूर्व विकास किया। नालंदा मठ पांचवीं से बारहवीं शताब्दी तक शिक्षा का प्रमुख केंद्र रहा, जहां चीन, जापान, तुर्की, मिस्र, इंडोनेशिया, तिब्बत, कोरिया, मध्य एशिया समेत दुनियाभर से विद्यार्थी जुटते थे, जिनमें तकरीबन दस हजार विद्यार्थी और दो हजार शिक्षक थे। नालंदा उस समय बौद्ध धर्म का केंद्र हुआ करता था, लेकिन मठ का धर्म और शिक्षा से बराबर सरोकार था। रत्नसागर, रत्नरंजका और रत्नदड़ी वहां के पुस्तकालय के विभाग थे, जहां धर्म, इतिहास, कानून, विज्ञान, खगोल, भूगोल, व्याकरण, साहित्य समेत हर विषय की पांडुलिपियां और किताबें थी। इनकी सही संख्या किसी को नहीं मालूम। इतिहासकार भी केवल अंदाजा ही लगाते रहे हैं कि इनकी संख्या हजारों में रही होगी।

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अब डिजिटल स्वरूप की वजह से किताबों को खोजना जितना आसान है, उससे भी ज्यादा सहज है दुनियाभर की किताबों तक पहुंचना। सिर्फ एक क्लिक और सब स्क्रीन पर। सरकारें लगातार अपने-अपने स्तर पर पुस्तकालयों का डिजिटल आधुनिकीकरण कर रही हैं। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों के अलावा सार्वजनिक पुस्तकालय भी डिजिटल रूप में विकसित किए जा रहे हैं। शुरुआती दौर में पुस्तकालय जहां केवल साहित्यिक और सांस्कृतिक दस्तावेज के संरक्षण का काम करते थे, वहीं अब पुस्तकालय ई-पुस्तकें, ई-पत्रिकाएं, लेख, ऑडियो-वीडियो सामग्री, शोध और शैक्षणिक डेटा, ऑडियो किताबें भी उपलब्ध करा रहे हैं। डिजिटल पुस्तकालय के इस अवतार ने पाठकों और सामग्री के बीच उपलब्धता की खाई को पाटने का भी काम किया है।

बदलते रिश्ते

समय बदलने के साथ ही किताबों के साथ पाठकों का रिश्ता भी बदला है। डिजिटल युग ने किताबों तक पहुंच आसान भले ही कर दी है, लेकिन किताबों से पाठकों के जुड़ाव पर असर पड़ा है। कोरोना काल ने डिजिटल पढ़ाई, ई-बुक संस्कृति को नई पहचान जरूर दी, लेकिन यह भी सच है कि कोरोना काल की आड़ में कितनी ही जानी-मानी पत्र-पत्रिकाएं अपना भौतिक स्वरूप हमेशा के लिए खो बैठीं और कई पत्रिकाओं का तो अस्तित्व ही खत्म हो गया। कुछ पत्रिकाओं को ई-रूप देकर न केवल प्रिंटिंग लागत, यातायात लागत से छुटकारा मिला, बल्कि ‘ई-सब्सक्रिप्शन’ ने अग्रिम भुगतान से कमाई के रास्ते भी खोले।

पुस्तक समीक्षा: भारतीय समाज में आख्यान की भूमिका

जब-जब पढ़ने की बात होती है तो किताबों का भौतिक रूप ही जेहन में आता है। ऐसे लोगों की आज भी कमी नहीं है, जिन्हें किताबों का आनलाइन रूप जरा भी नहीं पचता। इसमें दो राय नहीं कि किताबों को छूकर पढ़ने का एहसास हमेशा ही डिजिटल रूप से नदारद रहेगा। अक्सर किताबों का जिक्र करते हुए हम भूल जाते हैं बच्चों को और शायद अपने बचपन को भी। पंचतंत्र, चंपक, चाचा चौधरी, अमर चित्र-कथा, अकबर-बीरबल, तेनाली राम की ढेरों कहानियां और हास्य के चटकीले रंगों के किरदार किसी की स्मृति से ओझल नहीं हुए हैं और न ही पुराने।

न ये कहानियां पुरानी हुईं और न ही इनके किरदार। इनकी कहानियों का रोमांच उनके चित्रों में ज्यादा था। बाल साहित्य आज भी छप और बिक रहा है, लेकिन अब किस्से-कहानियों की वह दुनिया जादू की तरह नहीं खुलती और बच्चों में भी किताबों को लेकर रोमांच गायब है।

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इन दिनों पश्चिम बंगाल के चुनाव चल रहे हैं और राजनीति के बदलते परिदृश्य को समझने के लिए यदि किसी एक राज्य को केंद्र में रखकर अध्ययन किया जाए, तो पश्चिम बंगाल एक अत्यंत महत्वपूर्ण केस स्टडी के रूप में सामने आता है। राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील रहे इस सूबे की सियासत में आए बदलावों और उन परिवर्तनकामी वर्षों में भी वामपंथी विचारधारा के मजबूत गढ़ में भाजपा जैसी दक्षिणपंथी पार्टी ने कैसे जड़ें जमाईं उसका बारीक विवरण देने वाली किताब है ‘बंगाल में भाजपा।’ पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक