सर्दियों की एक रात। चौक से लेकर सिविल लाइंस तक रिक्शों की घंटियां कुछ ज्यादा बज रही हैं। चाय की भाप हवा में घुल रही है। कहीं दरी बिछी है, कहीं सफेद चादरों से सजा मंच है। सामने बैठे लोग किसी शायर का इंतजार कर रहे हैं। जैसे ही मंच से एक गजल खत्म होती है, भीड़ से आवाज उठती है – “वाह-वाह!” और फिर – “मुकर्रर अर्ज है!” शायर मुस्कुराता है और वही शेर दोबारा पढ़ता है। उस क्षण लगता है कि पूरा शहर शब्दों के जादू में डूब गया है।

यह कोई काल्पनिक दृश्य नहीं, बल्कि बीसवीं सदी के उस प्रयागराज की झलक है, जहां शायरी महज साहित्य नहीं थी, बल्कि सामाजिक जीवन का हिस्सा थी। जिस तरह संगम में नदियां मिलती हैं, उसी तरह इस शहर में भाषाएं, संस्कृतियां और विचार भी मिलते थे। प्रयागराज की पहचान केवल कुंभ, उच्च न्यायालय, स्वतंत्रता आंदोलन और शिक्षा तक सीमित नहीं रही; वह लंबे समय तक उर्दू अदब के सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में भी शामिल रहा।

दिल्ली ने उर्दू को शाही ठाट दिया, लखनऊ ने उसे नफासत दी, लेकिन प्रयागराज ने उसे विचार दिया। यही कारण है कि उर्दू साहित्य के इतिहास में इस शहर का जिक्र आते ही केवल शायर नहीं, बल्कि आलोचक, पत्रकार, शिक्षाविद, छात्र और आम श्रोता भी याद आते हैं।

जब इलाहाबाद बदल रहा था बौद्धिक केंद्र में…

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में यह शहर उत्तर भारत के सबसे प्रभावशाली बौद्धिक केंद्रों में बदल रहा था। उच्च न्यायालय की स्थापना, प्रशासनिक गतिविधियों का विस्तार और शिक्षा संस्थानों का विकास इसे नई पहचान दे रहे थे। उस दौर में उर्दू प्रशासन, न्याय और सार्वजनिक जीवन की महत्वपूर्ण भाषाओं में शामिल थी। अदालतों, सरकारी दफ्तरों और अखबारों में उर्दू का व्यापक प्रयोग होता था। शहर से निकलने वाले अखबार और साहित्यिक पत्रिकाएं केवल समाचार नहीं देती थीं, बल्कि विचारों की नई दुनिया भी रचती थीं।

प्रयागराज की अदबी दुनिया का जिक्र अकबर इलाहाबादी के बिना अधूरा है। सैयद अकबर हुसैन ने अपने नाम के साथ “इलाहाबादी” जोड़ा तो वह केवल भौगोलिक परिचय नहीं रहा, बल्कि एक साहित्यिक पहचान बन गया। वे अंग्रेजी शासन के दौर में न्यायिक सेवा में थे और बदलते भारतीय समाज को बेहद करीब से देख रहे थे। पश्चिमी शिक्षा, नई जीवनशैली और औपनिवेशिक प्रभाव पर उन्होंने जिस पैनी दृष्टि से लिखा, वह आज भी प्रासंगिक लगती है।

उनका मशहूर शेर – “खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।”

सिर्फ एक शेर नहीं, बल्कि भारतीय सार्वजनिक जीवन में विचार और अभिव्यक्ति की शक्ति का प्रतीक बन चुका है।

यदि अकबर इलाहाबादी ने समाज को देखा, तो फिराक गोरखपुरी ने मनुष्य के भीतर झांकने की कोशिश की। रघुपति सहाय ‘फिराक’ का जीवन लंबे समय तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय (University of Allahabad) से जुड़ा रहा। वे केवल शिक्षक नहीं थे, बल्कि अपने आप में एक जीवित साहित्यिक संस्था थे। उनके बारे में अनेक किस्से आज भी सुनाए जाते हैं। कहा जाता है कि कक्षा में साहित्य पढ़ाते-पढ़ाते वे अचानक इतिहास, राजनीति और प्रेम पर बोलने लगते थे और छात्र नोट्स लेना भूलकर उन्हें सुनते रह जाते थे।

फिराक का यह शेर उनकी संवेदनशीलता का परिचय देता है – “बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं, तुझे ऐ जिंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं।”

उनकी शायरी में प्रेम है, लेकिन वह केवल रोमानी प्रेम नहीं। उसमें स्मृति, अकेलापन, सभ्यता और मनुष्य की जटिलताएं भी शामिल हैं।

प्रयागराज की अदबी दुनिया केवल शायरों तक सीमित नहीं थी। यहां ऐसे आलोचक भी हुए जिन्होंने उर्दू साहित्य को नए बौद्धिक आयाम दिए। एहतेशाम हुसैन (Ehtesham Husain) का नाम उनमें अग्रणी है। उन्होंने उर्दू आलोचना को केवल प्रशंसा और निंदा से आगे बढ़ाकर सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भों से जोड़ा। आधुनिक उर्दू आलोचना के विकास में उनका योगदान महत्वपूर्ण माना जाता है।

इसी तरह जां निसार अख्तर (Jaan Nisar Akhtar) और प्रगतिशील लेखक आंदोलन से जुड़े अनेक साहित्यकारों की रचनात्मक यात्राओं में भी इस शहर के बौद्धिक वातावरण की छाप दिखाई देती है। बीसवीं सदी के मध्य में जब साहित्य सामाजिक सरोकारों की ओर बढ़ रहा था, तब प्रयागराज की साहित्यिक महफिलें भी इन बहसों का केंद्र बनी हुई थीं।

कॉफी हाउस की बहसें और साझी संस्कृति का चूल्हा

इलाहाबाद विश्वविद्यालय का उर्दू और हिंदी साहित्य के विकास में असाधारण योगदान रहा है। यहां साहित्य केवल कक्षाओं में नहीं पढ़ाया जाता था। हॉस्टलों, पुस्तकालयों, छात्रावासों, कॉफी हाउसों और विभागीय गलियारों में भी उतनी ही गंभीर बहसें होती थीं जितनी कक्षा में। किसी नई पुस्तक, नई कविता या नए विचार पर घंटों चर्चा चलती थी। हिंदी और उर्दू के विद्यार्थी अलग-अलग खेमों में नहीं, बल्कि साझा सांस्कृतिक धरातल पर संवाद करते थे।

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पुराने प्रयागराज के चौक, अटाला, खुल्दाबाद और दरियाबाद केवल मोहल्ले नहीं थे; वे सांस्कृतिक संसार थे। शाम होते ही चायखानों और छोटी-छोटी बैठकों में अदबी महफिलें जम जाती थीं। पुराने साहित्यप्रेमियों के संस्मरण बताते हैं कि वहां ऐसे लोग भी मिल जाते थे जिन्होंने कभी किताब नहीं लिखी, लेकिन मीर तकी मीर, मिर्जा गालिब, नवाब मिर्जा खान उर्फ दाग देहलवी, जोश मलीहाबादी और फिराक गोरखपुरी के सैकड़ों शेर उन्हें याद थे। किसी नए शायर की गजल सुनते, उसकी बहर पर चर्चा करते और देर रात तक बहस चलती रहती।

बीसवीं सदी के मध्य दशकों में प्रयागराज के बड़े मुशायरे पूरे उत्तर भारत में चर्चा का विषय होते थे। विश्वविद्यालय परिसर, साहित्यिक संस्थाओं और सांस्कृतिक संगठनों द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में देश के नामी शायर हिस्सा लेते थे। मंच पर बैठे शायर और सामने बैठे हजारों श्रोता मिलकर एक ऐसा सांस्कृतिक दृश्य रचते थे जिसकी कल्पना आज कठिन लगती है।

पुराने लोगों के संस्मरण बताते हैं कि कई बार किसी एक शेर पर इतनी देर तक दाद मिलती थी कि कार्यक्रम का समय बढ़ जाता था। “वाह-वाह”, “सुभानअल्लाह” और “मुकर्रर” की आवाजें रात भर गूंजती रहती थीं। उस दौर में मुशायरा केवल मनोरंजन नहीं था; वह सार्वजनिक बौद्धिक जीवन का हिस्सा था।

प्रयागराज की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि यहां हिंदी और उर्दू ने एक-दूसरे को समृद्ध किया। महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी’निराला’, हरिवंश राय बच्चन, फिराक गोरखपुर और धर्मवीर भारती जैसी विभूतियां एक ही सांस्कृतिक वातावरण का हिस्सा थीं। यहां भाषाएं प्रतिस्पर्धी नहीं थीं; वे एक-दूसरे की पड़ोसी थीं। शायद इसी कारण इस शहर की साहित्यिक संस्कृति में कटुता कम और संवाद अधिक दिखाई देता है।

सोशल मीडिया के दौर में कितनी बची है ‘अदबी रूह’?

आज समय बदल गया है। सोशल मीडिया ने महफिलों की जगह काफी हद तक स्क्रीन को दे दी है। मुशायरों की पुरानी रौनक भी पहले जैसी नहीं रही। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि प्रयागराज की अदबी आत्मा समाप्त हो गई है। आज भी किसी पुस्तकालय में साहित्यिक गोष्ठी होती है, किसी युवा शायर की पहली गजल पर “वाह-वाह” सुनाई देती है और किसी मंच से उर्दू का कोई शेर गूंजता है, तो लगता है कि इतिहास पूरी तरह बीता नहीं है।

जनसत्ता के विशेष स्तंभ ‘संगम तीरे’ के लिए इस यात्रा को लिखते हुए महसूस होता है कि प्रयागराज की असली पहचान केवल भूगोल में नहीं, उसकी सांस्कृतिक स्मृति में बसती है। यह वह शहर है जहां नदियां मिलती हैं, भाषाएं मिलती हैं, विचार मिलते हैं और पीढ़ियां मिलती हैं। यहां शायरी केवल साहित्य नहीं रही; वह सामाजिक संवाद का माध्यम, सांस्कृतिक आत्मविश्वास का प्रतीक और साझा विरासत का उत्सव रही है।

शायद इसी कारण प्रयागराज की रातें आज भी पूरी तरह खामोश नहीं हुई हैं। कहीं न कहीं कोई शेर अब भी हवा में तैर रहा है, कोई पुरानी महफिल अब भी स्मृतियों में जगमगा रही है और कोई आवाज अब भी कह रही है – “इरशाद!”

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मोबाइल स्क्रीन पर अंगूठा चलाते हुए फिल्में देखने वाली पीढ़ी शायद कभी समझ ही न पाए कि एक दौर ऐसा भी था, जब सिर्फ तीन घंटे की एक फिल्म देखने के लिए लोग आधा दिन खर्च कर देते थे। टिकट के लिए धक्कामुक्की होती थी, जेब में सिक्के खनकते थे, साइकिल स्टैंड भर जाते थे और “हाउसफुल” का बोर्ड देखकर भी लोगों की आंखों में चमक बनी रहती थी। उस समय फिल्में केवल पर्दे पर नहीं चलती थीं, बल्कि पूरे शहर की धड़कनों में दौड़ती थीं। प्रयागराज की शामें तब सिनेमाहालों की रोशनी से जगमगाती थीं और हर शुक्रवार शहर किसी नए सपने का इंतजार करता था। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक