वह 1926 का साल था और छापेखाने से प्रेमचंद का उपन्यास ‘निर्मला’ बाहर आया। यह उपन्यास नवंबर 1925 से नवंबर 1926 के बीच ‘चांद’ पत्रिका में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुआ था।प्रेमचंद की यह रचना कोई जादुई यथार्थ सरीखी नहीं थी। इसमें सीधे तौर पर अपने समय की कुप्रथा के साथ संवाद था। बेमेल विवाह जैसी कुप्रथा का दहेज के साथ मेल होने पर एक पूरा परिवार तबाह हो गया।

निर्मला एक सुंदर लड़की है, जिसका विवाह समृद्ध घर के युवक भुवनमोहन से तय होता है। लेकिन शादी के ठीक पहले निर्मला के पिता की मृत्यु हो जाती है। अब आर्थिक संकट के कारण निर्मला की मां दहेज देने में सक्षम नहीं है, जिस कारण भुवनमोहन यह रिश्ता तोड़ लेता है।

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मजबूरी में निर्मला की मां उसका विवाह तोताराम नाम के एक अधेड़ वकील से कर देती है। पहली पत्नी से तोताराम के तीन बेटे हैं। तोताराम का बड़ा पुत्र मंसाराम निर्मला का हमउम्र है, जिस वजह से तोताराम को दोनों पर शक होता है।

वे मंसाराम को हास्टल भेज देते हैं, जहां उसकी मृत्यु हो जाती है। मंसाराम के बाकी दोनों बेटों की भी बुरी स्थिति हो जाती है। इन हालात के बाद तोताराम को अपनी भूल का अहसास होता है और वे घर छोड़ कर चले जाते हैं। निर्मला एक बच्ची को जन्म देती है। लेकिन मानसिक आघात व गरीबी के कारण निर्मला की भी मृत्यु हो जाती है।

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रामविलास शर्मा कहते हैं कि निर्मला केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं है, बल्कि भारतीय समाज की उस व्यवस्था की देन है जहां नारी को अपनी इच्छाओं को कुचलकर जीने के लिए मजबूर किया जाता है।

नामवर सिंह कहते हैं कि निर्मला प्रेमचंद का पहला ऐसा उपन्यास है जिसमें बेमेल विवाह और दहेज की समस्या को इतने तीखे और यथार्थवादी ढंग से उठाया गया है। यह उपन्यास पाठक के भीतर करुणा ही नहीं, सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आक्रोश भी पैदा करता है।’